Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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इस वर्ष हिमालय जाकर कहाँ रहना है, ये तय नहीं हुआ था । पीछले साल गये थे, तो इन्स्पेक्टर मुरारीलाल देवप्रयाग में थे । मगर सुनने में आया की उनका तबादला मसूरी हो गया है । मैंने उनको खत लिखा मगर वो मसूरी नहीं थे । किसी भी प्रकार से उनको मेरा खत मिला । उन्होंने प्रत्युत्तर में लिखा, ‘आप मसूरी आना चाहते हैं, मगर मेरा तबादला हो गया है । मुझे अफसोस है की मैं आपकी सेवा नहीं कर सकूँगा । देवप्रयाग में रघुनाथजी, गंगाजी तथा हिमालय के दर्शन करने में वक्त कब गुजर जाता था, पता नहीं चलता था । यहाँ वक्त जल्दी-से कटता नहीं है । अभी यहाँ गर्म हवाएँ चलती है । पराधीन आदमी के नसीब सुख कहाँ है ? मेरे कुछ परिचित लोग मसूरी में है । मैं उनके नाम चिठ्ठी लिखकर आपको भेज रहा हूँ । वो आपके रहने का इन्तजाम करेंगे । अगर एसा नहीं होता है, तो भी आप मुझे खत जरुर लिखना । मैं सप्ताह की छुट्टी लेकर वहाँ आ जाउँगा और मुझसे बन पडेगा, करूँगा ।'

मुरारीलाल ने तीन व्यक्तिओं के नाम चिठ्ठी भेजी थी, तीनों इज्जतदार आदमी थे । हालाकि चिठ्ठीओं से काम नहीं बनता ये हमारा अनुभव था । पीछले साल गर्मीयों में हम आलमोडा गये थे, तब इसका प्रमाण मिला था । फिर भी हिमालय जाना तय था, और मसूरी खास दूर नहीं था, इसलिये हमने मसूरी जाने की योजना बनायी ।
हम प्रथम ऋषिकेश गये और भरत मंदिर में रुके । पीछले साल गर्मी तथा बारीश की मौसम में हम यहीं रहे थे । भरत मंदिर के लीलाधर भट्टजी तथा ज्योतिप्रसाद भाई का स्नेह अपार था । दो दिन यहाँ रहने के बाद जब मैंने मसूरी जाने की बात कही तो उन्होंने कहा: 'आपकी मरजी है तो आप हो आओ, मगर हम चाहते हैं की आप यहीं रहो ।'

गुजरात की तुलना में यहाँ ताप कम था । गंगाजी का पावन सानिध्य था । गंगाजी का अस्खलित प्रवाह हमें संदेश देता था की चलते रहो । ताप हो या छाया, सुख हो या दुःख, पतन हो या उत्थान, अविरत चलते रहो । जीवन में कुछ पाने की तमन्ना है, तो तन-मन के तार जोडकर चलते रहो ।

ऋषिकेश में बहुत सारे साधुसंत निवास करते है । कुछ गंगातट पर झाडीयों के बीच झोंपडी बनाकर रहते है । एक दिन शाम को मेरी भेंट एक साधु से हुई । उनके कान में कुंडल थे । उनको देखकर लगा की वो नाथ संप्रदाय के है । बातोंबातों में उन्होंने कहा: 'नहान की ओर भीष्मनाथ नामक महान योगी रहते है । वो हठयोग में निष्णात है, और व्रजोली क्रिया जानते है । उनके जैसा समर्थ योगी इस इलाके में नहीं है । आपकी इच्छा हो तो उनसे जरूर मिलो । कुछ दिनों के बाद मैं भी वहाँ जानेवाला हूँ ।'

फिर बोले: 'वहाँ आम बहुत होते है । आपको आम का मजा लेना है तो चलो मेरे साथ ।'

मैंने कहा: 'क्या वो सिद्ध योगी है ? पातंजल योगदर्शन में जो योगसिद्धि का वर्णन किया गया है, इसके लक्षण उनमें दिखाई पडते है ?'

उन्होंने कहा: 'हाँ, उनमें बहुत सारी सिद्धियाँ है । नहान में उनके जैसा कोई योगी नहीं है । वहाँ सब उन्हें जानते है । अगर मेरे साथ न आना हो तो कोई हरकत नहीं । आप दहेरादून से नहान आ जाना । वहाँ काली मंदिर में राजगुरु रहते है, वो योगीराज के शिष्य है । वो आपको योगीराज से मिला देंगे । नहान से उनका स्थान कुछ दूरी पर है, मगर वहाँ जाने के लिये बस चलती है ।'

मैंने माहिती देने के लिये उनका आभार माना । भारत के दूरदराज के इलाको में एसे समर्थ संतपुरुष निवास करते है, यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई ।

मैंने कहा: 'अगर भगवान की मरजी रही तो मैं वहाँ जरूर आउँगा । पर हाँ, उनको मिलने के लिये, आम खाने के लिये नहीं ।'

योगी भीष्मनाथ को मिलकर उनकी सिद्धियों के बारे में जानने की मुझे जिज्ञासा थी मगर वो साधुपुरुष फिर-से नहीं मिले । शायद वो नहान के लिये निकल पडे थे । फिर मुझे याद आया की उत्तरकाशी में मुझे नहान के एक महात्मा मिले थे । नेपालीबाबा ने मुझे उस महात्मा को मिलने से मना किया था । शायद वो यही महात्मा थे या कोई और ये कौन बता सकता है ?