Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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जगन्नाथपुरी
कोलकता पंद्रह दिन रुकने के बाद हम जगन्नाथपुरी आये । यह प्रदेश नैसर्गिक सौन्दर्य से भरा-भरा है । यहाँ का हवापानी अच्छा है । जगन्नाथजी का मंदिर भी आकर्षक है । हम मंदिर की बगल में स्थित धनजी मुलजी धर्मशाला में ठहरे । धर्मशाला काफि बडी और आवश्यक सुविधा से संपन्न थी ।

जगन्नाथजी में देखनेलायक जगह यहाँ का मंदिर है । भारत के चार प्रसिद्ध धर्मस्थानों में पुरी की गणना होती है । आद्य शंकराचार्य ने भारत के चार कोने में चार पीठ की स्थापना की थी, इनमें से एक पीठ यहाँ है । पुरी को यह बहुमान मिला है ।

जगन्नाथपुरी का मंदिर अति प्राचीन है । रामेश्वर मंदिर की भव्यता या द्वारिका मंदिर की स्वच्छता का यहाँ अभाव है फिर भी विविधता तथा विशालता की दृष्टि से जगन्नाथजी का मंदिर ध्यानाकर्षक है । रामेश्वर, द्वारिका तथा बदरीनाथ के मंदिर के पास क्रमशः समंदर, गोमती नदी और अलकनंदा नदी है एसा कुछ यहाँ पर नहीं है । जगन्नाथपुरी में समंदर है, मगर मंदिर से थोडी दूरी पर है । अगर मंदिर समंदर के तट पर होता तो उसकी शोभा कइ गुना बढ जाती, इसमें कोई संदेह नहीं ।

मंदिर में सुभद्रा और बलदेव के बीच में भगवान जगन्नाथ की आकर्षक मूर्ति है । मंदिर परिसर में जगह-जगह पर संकीर्तन होता है । बदरीनाथ, द्वारिका या रामेश्वर में एसा नहीं होता है । संकीर्तन से पूरा माहौल तथा यात्रीओं के मन प्रभुभक्ति से तरबतर हो जाते है ।

मंदिर की बगल में चैतन्य महाप्रभु का स्थान है । चैतन्य महाप्रभु के नाम से शायद ही कोई अनजान होगा । नवद्वीप में जन्म धारण करके उन्होंने कृष्णभक्ति का प्रचार किया था । अपनी जिन्दगी के पीछले कुछ साल उन्होंने यहाँ व्यतीत किये थे । चैतन्य महाप्रभु एक लोकोत्तर महापुरुष थे, वो हमेशा प्रेमभक्ति में डूबे रहते थे । कहा जाता है की जगन्नाथजी के श्रीविग्रह में वो विलीन हो गये थे । आज भी बहुत सारे लोग उनको अवतारी पुरुष मानते है । उनका कहेना है की प्रेमभक्ति का संवर्धन करने के लिये स्वयं भगवान ने चैतन्य महाप्रभु का स्वरूप धारण किया था । सेंकडों लोग उन्हें इष्ट मानकर पूजते है । चैतन्य महाप्रभु का जीवन अलौकिक था । उन्होंने लोगों में चैतना की नयी लहर फैलायी थी तथा कीर्तन भक्ति का प्रचार-प्रसार किया था । युगों के बाद एसी विभूति जन्म लेती है । उनके स्थान का दर्शन करके हमें बडी प्रसन्नता हुई । हम सोचने लगे की जब चैतन्य महाप्रभु जीवित होंगे तो यहाँ का नजारा कैसा होगा ! हम उन्हें मंदिर में कीर्तन करते हुए, भक्तों के साथ बात करते हुए, संन्यासीओं को भक्ति का महिमा बताते हुए, कृष्णभक्ति में मगन होकर आँसू सारते हुए तथा मंदिर में भगवान की श्रीविग्रह में विलीन होते हुए अपने मन की आँखो से देखते रहे ।

जगन्नाथपुरी का समुद्रतट मनोहर है । समंदर की लहरे एक-के-बाद-एक किनारे पर आकर टकराती रहती है । मन करता है की इसे देखते रहें । श्रद्धालु भक्तजन यहाँ आकर स्नान करते है और पुण्यसंचय करते है । अन्य यात्राधामों की तरह यहाँ भी गरीबी दिखाई दी । एक तरफ आलिशान होटलें थी, कीमती वस्त्र पहनकर लोग घूम रहे थे और दूसरी तरफ फटेतूटे वस्त्रों में भिखारी भीख माँग रहे थे । भारत के किसी भी कोने में चले जाओ, आपको एसा दृश्य देखने को मिलेगा ।

समंदर के तट पर शंकराचार्य का मठ है । यह स्थान जगन्नाथपुरी नगर के बीचोबीच नहीं है, मगर कुछ दूरी पर है । मठ में शंकराचार्य की मूर्ति है । यह स्थान बहुत पुराना है, तथा देखने में इतना आकर्षक नहीं है । मठ में हमें किसी संन्यासी या शंकराचार्य के दर्शन नहीं हुए ।
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भुवनेश्वर
जगन्नाथपुरी से भुवनेश्वर के लिये बस चलती है । बीच रास्ते में साक्षीगोपाल तीर्थ आता है । यहाँ के पंडा यात्रीओं के पीछे पड जाते है । अगर उन्हें दान-दक्षिणा न मिले, तो 'धर्म का नाश हो गया है, अधर्म बढ गया है, चारों और कलियुग छा गया है' एसा कहकर अपना असंतोष प्रकट करते है ।

एक भक्त के साक्षी बनने के लिये भगवान मथुरा से यहाँ आये थे, और फिर हमेशा के लिये यहाँ बस गये थे । तब से यह स्थान साक्षीगोपाल के नाम से जाना जाता है । भुवनेश्वर में अनेक प्राचीन मंदिर है, जिनमें बहुत सारे जीर्ण हो चुके है । सबसे बडा मंदिर नगर के बीचोबीच है, जिसमें भगवान शिव का लिंग स्थापित है । यहाँ के मंदिरों में रोशनी कम होती है, गर्भद्वार तक जाने के लिये काफि चलना पडता है, तथा मंदिर इतने साफसुथरे नहीं होते ।

भुवनेश्वर से पुरी लौटते शाम हो गयी । संध्या के अवनवीन रंगो से आकाश भर गया । ये हमें संसार की परिवर्तनशीलता तथा जीवन की क्षणभंगुरता का उपदेश दे रहे थे । मगर कौन उसे सुनना चाहता था ? लोग अपने जीवनव्यवहारों में इतने डूबे थे की शाम की शोभा देखने की उन्हें फुर्सत नहीं थी । कुदरत तो एक खुली किताब की तरह अपने आपको विभिन्न रूप में प्रस्तुत करती है । अगर आदमी उसे पढने की जिज्ञासा रखें, उससे प्रेरणा ग्रहण करें, तो बहुत कुछ सिख सकता है । कुदरत की युनिवर्सीटी के आगे मानवसर्जीत विश्वविद्यालय फीकें है, इसमें दोराय नहीं ।

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अन्य दर्शनीय स्थान
जगन्नाथपुरी का मंदिर तथा शंकराचार्य-मठ के अलावा कुछ अन्य स्थान है, जो देखनेलायक है । इनमें से एक है राधाकान्त मठ, जहाँ चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम अठारह साल बीताये थे । हम उसे देखने गये तो पता चला की ये भीडभाडवाले इलाके में तथा समंदर से काफि दूर है । मन में विचार आया की चैतन्य महाप्रभु जैसे एकांतप्रिय महापुरुष ने एसी जगह क्यूँ चुनी होगी ! मगर सोचने पर लगा की आज से ३००-४०० साल पहले शायद यहाँ कोई भीड नहीं होगी, शायद जंगल होगा ।

मठ के एक छोटे-से कमरे में, चैतन्य महाप्रभु की कुछ चिजें रक्खी गयी थी । उनमें सूती गोदडी, उनका जलपात्र तथा उनकी पादुका शामिल है । दिवारों पर उनके चित्र लगे थे । हालाकि चैतन्य महाप्रभु की सच्ची तसवीर उन हजारों लोगो के दिल में है, जिनको उन्होंने प्रभुभक्ति का आस्वाद करवाया था, संकीर्तन की मस्ती का अनुभव करवाया था । ये तसवीर कभी मिट नहीं सकती । जब तक यह सृष्टि है, चैतन्य महाप्रभु अमर रहेंगे ।

राधाकांत मठ के पास सिद्ध-बकुल नामक स्थान है । कहा जाता है की चैतन्य महाप्रभु ने दातून की एक चीरी यहाँ लगायी थी, जिससे ये पैड हुआ है । इसी वृक्ष के नीचे बैठकर हरिदास ने हररोज एक लाख जप का अनुष्ठान किया था । एसी अन्य कई बातें इस स्थान से जुडी हुई है । उसे नजरअंदाज करें तो भी ये जगह अपने आप में मनभावन है । वृक्ष के नीचे ध्यान करने के लिये आसन बनाया गया है ।

हमने अभीअभी भक्त हरिदास को याद किया तो उनकी समाधि का जीक्र करना आवश्यक समजता हूँ । अध्यात्म में रुचि रखनेवाले लोगों को यह स्थान देखना चाहिये । ये स्थान नगर से दूर है मगर समंदर के तट पर होने के कारण मनभावन लगता है । आश्रम का मकान बडा है । इसमें हरिदासजी की छोटी-सी समाधि है । यहाँ चैतन्य महाप्रभु के चरणचिन्ह रक्खे गये है । जो भी चैतन्य महाप्रभु के जीवन से परिचित है वो हरिदास के बारे में अवश्य जानते होंगे । चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथों से उनको समाधि दी थी । हरिदास इस बहुमान के लिये सर्वथा योग्य थे । इश्वरप्रेम से आदमी कहाँ से कहाँ पहूँच जाता है, इसका उत्तम उदाहरण हरिदास का जीवन है । हरि के दरबार में उँच-नीच, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्र या रंक-राय के भेद नहीं होते । भगवान के घर सब समान है । भेदभाव हम इन्सानों की अज्ञान और अविद्याजन्य दुनिया में है । जो इश्वर की राह पर चलता है, सदाचारी और नम्र बनकर ईश्वर को प्रेम करता है, और अंततः इश्वर का दर्शन करता है उसका जीवन धन्य और सफल है । न जाने कितने राजा-महाराजा और धनी इस फानी दुनिया से चले गये । उनके स्मारक बनते है मगर लोग वहाँ भक्तिभाव से सर नहीं झुकाते । वजह, उन्होंने अपना जीवन सांसारिक पदार्थो को प्राप्त करने में गवाँ दिया, संसार के स्वामी, यानि परमेश्वर को पाने के लिये पुरुषार्थ नहीं किया । हे मानव ! तू हरिदास की समाधि से कुछ प्रेरणा लें । तू हरिनाम का सुमिरन कर और अपना जीवन सफल करने का प्रयास कर ।

यहाँ गोपीनाथ भगवान की प्राचीन जगह है । कहा जाता है की पहले यहाँ की मूर्ति काफि बडी थी, जिससे एक भक्त को माला पहेनाने में तकलिफ होती थी । उसने भगवान को सच्चे मन से प्रार्थना की, और मूर्ति छोटी हो गयी ! तब से गोपीनाथ की मूर्ति ऐसी है । यह कथा सच्ची हो या जूठी, ये बात सही है की इश्वर के द्वार पर की गई कोई भी पुकार निरर्थक नहीं जाती । जरुरत है निर्मल अंतर और उत्कट भाव से उसे पुकारने की ।