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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921

देवप्रयाग से दो दिन ऋषिकेश और चार दिन हरिद्वार ठहरकर हम दिल्ली आयें । दिल्ली में हम स्टेशन के बगल में स्थित गुजराती समाज की धर्मशाला में रहें । वैसे तो दिल्ली में अच्छी धर्मशालाओं की कमी है मगर हमारी खुशकिस्मती थी की हमें एसी स्वच्छ-सुघड और सुविधाजनक धर्मशाला मिली ।

अब हमें धनेश्वरभाई का इंतजार था, जो बंबई से आनेवाले थे और हमारे साथ कश्मीर चलनेवाले थे । जिस दिन हम दिल्ली पहूँचे, उसी दिन रात को वो दिल्ली आये । हमारा अगला दिन कश्मीर के लिये आवश्यक तैयारी करने में गया । कश्मीर जाने के लिये पासपोर्ट की आवश्यकता थी । श्रावण मास की पूर्णिमा को कुछ ही दिन बचे थे । ज्यादा विलंब होने पर हम पूर्णिमा के दिन अमरनाथ नहीं पहूँच सकते थे । धनेश्वरभाई का एक मित्र दिल्ली में रहता था । उसने कहा की तुरन्त पासपोर्ट निकालना मुश्किल है । फिर भी इश्वर में श्रद्धा रखकर हमने प्रयास किये और ताज्जुब की बात है की केवल एक घण्टे में धनेश्वरभाई संरक्षण विभाग से पासपोर्ट ले आये । अगर इश्वर की इच्छा हमें पूर्णिमा के दिन अमरनाथ पहूँचाने की है, तो पासपोर्ट की व्यवस्था वो क्यूँ नहीं करता ? उसकी इच्छा से सारा संसार चलता है । हमें सिर्फ उसके अधिन होकर काम करना है, निमित्त बनना है । मगर एसा कर पाना सबके लिये आसान नहीं है । इसके लिये जागृति, तप, श्रद्धा, और पुरुषार्थ आवश्यक है । मिथ्याभिमान तथा अहंकार का नाश किये बिना श्रद्धा का उदय नहीं होता । जब अतूट श्रद्धा का उदय होता है तो जीवन की वीणा से संवाद और समाधान के सूर निकलने लगते है ।

पासपोर्ट मिल जाने पर हमारा काम आसान हो गया । तीन-चार दिन के बाद पूर्णिमा थी । धनेश्वरभाई की हिम्मत और उत्साह काबिले-दाद था । वो पासपोर्ट के साथ-साथ श्रीनगर के लिये हवाईजहाज की तीन टिकट ले आये । हवाई मुसाफरी करने का हमने सोचा नहीं था । अगले दिन, यानी श्रावण सुद बारस, मंगलवार १४ अगस्त के दिन हम हवाईजहाज में बैठकर श्रीनगर गये । मेरी और माताजी की यह सौप्रथम हवाईयात्रा थी । मौसम सुहाना था । पंजाब के खेत-खलियारों का मोआईना करते हुए, गीताहृदय का पाठ करते हुए, कश्मीर की वादियाँ और पहाडों का नजारा देखते हुए साडे चार घण्टे के बाद हम श्रीनगर पहूँचे । रास्ते में विमान अमृतसर तथा जम्मू में कुछ देर के लिये रुका । अमरनाथ यात्रा के लिये इश्वर ने धनेश्वरभाई की पसंदगी की थी, वो कितनी सही थी इसका अंदाजा मुझे ये दो दिन में हो गया ।

श्रीनगर पहेली नजर में इतना आकर्षक नहीं लगा । वैसे भी हमें यहाँ रुकना नहीं था, हमें तो अमरनाथ जाना था । दोपहर में हमने पहलगाम की बस ली । श्रीनगर से पहलगाम ५९ मील की दूरी पर हे । कश्मीर की वादीयाँ शुरु होते ही चिनार के पैड दिखने लगे । चारों ओर फैले चिनार के हजारों पैडों से घाटी की शोभा देखते ही बनती है । कुदरत का यह अनमोल नजारा देखते देखते हम पहलगाम पहूँचे । पहलगाम का नैसर्गिक सौन्दर्य दिलोदिमाग को छू गया - नदी, झरने, चारों और फैली हरियाली तथा उत्तुंग पर्वतमालाएँ । पहलगाम समुद्रतल से ७२०० फीट की उँचाई पर है इसलिये रात को ठंड ज्यादा लगती है । पहलगाम आने के बाद हमें लगा की हम कश्मीर में है । यहाँ आकर नंदभवन धर्मशाला में कमरा लिया ।

दूसरे दिन सुबह यानि श्रावण सुद तेरस, बुधवार, पंद्रह अगस्त के दिन धोडे पर बैठकर अमरनाथ जाने के लिये निकले । धनेश्वरभाई के लिये पहाडों में यात्रा करने का यह प्रथम अवसर था । उनके आग्रह से हम भी घोडे पर सवार हुए । आसपास का नैसर्गिक सौन्दर्य देखते हुए हम दोपहर तक चंदनवाडी आ गये । यहाँ से चढाई शुरु होती है । शाम को करीब सात बजे हम शेषनाग पहूँचे । पहलगाम से शेषनाग करीब १६ मील है । शेषनाग आने के पहले खुबसूरत झील आती है । चारों और बर्फ से आच्छादित पर्वत और बीच में जमा हुआ पानी । यह दृश्य मन मोह लेता है । यहाँ से बर्फीली चोंटियाँ साफ दिखाई देती है । वैसे तो पहलगाम में कहीं कहीं बर्फ होती है, तथा शेषनाग के मार्ग पर जगह जगह बर्फ जमी हुई दिखती है । शेषनाग जाते वक्त कुछ वक्त बर्फ पर चलना पडता है । शेषनाग के चारों ओर बर्फीले पर्वत है । यहाँ झील के कारण ठंड ज्यादा लगती है । इश्वरकृपा से हम पहूँचे तब बारिश नहीं थी । शेषनाग में यात्रीओं की भीड दिखाई दी । चारों ओर टेन्ट लगे थे । यहाँ धर्मशाला या अन्य सुविधा नहीं है इसलिये टेन्ट में रहना पडता है । यात्री पहलगाम से टेन्ट ला सकते है, हालाकि उसे उठाने के लिये अलग से घोडा करना पडता है । टेन्ट में रात्रीनिवास करने का मेरा यह प्रथम अनुभव था । पंद्रह अगस्त का दिन था । मेरी जिन्दगी के तीस साल पूरे हुए और इकतीसवाँ साल शुरु हुआ । अमरनाथ की यात्रा मेरे लिये विशेष महत्वपूर्ण थी ।

सुबह होने पर हम शेषनाग से निकले । यहाँ से आगे का रास्ता कठिन है । बडी सावधानी से घोडे बर्फ पर चल रहे थे । कुछ ही देर में सूरज निकला, और पहाडों की बर्फिली चोटीयाँ झगमगाने लगी । वेद में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है, इसका मर्म यहाँ आकर समज में आया ।

ठंड तथा बर्फ के कारण यात्री ठिठर गये थे । सूरज की कीरणें उनके लिये ईश्वर का आशीर्वाद लेकर आयी थी । धूप निकलने पर यात्री प्रसन्न हो गये । मौसम अच्छा था, बारिश नहीं थी और आकाश खुला था । हम करीब १३,६०० फीट की उँचाई पर आ गये । यहाँ चारों ओर बर्फ था । एक महिला ठंड के कारण बेहोश हो गयी थी । लोग उसे सचेतन करने का प्रयास कर रहे थे । कुछ लोग खुले पैर यात्रा कर रहे थे । भोलेनाथ शिव के प्रति उनकी आस्था आश्चर्यजनक थी ।

करीब आठ मील का रास्ता तय करके हम पंचतरणी पहूँचे । यहाँ नदी की मुख्य धारा, पाँच धाराओं में विभाजीत होती है, इसलिये इसे पंचतरणी नाम दिया गया है । टेन्ट में सामान रखकर हम भोजन का प्रबंध करने गये । यहाँ खाना पकाने के लिये जलाउ लकडीयाँ नहीं मिलती । कुछ यात्री गीली लकडीयाँ जलाकर खाना पकाने की कोशिश कर रहे थे । यात्रीओं के साथ दुकानदार चलते है, जो तैयार पूरीशाक बेचते है । हमने खाना पकाने के लिये प्रायमस लिया था मगर उसकी पीन लेना भूल गये थे, इसलिये हमारा काम नहीं बना । माताजी और धनेश्वरभाई चाय पीते थे, मगर यहाँ दूध मिलना मुश्किल था । ऐसे में न जाने कहाँ से एक दूधवाला हमारे पास आया । दूध मिलने से हमें राहत हुई । हमारे साथ जो नास्ता था, उसे न्याय देकर हम धूप में बैठे । दूसरे दिन अमरनाथ जाना था इसलिये मैंने टेन्ट में जाकर भगवान शंकर की स्तुति 'शिवसंगीत' की पूर्णाहूति की ।

अमरनाथ में रात रहने की कोई व्यवस्था नहीं है । इसलिये हमें सुबह जल्दी उठकर अमरनाथ जाना था और दर्शन करके शाम होने से पहले वापिस लौटना था । हिमालय की अन्य यात्राओं की तुलना में अमरनाथ की यात्रा कष्टप्रद है । कैलास-मानसरोवर के अलावा इतनी तकलिफ शायद कहीं नहीं पडती । पंचतरणी से अमरनाथ पाँच मील की दूरी पर है । संत-महात्मा, तथा अन्य यात्रीगण सुबह होते ही चलने लगे । हम भी जल्दी तैयार होकर निकल पडे । बीच में थोडा अंतर बर्फ पर चलना पडता है, कुछ चढाई भी है । एसा कठिन रास्ता तय करके आखिरकार हम अमरनाथ की पुण्यभूमि में आ पहूँचे ।

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