जिन्दगी की राह में न जाने कितने मोड आते है ! शायद उतने ही जितने हिमालय के टेढेमेढे रास्ते तय करते वक्त हम अनुभव करते है । एसे में अगर चालक कुशल, चौकन्ना और जाग्रत नहीं है तो परिणाम की कल्पना करना मुश्किल नहीं है । हमारे जीवन का भी एसा है । उसे सही ढंग से चलाने के लिये कुशल सारथि की जरूरत पडती है । साधनापथ पर साधक को हमेशा जाग्रत और पूर्णता के लिये प्रयासशील रहना है ।
देवप्रयाग से ऋषिकेश का रास्ता विकट है, मगर नैसर्गिक सौन्दर्य से भरा है । जो प्रवासी ऋषिकेश से वापिस लौट जाता है वो सही मायने में हिमालय के दर्शन से वंचित रह जाता है । देवप्रयाग साधना के लिये सानुकूल है, यहाँ के परमाणु ही अलग है । इसका अहेसास व्यक्ति को कुछ देर रहने के बाद होता है । पिछले कुछ सालों से मुझे एसे दिव्य वातावरण में रहने का सौभाग्य मिला है । यहाँ रहकर मेरा अंतर शांत और संतृप्त हुआ है ।
इस बार देवप्रयाग से निकले का वक्त आया तो भाई जवाहर भावुक हो गया । हरेक व्यक्ति के दिल में संत-महात्मा के लिये एसा प्रेम नहीं होता । शायद ये उसके पूर्वजन्म के पुण्यों का फल था । हमें छोडने के लिये रामेश्वर और व्रजमोहन भी बस अड्डे पर आये थे । उनका स्नेह भी कम नहीं था ।
कुछ साल पहले, जब मैं नया-नया यहाँ आया था, तब मेरे दिल में कैसी भावनाएँ थी ? और अब यहाँ रहकर, इतने सारे अनुभव पाकर, जीवन का उर्ध्वीकरण तथा शांति की संप्राप्ति करने के बाद मैं कैसा महसूस कर रहा था ? यह सब बातें याद करके मेरा हृदय भावुक हो गया ।
ऋषिकेश में दो दिन रुकने के बाद हम नासिक गये । वहाँ चंपकभाई हमारा इन्तजार कर रहे थे । चंपकभाई से प्रारंभिक मुलाकात ऋषिकेश में हुई थी । फिर हम दशरथाचल पर साथ रहें थे । वक्त के चलते हमारा स्नेहसंबंध प्रगाढ हुआ था ।
नासिक आकर मैंने अपना पूरा ध्यान साधना की पूर्णता के लिये केन्द्रीत किया । मैं अपनी और से हो सके इतने प्रयास कर रहा था । उसे और घनिष्ठ करने की इच्छा से मैंने अनशन करना चाहा । १६ नवम्बर, शुक्रवार, कारतक वद त्रीज के दिन से मैंने अनशन का प्रारंभ किया । एक दिन जल लेना और दूसरे दिन निर्जला – एसा क्रम बनाया । साथ में प्रार्थना का दौर जारी था ।
कुछ दिन नासिक रहने के बाद हम बंबई गये । यहाँ भी अनशन जारी रहा । बंबई से शिरडी खास दूर नहीं है, इसलिये बंबई आकर मुझे शिरडी के सुप्रसिद्ध संत सांईबाबा की याद आयी । फिर मैंने सोचा की अगर कुछ संकेत मिलता है तो ही मैं शिरडी जाउँगा । उन्हीं दिनों में आंतरजगत में प्रेरणा मिली की ‘शिरडी आना हो तो बंबई से रात की बस में निकलना, दिन में नहीं ।’ फिर कुछ दिन बाद सांईबाबा का स्वप्नदर्शन हुआ । इस तरह से आवश्यक संकेत मिलने पर शिरडी जाना तय हुआ । २५ जनवरी १९५२ के दिन रात ढलने पर हमने शिरडी के लिये प्रस्थान किया ।
नासिक में अनशन के दौरान हर दूसरे दिन पानी लेता था इसलिये शारीरिक रूप से अशक्ति महेसूस होती थी । मेरे जीवन के यह कठिनतम उपवास थे । उपवास के दौरान ध्यानावस्था में मुझे कई सिद्ध महापुरुषों तथा जगदंबा के दिव्य दर्शन का लाभ मिला । एसे अनुभवों से मेरा उत्साह बना रहा ।

