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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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ऋषिकेश की भूमि वैसे तो सुंदर और आकर्षक है मगर ग्रीष्म ऋतु में यहाँ बहुत गर्मी पडती है । जब तक अच्छी बारीश नहीं हो जाती, इतनी गर्मी लगती है की न पूछो बात । यहाँ तक की मन को ध्यान में पिरोना कठिन हो जाता है । फिर भी इश्वर की इच्छा मानकर हम ऋषिकेश में रहें । पुराणप्रसिद्ध ऋषिकेश की भूमि में हमारे दिन अच्छी तरह से कटने लगे ।

बारीश होने पर यह भूमि स्वर्ग से अधिक सुंदर लगती है । धरती शस्यश्यामला हो जाती है, पर्वतों पर हरियाली छा जाती है, गंगा में अचानक बाढ आ जाती है । बारीश की मौसम में गंगाजी का दृश्य मन लुभावन होता है । यहाँ आकर मेरी साधना की सरिता गंगाजी की तरह पूरजोश में आगे बढने लगी । मुझे मिल रहे अंतरंग अनुभवों के कारण मेरे आनंद में इजाफा होता रहा । यहाँ मिले दिव्य अनुभवों में एक अनुभव भगवान बुद्ध का था ।

मेरे जीवन के प्रारंभिक काल में मुझे भगवान बुद्ध का साक्षात दर्शन हुआ था । बडौदा के उस अनुभव का जीक्र मैंने आत्मकथा के प्रारंभिक प्रकरणों में किया है । एसा ही एक अनुभव मुझे ऋषिकेश में मिला । वो दिन बुधवार तारीख ५ अक्तूबर, १९५५ का था । सुबह, जब मै ध्यान करने बैठा तो बोधि वृक्ष के नीचे बैठे हुए भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ । उनके शरीर पर श्वेत वस्त्र थे, उनकी मुखाकृति तेजोमय और शांत थी । उनके सर पर छोटी-सी जटा थी । आश्चर्य की बात थी की उनके गले में एक सफेद रंग का नाग था ।

नाग या साँप की कल्पना सामान्यतः भगवान शंकर के साथ मेल खाती है, इसलिये भगवान बुद्ध का एसा दर्शन मेरे लिये आश्चर्यजनक था । उसी समय मुझे अंतःप्रेरणा हुई की यह नाग माया का स्वरूप है । जैसे नाग या साँप व्यक्ति के मार्ग में बाधा खडी करते है, वासना परम सिद्धि के मार्ग में विघ्नरूप है । अगर साधक उस पर विजय प्राप्त करता है तो वह परमशांति, सिद्धि या भगवान बुद्ध की भाषा में, बोधि की प्राप्ति कर सकता है । वासना के अंकुर दिल की गहराईयों में होते है, उसे मिटाना आसान नहीं होता । अहंकार, ममता, रागद्वेष तथा स्वार्थबुद्धि की नागचूड से छुटने के लिये साधक को प्रयास करने चाहिये । तभी उसे भगवान बुद्ध की तरह बोधि की प्राप्ति हो सकेगी ।

भगवान बुद्ध के दर्शन से मुझे खुशी हुई । वितराग और इश्वरीय महापुरुषों के दर्शन हमेशा सुखकर होते है । उनके दर्शन से हमें प्रेरणा मिलती है, नया जोश तथा उत्साह मिलता है ।

भगवान बुद्ध का वो स्वरूप आज भी मानसपट पर तरोताजा है ।

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