महुवा में एक दिन एक सिद्ध महापुरुष का दर्शन हुआ ।
मैंने उनको पूछा: 'माँ का साक्षात दर्शन दिसम्बर में हो जायेगा ?'
उन्होंने कहा, 'हाँ ।'
'कौन से दिन ?'
'१४ दिसम्बर ।'
'दिन में या रात में ?'
'रात में ।'
इसके बाद आसो वद दसम, सोमवार के दिन दोपहर को आंतरजगत में देवर्षि नारदजी ने दर्शन दिया ।
मैंने पूछा, 'माँ का साक्षात् दर्शन कब होगा ?'
नारदजी ने कहा, '१४ दिसम्बर ।'
'दिन में या रात में ?'
'रात में ।'
'कितने बजे ?'
'ये नहीं बताउँगा ।'
इन अनुभवों से मुझे नया जोश मिला । अब मेरा ध्यान १४ दिसम्बर पर केन्द्रित हुआ । दिसम्बर मास शुरु होने के एक-दो दिन पहले हम सरोडा गये । सरोडा के शांत और आनंददायी माहौल में मेरे दिन कटने लगे ।
१४ दिसम्बर की सुबह से मेरा मन अति प्रसन्न था । माँ की प्रतीक्षा में पूरा दिन निकल गया और रात भी खतम हुई । अन्य दिनों की तरह १४ दिसम्बर भी मिथ्या सिद्ध हुआ । मेरे जीवन में एसा पहले कई दफा हो चुका था इसलिये मुझे ज्यादा निराशा नहीं हुई । दिन मिथ्या होने का मतलब माँ की पूर्ण कृपा के लिये अभी और इन्तजार करना होगा ।
आध्यात्मिक पथ के प्रवासी को विफलता से निराश या नाहिंमत नहीं होना है, उसे किसी भी हालात में चलते रहना है । सूरज जिस तरह उदय होने से नहीं थकता, गंगाजी का जयघोष कभी नहीं थमता, उसी तरह साधक को निरंतर साधना करते रहना है । किसी भी अवस्था में उसकी आकांक्षा का भावसंगीत बन्द नहीं होना चाहिये ।
ये माँ की योजना है, तो उसके पीछे जरुर कोई मकसद होगा । कभी-न-कभी तो माँ की पूर्ण कृपा जरूर होगी, एसी श्रद्धा मेरे दिल में कूट-कूट के भरी थी । फिर भी साहजिक प्रार्थना हो गयी । माँ, अब देर मत करो । जिस तरह से माँ अपने बच्चे की देखभाल करती है, आप मुझे सम्हालो । दिसम्बर खत्म होने में अभी पंद्रह दिन बाकी बचे है । मुझे दर्शन देकर, अपनी कृपावर्षा में नहलाकर मुझे धन्य करो । मेरी वेदना का हमेशा हमेशा के लिये अन्त करो ।
दिसम्बर मास एसी प्रार्थना करते-करते पूर्ण हुआ । हताश होने से मेरा काम बननेवाला नहीं था । इसलिये पूरे जोश और उत्साह के साथ मैं साधनापथ पर चलता रहा ।

