Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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ऋषिकेश से बंबई जाने का आदेश मिला । ऋषिकेश से निकलते वक्त मन में तसल्ली थी । मैंने गंगाजी, हिमालय, भरतजी तथा वायुमंडल में सूक्ष्म रूप से निवास कर रहें सिद्ध महापुरुषों का स्मरण किया । उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना की हे गंगामैया, हे नगाधिराज ! मैं आपकी शरण में आया हूँ, आपके आशीर्वाद मुझ पर हमेशा बनाये रखना ।

बंबई करीब दो महिना रहें, इस दौरान हम सांईबाबा के सुप्रसिद्ध स्थान शिरडी हो आये । बंबई से सरोडा आये और करीब पोने तीन महिना रहे । फिर एक महिना साबरमती रहे । वहाँ नलिनीबेन तथा सुरेन्द्रभाई ने हमारी प्रेमपूर्वक सेवा की । मोहनभाई तथा शारदाबेन का स्नेह भी अदभूत था ।

साबरमती में रहने का मकान अच्छा था । हमारे आमंत्रण पर ताराबहन अपने बच्चों के साथ वहाँ रहने आयी मगर सत्संग का लाभ नहीं उठा पायी । उसके दोनों पैर में कृमि-रोग हुआ । सरोडा में लोग तालाब का पानी गन्दा करते थे और वही पानी सबको पीना पडता था । इससे गाँव में कृमिरोग का उपद्रव हुआ । अहमदाबाद में ताराबेन का घर बहुत छोटा था । उसकी देखभाल तथा सारवार करने हम उसे हमारे पास ले आये ।

साबरमती आने के बाद ताराबेन की तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ, उसका दर्द बढता चला । अब उसे चलना-फिरना तो ठीक बिस्तर से उठने में कठिनाई होने लगी । उनके ज्येष्ठ पुत्र, रमेश को भी कृमिरोग हुआ था । समस्या गंभीर थी और हमारे हिमालय जाने का समय समीप आ रहा था ।

इस साल मेरा बदरीनाथ जाना तय था । माताजी वहाँ की ठंड सहन कर पायेगी या नहीं, ये भी प्रश्न था । यहाँ ताराबेन को माताजी की जरूरत थी । मैंने सोचा की माताजी ताराबेन को लेकर सरोडा जायें और मै अकेला हिमालय जाउँगा ।

माताजी सन १९४८ से मेरे साथ थी । ये पहला मौका था की वो मुझसे कुछ वक्त के लिये अलग हो रही थी । माताजी अपने जिम्मेवारी से वाकिफ थी । ताराबेन की परिस्थिति गंभीर थी । धर्म, इश्वर या आध्यात्मिकता के नाम पर अपने कर्तव्य से मुँह मोडना या अपने सेवाधर्म को नजरअंदाज करना उसने नहीं सिखा था । वो खुशी-से ताराबेन की सेवा में रहने के लिये तैयार हुई । मैंने भी इश्वेरच्छा मानकर उसे स्वीकार किया ।

मैं शुरु में हिमालय अकेला ही आया था और कुछ साल अकेला ही रहा था इसलिये ये कोई बडी बात नहीं थी । मगर आदमी सोचता कुछ और है और होता कुछ और है । पिछले कुल सालों से मेरा जीवन परम शक्ति के इशारों पर चल रहा था । मेरे मन में खयाल आया की क्यूँ न उसकी मरजी जान लूँ ?

वैशाखी पूर्णिमा, १४ मई, १९५४ की रात को जब मैं ध्यान करने बैठा तो सांईबाबा ने स्पष्ट और सुमधुर शब्दों में कहा: 'मैं सांईबाबा हूँ । वैसे तो पूरा विश्व मेरा घर है, मगर शिरडी में मैं साक्षात रहता हूँ ।' फिर मेरी तरफ संकेत करके बोले : 'ये महापुरुष है, युगावतार है । इसके द्वारा समग्र भारत और विश्व में महान कार्य होनेवाला है । इस बार उसकी साधना पूर्ण हो जायेगी । उसका काम बन जायेगा ।' ये कहकर उन्होंने मेरे दो पूर्वजन्मों की बात कही, जो मुझे मिले अनुभवों से मेल खाती थी ।

सांईबाबा ने कहा: 'माताजी खुशी-से आपके साथ हिमालय आयें । ताराबेन और बच्चों की फिक्र करने की जरूरत नहीं है । वो मेरे ही बच्चे है, मैं उन्हें कुछ नहीं होने दूँगा ।' इतना कहकर वो अदृश्य हो गये । जब मेरा देहभान लौट आया तो मैंने घडी में देखा, रात के सवा बजे थे ।

सांईबाबा का अनुभव कितना अलौकिक और समयसर था ? मेरा अंगअंग आनंद से फडक रहा था । कुछ देर छत पर जाकर मैं चांदनी में नहाता रहा । सांईबाबा जैसे समर्थ महापुरुष मुझे प्रेम करें, और मेरी किसी योग्यता न होने के बावजूद मुझ पर कृपा करें, ये मेरा परम भाग्य था ।

मैंने अपने अनुभव के बारे में माताजी तथा ताराबेन को बताया और अंतिम निर्णय माताजी पर छोडा । उनको सांईबाबा तथा मेरे अनुभव पर विश्वास था । अतः माताजी मेरे साथ हिमालय आने के लिये तैयार हो गयी ।

ताराबेन स्वयं चल-फिरने के काबिल नहीं थी । उसे उठाकर उसके घर अहमदाबाद ले गये । सांईबाबा के वचनों के प्रभाव से उसे कुछ नहीं हुआ और करीब एक महिने के अंदर वो बिल्कुल ठीक हो गयी । ताराबेन तथा उनके बच्चों को सांईबाबा ने अपना माना, ये मेरे लिये अहम बात थी । बाबा से मेरी प्रार्थना है की वे हमेशा उनको अपनी शरण में बनाये रक्खें ।

जब व्यक्ति का जीवन इश्वरेच्छा से चलने लगता है, तो उसमें कर्तृत्व या अहंभाव पैदा नहीं होता । उसके मन में संकल्प-विकल्पों का युद्ध नहीं होता । उसकी भूत-भावि तथा वर्तमान की सभी चिंताओं का अन्त होता है । वो इश्वररूपी माँ की छत्रछाया में अपने आपको महेफूस महेसूस करता है । एसी जीवनमुक्त दशा का अनुभव करना आसान नहीं है । मगर जो एसी दशा का अनुभव करता है, उसका समग्र जीवन उत्सव-सा हो जाता है । उसके भय, शोक और मोह का अन्त होता है ।