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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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मैंने हनुमानदासजी को पूछा, 'भगवान के अवतार के बारे में आपका क्या मानना है ? लोग कहते है की इश्वर का अवतार हो चुका है । क्या ये सच है ?'
उन्होंने उत्तर दिया, 'नहीं, रामजी ! भगवान को अवतार लेने में अभी वक्त है । जब सारा संसार त्राहि त्राहि करने लगेगा, तब भगवान अवतार लेंगे ।'
मैंने कहा: 'कष्ट तो अब भी बहुत है । क्या आपके कहने का यह मतलब है की इससे भी अधिक कष्ट सहन करना होगा ?'
उन्होने उत्तर दिया, 'हाँ, इससे कहीं ज्यादा । तब भगवान का अवतार होगा । अभी उनको आने में कुछ वक्त है ।'

मैंने पूछा, 'महात्मा गांधीजी को कुछ लोग इश्वर का अवतार मानते है । उनके बारे में आपकी क्या राय है ?'
हनुमानदासजी ने उत्तर दिया, 'उनको अवतार कहने में कोई दिक्कत नहीं है मगर वो इश्वर के अवतार नहीं थे । गांधीजी पिछले जन्म में भक्त थे, मगर श्राप मिलने पर उनका पुनर्जन्म हुआ था ।’

मैंने कहा: 'गांधीजी का पूर्वजन्म का नाम बताने की कृपा करेंगे ?'
उन्होंने स्वाभाविक उत्तर दिया, 'हाँ, वो नासिका भक्त के अवतार थे ।'
'नासिका भक्त ?' मैंने एसा नाम अब तक नहीं सुना था इसलिये मुझे आश्चर्य हुआ ।
मैंने पूछा, 'नासिका भक्त का नाम तो आज ही सुना । क्या कोई शास्त्र में उनके नाम का उल्लेख है?'
उन्होंने दृढतापूर्वक कहा, 'हाँ, नासिका भक्त की बात शास्त्रों में बतायी गयी है ।'
'कौन से शास्त्र में, आप बताने की कृपा करेंगे ? इसे पढकर मैं भी कुछ प्रेरणा ले सकूँ ।'

उनको अंदाजा नहीं था की बात यहाँ तक पहूँच जायेगी । हनुमानदासजी सोच में पड गये ।
जब मैंने फिर पूछा तो कुछ संकोच के साथ बोले, 'मैं तो मूर्ख हूँ । मुझे शास्त्रों की क्या खबर ? मैं तो ठीक तरह से पढ-लिख भी नहीं सकता । यहाँ एक बाग है, जहाँ एक पंडीत कोई किताब पढता है । एक दिन उसने मुझे बताया था । मुझे पता नहीं ये कौन-से पुस्तक या शास्त्र में लिखा है । शायद किसी पुराण में लिखा होगा ।'
मैंने मनोमन कहा की अच्छा हुआ, आपने साफ बता दिया वरना गलतफहमी हो जाती ।

मैंने पूछा: 'गांधीजी फिर जन्म लेंगे ?'
'अगर कोई काम बाकी बचा हो या कोई वासना अधूरी रह गयी हो तो जन्म ले सकते है ।'

मैंने बातों का सिलसिला आगे बढाया । मैंने पूछा, 'कुछ वक्त पहले अरविंद आश्रम के माताजी ने एक पत्रकार को कहा था की भारत की सीमा पर रशिया और अमरिका का युद्ध होने की शक्यता है तथा इ.स. १९५७ में क्रांति होगी । जब की दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध संत रामदासजी ने अपने विदेशप्रवास के दौरान कहा था की युद्ध नहीं होगा । भारत की ये दो लोकोत्तर विभूतिओं के विरोधाभासी बयानों के बारे में आपका क्या कहना है ?'
हनुमानदासजी ने बाल पर हाथ घुमाये और आनंद में आकर बोले: 'भले ये कहे की युद्ध नहीं होगा, मगर देखना, पाँच साल में भयंकर युद्ध होगा और इससे भारी संहार होगा ।'

बात निकली थी तो मुझे लगा की एक और प्रश्न पूछा जाय । महायोगी अरविंद ने पाकिस्तान की रचना हुई तब कहा था की पाकिस्तान दस साल रहेगा । अरविंद आश्रम के माताजी ने इस बात की पुष्टि की थी । क्यूँ न हनुमानदासजी का अभिप्राय जान ले ?
हनुमानदासजी ने मेरी बात शांतिपूर्वक सुनी फिर कहने लगे पाकिस्तान का नाश नहीं होगा । इससे विपरित, दिल्ली में उनका शासन होगा ।
'कितना वक्त दिल्ली में उनका शासन रहेगा ?'
'एक साल से थोडा कम ।' उन्होंने उत्तर दिया ।
मैंने पूछा, 'एसा कब होगा ?'
'पाँच साल में । अब तो हिन्दुओं पर त्रास होना बाकी है ।'

मुझे लगा की चंद बारोट जैसे कोई कवि की उक्ति को याद करके हनुमानदासजी एसी बातें कर रहे है । मगर इस खयाल को मैंने मन के अंदर ही दफना दिया । वक्त कम था और हमें वार्तालाप पूर्ण करके वापिस जाना था । निकलने से पहले मैंने उनको दो प्रश्न पूछे ।

'वर्तमान समय में सांईबाबा की महिमा चारों और फैल रही है । उन्होंने १९१८ में देहत्याग किया था फिर भी वो अपने भक्तों को दर्शन देते है, उनकी सहायता करते हैं । क्या समाधि लेने के बाद एसे महापुरुष किसी व्यक्ति को दर्शन दे सकते है ?'
उन्होंने कहा, 'हाँ, योगीपुरुष अपने देहत्याग के बाद भी दर्शन दे सकते है ।'

बात करते-करते आधा घण्टा हो गया । घडी के मुताबिक सुबह के साडे दस बज चुके थे । हम उठने वाले थे की माताजी ने प्रश्न पूछा: 'इनके (मेरे) उपवास कब छूटेंगे ये तो कहो । इस बार तो उपवास बहोत दिनों तक चले ।'
हनुमानदासजी ने जवाब दिया, 'उपवास तो जब मरजी हो छूट सकते है । यहाँ पानी रक्खा है, अगर पीना है तो पी सकते हैं और नहीं पीना है तो नहीं । ये तो मन की बात है ।'

हनुमानदासजी का उत्तर सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने कहा: 'उपवास ना तो मेरी मरजी से होते है और ना ही मेरी मरजी से खत्म होते है । इनके पीछे इश्वर की इच्छा और प्रेरणा होती है । आप सिर्फ ये बताओ की इसे पूर्ण करने की इश्वर की आज्ञा कब होगी ?'
इतनी स्पष्टता करने के बाद उन्होंने अपनी बात दोहरायी: 'ईश्वर की प्रेरणा जैसा कुछ नहीं है । जब मन में आये अनशन छूट सकते है । मैंने अभी तो बताया की पानी पडा है, पीना है तो पी लो ।'

मगर मैं उनकी बात कैसे मान लूँ ? जिन्होंने मेरी आत्मकथा पढी है, वो भलीभाँति जानते है की माँ की प्रेरणा मिलने पर मैं उपवास और व्रत रखता हूँ और उनकी आज्ञा मिलने पर ही उसे खत्म करता हूँ । इसे मन का खेल कैसे मान लूँ ?

मुझे लगा की हनुमानदासजी इश्वरीय प्रेरणा के अनुभव से वंचित है । तभी वो मेरी बात समज नहीं पा रहे, और उसे मिथ्या या निरर्थक मानने-मनाने का साहस कर रहे है । अंतःप्रेरणा या इश्वरीय प्रेरणा का अनुभव प्रत्येक साधक को नहीं होता । साधना करके सिद्ध हो चुके व्यक्ति के जीवन में भी एसे अनुभव बहुत कम देखने को मिलते है । इसलिये जब कोई साधक अपने अनुभव की बात करता है तो इसे 'मन की कल्पना' या 'मन का खेल' कहने की जल्दबाजी कर बैठते है । मगर जिन्हें एसा अनुभव हुआ है, वो इससे संमत कैसे हो सकते है ?

हनुमानदासजी के साथ सत्संग समाप्त करके हम निकले । 'दर्शन' मेगेजिन में प्रकाशित किये गये लेख को याद करके मुझे लगा की लोग संतपुरुषों का पूरा परिचय प्राप्त किये बिना ही उनके बारे में अतिशयोक्तिभरे अभिप्राय बाँध लेते है । इससे जनसमाज की कुसेवा होती है । मेरे कहने का ये मतलब नहीं है की हनुमानदासजी मुझे अच्छे संत नहीं लगे । तीस साल जनसमाज से दूर एकांत में रहने के लिये कितना मनोबल चाहिये और बाह्य विषयों के प्रति कितनी उदासीनता चाहिये इसका अंदाजा मुझे है । लोग अगर मेरे नजरिये से देखेंगे तो उनको भी हनुमानदासजी पर प्रेम होगा । वो दंभ तथा बाह्य आडंबर से मुक्त थे । मगर इससे उनकी रमण महर्षि से तुलना करना ठीक नहीं है । विचारों की उच्चता तथा आध्यात्मिक अनुभवों की गहराई की दृष्टि से देखा जाय तो उनका स्थान लोकोत्तर या असाधारण नहीं लगा । वो त्रिकालज्ञ है एसा भी नहीं लगा । किसी माहिती के आधार पर अभिप्राय देने के बजाय उन्हें खुद के अनुभव पर आधारित अभिप्राय देने चाहिये वरना मौन रखना चाहिये । उनकी सादाई, तथा सरल स्वभाव प्रसंशनीय था इसमें दोराय नहीं है । उनका स्मरण करके मैं उनको प्रणाम करता हूँ ।

महात्मा हनुमानदासजी को अलविदा कहकर हम समीपवर्ती सरिता में स्नान करने गये । फिर स्टेशन आये और भावनगर के लिये प्रयाण किया । दुसरे दिन हमें महुवा पहूँचना था ।

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