आशा शब्द कितना मधुर और सुंदर है ! पीछले कुछ सालों से मेरा साधनात्मक जीवन उसीके सहारे चल रहा है, एसा कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । माँ की पूर्ण कृपा पाने के लिये मैं अपनी और से पूरी कोशिश कर रहा था और मुझे जो अनुभव मिलते थे, उससे मेरी उम्मीद बनी रहती थी । मैंने काफि सारा रास्ता तय कर लिया था, मगर मुझे मंझिल नहीं मिली थी । फिर भी, मुझे विश्वास था की एक दिन मेरा प्रवास पूर्ण होगा, और मैं अपने पूर्णता के लक्ष्य को हासिल कर लूँगा । इसी आशा और श्रद्धा के बल पर मैं चलता रहा । माँ ने मुझे निराश और हतोत्साह नहीं होने दिया ।
नवरात्री के अनशन खत्म हुए । अब मेरी नजर आनेवाली ज्येष्ठ पाँचम पर थी । पीछले साल, कम-से-कम सोलह बार मुझे एसे अनुभव मिले थे जिसमें कहा गया था की ‘अगले साल ज्येष्ठ सुद पाँचम के दिन देवप्रयाग में माँ के दर्शन अवश्य होंगे, और आपकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी ।’ हालाकि मुझे अच्छी तरह से पता था की एसा कहने पर भी कुछ नहीं होता । दिन मिथ्या सिद्ध होता है और मुझे अत्याधिक साधना करनी पडती है । एसे हालात में, दिल में उत्साह और उमंग बनाये रखने के अलावा कोई चारा नहीं था ।
देवप्रयाग में शांताश्रम की कुटिया चक्रधरजी ने जमीनदोस्त कर दी थी । अब देवप्रयाग जाकर रहूँ तो कहाँ रहूँ ये प्रश्न था । और अगर देवप्रयाग में रहने का इन्तजाम नहीं होता, तो पाँचम के दिन माँ का दर्शन कैसे होगा ? मगर माँ चाहे तो कुछ भी हो सकता है । उसके लिये कोई काम असंभव नहीं है । दिवाली के पहले चक्रधरजी मुझे मिलने आये । उन्होंने कहा की मैं कुटिया ठीक करवा दूँगा तो मुझे लगा की शायद पाँचम पर मेरा काम बन जायेगा ।
नवरात्री से दिपावली के बीच सांईबाबा ने दो बार दर्शन दिया और वार्तालाप किया । उनकी कृपा मुझ पर होती रही, ये मेरे लिये गौरव और आनंद की बात थी ।
पाँचम की प्रतीक्षा में, मैं नवरात्री के अनशन का कष्ट भूल गया । मुझे पूरी उम्मीद थी की इस बार मेरी दीर्घकालिन साधना का सुखद अंत होगा । मगर माँ की मरजी कुछ और थी ।
वादे के मुताबिक चक्रधरजी ने कुटिया निर्माण का काम शुरु नहीं किया । देवप्रयाग में रहने की व्यवस्था नहीं हुई इसलिये वहाँ जाने का कार्यक्रम रद्द करना पडा । तब जाके मुझे समज में आया की माँ ने देवप्रयाग जाने की जो प्रेरणा दी थी, वो आशा बनाये रखने के लिये थी ।
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दिन के बाद रात और रात के बाद दिन – काल चक्र निरंतर चलता रहता है । वो कहीं पर थमने का नाम नहीं लेता । सरिता का प्रवाह कहीं पर रुक जाय ये संभव है मगर वक्त तनिक ठहर जाय, ये नामुमकिन है । तभी तो, जिसे अपने जीवनकाल में कुछ हासिल करना है, उसे जल्द-से-जल्द कर लेना चाहिये ।
वैसे तो प्रत्येक दिन, प्रहर और घडी कीमती और महत्वपूर्ण है मगर मेरे लिये साधना की दृष्टि से नवरात्री का विशेष महत्व है । नवरात्री के दिनों में मैं अत्याधिक प्रबलता से माँ की कृपा के लिये तडपता हूँ, अनशन करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ ।
पिछले साल नवरात्री में ज्येष्ठ सुद पाँचम का दिन मिला था, मगर वो मिथ्या सिद्ध हुआ । इससे थोडा दुःख जरूर हुआ था मगर उम्मीद वैसी-ही बनी रही । साधना-पथ पर निराशा के लिये कोई जगह नहीं है । जैसे रात्री के बाद भोर होता है, वैसे ही साधक को नयी आशा, श्रद्धा और धीरज से हमेशा सज्ज रहेना है, और अपने लक्ष्य के प्रति गति करना है । तभी वो अपने गंतव्यस्थान पर पहूँच पायेगा, अपनी मनवांच्छित सिद्धि पा सकेगा ।
ऋषिकेश में मेरा निवास अब पूरा होनेवाला था । नवरात्री के दिन समीप में थे । इस बार माहौल कुछ एसा था की उपवास करने का मन न करें । कडाके की सर्दी के बीच लगातार एक सप्ताह बारीश हुई, सूर्यनारायण के दर्शन दुर्लभ हो गये । जोरों से हवा चली, गंगाजी उन्मत्त हुई । १९२० के बाद पहली बार गंगाजी में एसा प्रचंड पूर आया । इससे गंगातटवर्ती साधु-महात्मा की कुटियाएँ तहसनहस हो गयी । एसे विपरीत वातावरण में मेरा अनशन सुखरूप पूर्ण हुआ । दिल में साधना को लेकर जो उत्साह और उमंग था, वो बना रहा । आसपास के हालात को मैंने साधना पर हावी होने नहीं दिया । अपने ध्येय का विचार करके चलता रहा । मैंने कभी देश, काल, अनुकूल या प्रतिकूल संजोगों के बारे में नहीं सोचा । बस, साधना-यज्ञ में अपने शरीर और प्राणों की आहूति देता रहा । जो अपने शरीर और स्वास्थ्य के बारे में सोचता रहता है, वो व्रत, तप या उपवास कैसे करेगा ? मैंने शरीर के महत्व को कभी नजरअंदाज नहीं किया है, उसे हेय नहीं माना है । हाँ, केवल शरीर की सुखाकारी के बारे में सोचने के बजाय उसे ध्येयपूर्ति के लिये किसी भी कठिनाइयों से गुजरने के काबिल बनाया है ।

