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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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गीत लिखने की सूचना
समर्थ सिद्ध महापुरुष सांईबाबा का उल्लेख करते हुए मेरा हृदय खुशी से उछल पडता है । मैं अपने आपको बडा भाग्यशाली मानता हूँ की उनकी मुझ पर कृपादृष्टि है । कुछ साल पहले मेरे जीवन में उनका प्रवेश हुआ । फिर उन्होंने मेरे साथ रिश्ता जोडकर मुझे बारबार दर्शन देना शुरु किया । इनके बारे में, मैं पिछले प्रकरणों बता चूका हूँ । अब तो मैं जब उनके दर्शन के लिये प्रार्थना करता हूँ, या उनके मार्गदर्शन के लिये तरसता हूँ, तो वो अवश्य मुझे दर्शन देते है, और मेरा मार्ग प्रशस्त करते है ।

महेसाणा के निवास दौरान मैं सांईबाबा के दर्शन के लिये निरंतर प्रार्थना करता रहा और मुझे उनके दर्शनानुभव मिलते रहे । दिसम्बर महिने की बात है । सुबह चार बजे मेरी आँख खुल गयी । मैं अपने पलंग पर बैठा था । गुरुवार होने के कारण मैं सांईबाबा का स्मरण कर रहा था । अचानक मेरी दृष्टि मेरी बैठने की गद्दी तथा उसके सामने रक्खी गयी उनकी तसवीर पर पडी । उसे देखते ही मैं दंग रह गया । मेरी गद्दी पर सांईबाबा बैठे थे । यहाँ मैं पलंग पर बैठा था और वो नीचे मेरे आसन पर थे, इसलिये मुझे संकोच हुआ । मैंने कहा : प्रभु, आप नीचे बैठे हो और मैं उपर, ये ठीक नहीं लगता ।

वो बोले: 'कोई हरकत नहीं । आप जहाँ है, वहाँ ठीक है । प्यार में उँच-नीच नहीं होती । मैं आपको एक बात बताने आया हूँ ।'
मैंने पूछा, 'कौन-सी बात ?'
उन्होंने कहा: 'आज गुरुवार है । आज मेरे लिये एक गीत लिखना ।'
मैंने कहा: 'अवश्य लिखूँगा मगर उसके बदले में आपको मेरा एक काम करना होगा । इसे गीत लिखने की फीस समज लो ।'
'क्या ?' उन्होंने प्रश्न किया ।
'आपको फिर-से दर्शन देना होगा ।'
'आउँगा, अवश्य आउँगा ।' कहकर वो अदृश्य हो गये । एसे महापुरुषों को खडे होकर चलना नहीं होता है । वो अपनी दिव्य शक्ति से कहीं-भी, कभी-भी प्रकट हो सकते है । इस अनुभव के बाद मैंने उनकी सुचनानुसार एक गीत लिखा ।
*
महात्माजी कहकर बुलाते है
सांईबाबा की यह विशेषता रही है की वो दिव्य शक्ति से संपन्न थे, और दूसरों की सहायता करने हमेशा तैयार रहते थे ।

२६ दिसम्बर १९५६, बुधवार मागशिर्ष दसम के दिन सुबह शौचादि से निवृत्त होकर मैं बिस्तर पर लेटा था । तभी अचानक सांईबाबा ने आवाज लगाई 'महात्माजी ... महात्माजी' । उनकी तसवीर से ध्वनि आ रही थी, और उनके शब्द अत्यंत स्पष्ट थे । जब दूसरी दफा उन्होंने 'महात्माजी' कहा तब मैं सहसा जाग गया । आज भी इस अनुभव को याद करके मैं रोमांच का अनुभव करता हूँ ।
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दान करने की सूचना
सांईबाबा के बहुत सारे अनुभव मिल चुके है, उन सबके बारे में बताना उचित नहीं है । फिर भी प्रकरण के समापन में एक प्रसंग का उल्लेख करना ठीक समजता हूँ ।

सन १९५७ के जून-जुलाई मास में हमारा निवास साबरमती में था । वहाँ हमारी भेंट रक्षाबेन से हुई । उसकी उम्र सोलह साल की थी मगर उसकी श्रद्धा तथा सेवाभावना अनन्य थी । उन्हीं दिनों में रक्षाबेन को बुखार हुआ और तबियत नाजुक हो गयी । उसकी अच्छी सेहत के लिये मैंने सांईबाबा को प्रार्थना की । अषाढ सुद बीज के दिन सांईबाबा ने मुझे सूचना दि की 'सात रूपया दान करो, इससे उसका बुखार चला जायेगा ।'

मुझे दुविधा हुई की सांईबाबा ने दान करने को कहा, मगर दान किसे करना है ? फिर मैंने सात रूपया शिरडी सांईबाबा की सेवा में भेजने का निर्णय किया । दूसरे ही दिन रक्षाबेन को आराम मिल गया । अपने निर्णय के मुताबिक मैंने वो रुपये शिरडी भेज दिये ।

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