जब मैं देवप्रयाग रहता था तो मुझे कभी कभी एसा विचार आता था की मसूरी जैसे स्थान में रहना मिले तो कैसा ? मगर इश्वर की इच्छा के बिना एसा हो पाना मुमकिन नहीं था । मेरे जीवन का दारोमदार उसके हाथों में है, वो ही मेरा मार्ग प्रशस्त करता है ।
सन १९५६ में, जब मैं ऋषिकेश था, तो मुझे ध्यान में आदेश मिला की अगले साल मसूरी जाना है ।
मसूरी में कहाँ रहेंगे ?
नवभारत होटल में ।
वहाँ कितना समय रहना होगा ?
तीन महिना ।
इस प्रकार के आदेश मुझे कई बार मिल चुके थे इसलिये मुझे विशेष आश्चर्य नहीं हुआ । अगले साल हमने मसूरी जाने का कार्यक्रम बनाया । मसूरी के गांधी चौक बस अड्डे पर उतरकर हम रहने का ठिकाना ढूँढने लगे । बस अड्डे पर विज्ञापन कर रहें लोगों ने हमें उनकी होटलों में आने का आग्रह किया हम अपने तरीके से होटल देखने लगे ।
जब हमें कोई होटल पसंद नहीं आयी तो बस अड्डे से हमारे साथ चल रहा गढवाली गाईड बोला, आप मेरी होटल तो देखो, वो आपको जरूर पसंद आयेगी ।'
'कहाँ है तेरी होटल ?'
'बिल्कुल पास में है । वहाँ जाने में आपको कोई तकलिफ नहीं होगी । वो आपको जरूर पसंद आयेगी ।'
हम होटल देखने गये । कमरा साफसुथरा था, हमें देखते ही पसंद आ गया । जब हमने अपना सामान मंगवाया तो गाईड की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । कमरे में सामान लगवाने के बाद मैंने उसको पूछा: 'इस होटल का नाम क्या है ?'
उसने कहा: 'नवभारत होटल ।'
मुझे आश्चर्य और आनंद दोनों हुआ । यह इश्वर की योजना थी की हम नवभारत होटल में ठहरे । इश्वर की शक्ति किस तरह से काम करती है, ये सोचकर मैं भावविभोर हो गया । यहाँ हम बराबर तीन महिना रहें और हमारा निवास सर्व प्रकार से सुविधामय रहा । पीक्चर पेलेस के ठीक सामने स्थित इस होटल का बाद में विस्तरण करके वहाँ अप्सरा होटल का निर्माण किया गया ।
१९५७ से लेकर अगले छ साल तक हम नवभारत होटल में हर साल तीन महिना रहने लगे । अक्तूबर महिने में ठंड शुरु होने पर हम मसूरी से ऋषिकेश आ जाते थे । छे साल यहाँ रहने के बाद, १९६३ में, एसा अवसर उपस्थित हुआ की मुझे वहाँ की सत्संगप्रेमी जनता समक्ष प्रवचन करना पडा । प्रवचन करना मुझे पसंद नहीं था । हिन्दी में बोलने का मुझे कोई अभ्यास नहीं था । फिर भी थियोसोफिकल सोसायटी के आग्रहभरें निमंत्रण को मान देकर मुझे योग के विषय पर बोलना पडा । प्रवचन का कार्यक्रम अच्छा रहा । मसूरी की सुशिक्षित और सत्संगप्रिय जनता को मेरा व्यक्तव्य पसंद आया । लोग बडे आदर से मुझे देखने लगे ।
दूसरा प्रवचन जनमाष्टमी के दिन मसूरी की विख्यात चित्रशाला के मध्यवर्ती कक्ष में आयोजित किया गया । प्रवचन का विषय भगवान कृष्ण का जीवन था । व्यासपीठ पर मेरी बेठक के पीछे दिवार पर भगवान कृष्ण का आकर्षक तैलचित्र था । उसे ताजे गुलाब का हार पहनाया गया ।
प्रवचन खत्म होने पर मैंने भगवान कृष्ण के नाम की धून शुरु की । वातावरण भक्तिभावपूर्ण हो गया । तब एक घटना घटी । धून की समाप्ति होने पर भगवान कृष्ण को पहनायी गयी माला में से गुलाब का एक फूल मेरे मस्तक पर गिरा । वहाँ से फूल मेरी गोद में और फिर व्यासपीठ पर आकर गिरा । लोगों को यह देखकर बडा आश्चर्य हुआ ।
कार्यक्रम की समाप्ति हुई । भगवान कृष्ण की पुष्पप्रसादी को लेकर भाविक भक्तजन भातभात के तर्क करने लगे । लोगों की समज में यह नहीं आया की माला में से एक फूल कैसे नीचे आया ? मुझे लगा की हमारे संकीर्तन से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने मुझे आशीर्वाद दिया । इससे मेरा कार्य और फैलेगा, अधिक सार्थक होगा ।
दूसरे साल भी एसी घटना घटी । गांधी निवास सोसायटी के होल में मेरे प्रवचनों की पूर्णाहुति हो रही थी । संकीर्तन समाप्त होने पर भगवान कृष्ण के तैलचित्र को पहनाई गयी माला में से एक पुष्प मेरे सर पर होते हुए व्यासपीठ पर आकर गिरा । मैंने उसे भगवान कृष्ण का आशीर्वाद समजा । लोगों को यह घटना आश्चर्यकारक लगी ।
इन दो घटनाओं का कारण जो भी हो, उसके बाद मेरा मसूरी निवास सर्व रूप से सफल रहा । मसूरी की जनता का आदर मेरे लिये बढता गया । परमात्मा की कृपा से मेरा मार्ग प्रशस्त होता रहा, और लोगों का अपार स्नेह मिलता रहा । इस घटना को याद करके मेरा अंतर आज भी अनोखी भावोर्मि का अनुभव करता है । परिमल से परिप्लावित पुष्प के रुप में परमात्मा ने मुझ पर जो कृपावर्षा की थी, वो मेरे लिये चीरविस्मरणीय हो गयी ।
कहा जाता है की भक्तश्रेष्ठ नरसिंह महेता को उनकी प्रार्थना के प्रत्युत्तर में हार पहनाया गया था । मैं कोई एसा महान भक्त नहीं हूँ, ना ही मेरी भक्ति असाधारण है । मैंने एसी प्रार्थना का आधार भी नहीं लिया था फिर भी भगवानने मुझ पर कृपावर्षा की । जो अपने भक्त को पुष्पमाला पहना सके, उसके लिये एक फूल देना क्या बडी बात है ? वो सर्वशक्तिमान है, वो क्या नहीं कर सकता यही प्रश्न है । इस अलौकिक घटनाप्रसंग के बाद मुझे यकीन हो गया की नरसिंह महेता को भगवानने अवश्य हार पहनाया होगा ।

