दिन १ (आसो सुद १, गुरुवार, ता ८-१०-५३)
हे पतितपावनी गंगा मैया ! हे योगीवर हिमालय ! हे भरतजी !
आपकी पावन संनिधि में कई संत-महात्माओं ने पूर्णता और परमानंद की प्राप्ति की है । मैं भी यही कामना लेकर माँ की कृपा के लिये व्रत रख रहा हूँ । कृपया मेरा मनोरथ पूर्ण करना । जैसे सूर्य का उदय सृष्टि के लिये सुखदायी होता है, माँ का दर्शन मेरे लिये आशीर्वादरूप होगा ।
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दिन २ (आसो सुद १, शुक्रवार, तारीख ९-१०-५३)
विरह की वेदना में एक दिन चला गया । आपका दर्शन नहीं हुआ, आपकी कृपा नहीं हुई । कोई आपसे मिलने का प्रयास करें, और आप उसका मार्ग आसान करने के बजाय उसकी राह में काँटे बिछाये तो आपको कृपासागर कौन कहेगा ?
आपने ही भगवद् गीता में कहा है की जो आपकी भक्ति करेगा, उसका योगक्षेम आप वहन करोगे, उसकी सभी इच्छा आप पूर्ण करोगे । क्या वो गलत है ? क्या शास्त्रों तथा महापुरुषों ने आपके जो गुण गाये है, सब जूठे है ? क्या आपकी पूर्ण कृपा किसी पर नहीं होती ? नहीं, एसा नहीं हो सकता ।
बचपन से लेकर आज तक आपने मुझ पर कृपावर्षा की है । तभी तो मैं यकीन के साथ कहता हूँ की पूर्ण कृपा करना आपके लिये असंभव नहीं है । जिस तरह माँ अपने बच्चे की परवरिश करती है, आपने अब तक मेरी देखभाल की है । आप एसे ही मुझे सम्हालते रहो और मुझे पूर्णता का आशीर्वाद देकर पूर्ण संतोष का दान करो ।
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दिन ३ (आसो सुद २, शनिवार, तारीख १०-१०-१९५३)
आपके मधुमय मुख का दर्शन जिसने एक बार कर लिया, आपके चरणकमलों में जिसने मन लगा दिया, आपके कृपासागर में जिसने एक बार स्नान कर लिया, वो इस संसार में सबसे बडा धनी है । उसके जैसा परम भाग्यवान संसार में और कोई नहीं है ।
जिस तरह दलदल में फँसा प्राणी बचने के लिये आर्त हृदय से पुकारता है, मैं आपको पुकार रहा हूँ । जब तक मुझे आपका सुधामय स्पर्श नहीं मिल जाता, आपके सूरदुर्लभ शब्द का श्रवण नहीं होता, आपके सुमधुर दैवी रूप का दर्शन मेरी आँखे नहीं कर लेती, मुझे चैन और आराम नहीं मिलेगा । अब तो आपकी पूर्ण कृपा होने पर ही मेरे दिल को करार मिलेगा । सारे संसार का धन-वैभव-ऐश्वर्य भले मुझे मिल जाय, मेरे दिल की बेकरारी का अन्त नहीं होगा । क्योंकि मेरे दर्द की दवा सिर्फ और सिर्फ आप है ।
हे प्रभु, हे कृपासिंधु, हे दयालु, अब प्रगट होने में विलंब क्यूँ कर रहे हो ? मुझे मालूम है की आपको तप, व्रत, ज्ञान या साधना का अहंकार पसंद नहीं है । आपकी कृपा केवल आपके लिये लालायित होने से और आपकी मरजी से होती है । फिर भी, मेरे दिल की बात रखने के लिये मैं अनशन कर रहा हूँ ।
जिस क्षण आपकी कृपा होगी, वह मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं होगी । उस धन्य क्षण की मुझे प्रतीक्षा है ।
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दिन ४ (आसो सुद ३, रविवार तारीख ११-१०-१९५३)
बडे-बडे योगी, तपस्वी महात्माओं ने कोशिश करके देख लिया है की आपकी कृपा बगैर मोह और अज्ञान की निवृत्ति नहीं होती । जो श्रद्धावान आपकी कृपा के लिये प्रयास करता है, उसे आप कृतार्थ करते हो । आपकी महिमा अपरंपार है ।
अगर ये सच है तो आप इतनी देर क्यूँ कर रहे हो ? आप अपने सुधामय स्वरूप को मेरे आगे प्रकट करके मेरे नैनों को आराम क्यूँ नहीं देते ? क्या आपकी दुनिया में न्याय जैसा कुछ नहीं है ?
आपके दर्शन से न केवल मेरी इच्छा पूर्ण होगी, और भी बहुत काम होंगे । आजकी पीढी को आप पर भरोसा होगा । उनके लिये मेरा जीवन उदाहरणरूप होगा । अगर एसा नहीं हुआ तो मानवजाति की आप में श्रद्धा है, वो तूट जायेगी । फिर जडता की और जा रहे जगत में आपका प्रकाश कैसे फैलेगा ? इसलिये कहता हूँ की मुझे दर्शन देने में आपकी ही भलाई है ।
आप ही बताओ की जिस वस्तु की मैं कामना कर रहा हूँ, वो क्या अयोग्य है, अनुचित है ? तो फिर आप मुझे विरहाग्नि में क्यूँ जला रहे हो ? मैं आपके बिना नहीं रह सकता । जिस तरह एक बच्चा अपनी माँ के लिये रोता है, मैं आपके लिये रोता रहूँगा, आपको पुकारता रहूँगा । माँ को पुकारना बच्चे का स्वभाव है तो आप भी जगज्जननी माँ है । बच्चों की देखभाल करना आपका फर्ज है । पर शायद आप उसे भूल गये हो । ये कितने दुःख की बात है की ये सब मुझे आपको बताना पड रहा है । मैं तो आपका नाम लेकर रोता रहूँगा मगर आप कब तक ये ऐसे देखते रहेंगे ?
आपके आनेका निश्चित वक्त बता दो जिससे मेरे बेचैन दिल को करार आ जाये । बस, मेरी इतनी सी इल्तजा है ।
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दिन ५ (आसो सुद ४, सोमवार, तारीख १२-१०-१९५३)
आज अनशन का पाँचवा दिन है और मुझे अभी भी आपकी कृपा की प्रतीक्षा है ।
आपने माँ का बिरुद धारण किया है, फिर बच्चे की पुकार सुनने में इतना विलंब क्यूँ करते हो ? अगर आप एसा करोगे तो आपको जगज्जननी कौन कहेगा ?
किसी छोटे-से बच्चे के लिये पैड पर लगे फल खाना मुश्किल होता है । उसके लिये फल पाने के केवल दो तरीके है – या तो वो खुद पैड पर चढ जायें या किसी कारणवश फल पैड से नीचे आ गिरे । हाँ, अगर कोई दयालु आदमी उसकी हालत पर तरस खाकर फल गिरा देता है तो उसका काम बन सकता है । मेरी दशा वो बच्चे जैसी है । पूर्णता के जिस फल की मैं आकांक्षा रखता हूँ, और जिसके लिये मैं परिश्रम कर रहा हूँ, उसे पाना मेरे बस की बात नहीं है । मगर नन्हें बच्चे को देखकर साधारण वटेमार्गु के दिल में जो भावना होती है, एसी भावना मुझे देखकर क्या आपके दिल में नहीं होती ?
आज तक मुझे जो फल मिले, सब विनाशी थे । उससे मेरी भूख और प्यास नहीं मिटी । मुझे तो आपके दर्शन का अमृतफल चाहिये । उसे पाकर मैं अपने आपको धन्य और बडभागी समझूँगा ।
संसार के सभी पदार्थ विनाशशील है, इसलिये ज्ञानी उसे पाने की कामना नहीं करते । केवल आप अविनाशी है, अमर है । तभी तो ज्ञानीजन आपके परम तेजोमय रुप का सेवन करते है और आपका दर्शन पाने के लिये एडीचोटी का जोर लगा देते है ।
मैंने अपना जीवन आपके हवाले किया है । फिर भी क्या कारण है की आप मेरे सामने प्रकट नहीं होते ? अब मुझे बार-बार एक ही बात कहने में शर्म आती है । मगर क्या करूँ ? इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है ।
बाग में जब तक सुंदर पुष्पों की सृष्टि नहीं होती, बागबान उसे सँवारता रहता है, उसकी खुदाई करता है, उसे पानी पिलाता है । जब तक वीणा से मधुर संगीत नहीं निकलता, संगीतकार उसके तारों को कसता है । एक किसान अपने खेतों में हल चलाता है, बीज बोता है, पानी लगाता है, और निराश हुए बिना परिश्रम करता है । माँ अपने बच्चे की भलाई के लिये रातदिन प्रयास करती है, उसे दूध पिलाती है, उसे साफ करती है, उसके आँसू पोंछती है ।
वैसे ही, जब तक मेरा जीवनबाग सुगंधित नहीं हो जाता, जब तक मेरी जीवनवीणा से आपके नाम का सुमधुर संगीत नहीं निकलता, जब तक मेरे हृदय में आपके नाम की सृष्टि नहीं होती तब तक मैं अविरत प्रयास करता रहूँगा । आप तो कुशल संगीतकार, महेनतु बागबान, या आशावादी किसान से कहीं श्रेष्ठ हो, तभी तो मैं कहता हूँ की मेरी प्रार्थना स्वीकार करो, ताकि मुझे यह बात फिर-से दोहरानी न पडें ।
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