Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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प्रश्न – कतिपय लोगों का मानना है कि पशुओं का बलि देने से देवी प्रसन्न होती है । कुछ पंडित भी ऐसा कहते हुए सुने गए हैं कि शास्त्रों में पशुओं के बलिदान का समर्थन किया गया है । तो उनके कथन को क्या माना जाय - सच या जूठ ॽ देवी की प्रसन्नता के लिए पशु-बलि क्या अनिवार्य या आवश्यक है ॽ
उत्तर – देवी की प्रसन्नता के लिए पशु-बलि अनिवार्य या आवश्यक बिलकुल नहीं है । देवी को प्रसन्न करने के लिए आवश्यक है केवल सच्चे दिल के उत्कट और प्रखर प्रेम की । मनकी निर्मलता के बिना यह प्रेम प्रादुर्भूत नहीं होता । ऐसा प्रेम प्रकट होने पर दिल देवी के दर्शन के लिये तड़पने व तरसने लगता है, आकुल व्याकुल हो जाता है । ऐसी तड़पन और बेकरारी के बिना देवी-देवता, इष्ट-देव या ईश्वर का दर्शन नहीं हो सकता ।

प्रश्न – तो पशु-बलि की प्रथा व्यर्थ है ॽ
उत्तर – व्यर्थ ही है । न्याय, नीति और सत्य की दृष्टि से अगर आप सोचेंगे तो आपको या किसी अन्यको भी यह बात व्यर्थ या निरर्थक लगेगी । जिस महान भारतीय संस्कृति, धर्म या दर्शनने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उपदेश दिया है, चराचर में परमात्मा के पुनीत प्रकाश की झाँकी करके सबके प्रति प्यार रखने की तथा सबके हित में रत रहने की सूचना दी है, मन वचन एवं काया से किसीका किंचित भी बुरा न करने की सलाह दी है, वह संस्कृति, धर्म या दर्शन देवी देवता की प्रसन्नता के लिये भी जीव-हत्या का आदेश कैसे दे सकता है ॽ देवी देवता की प्रसन्नता के लिए तो उसने आसान पद्धति ढूँढ निकाली है । तदनुसार मुट्ठीभर चावल रखने से, श्रीफल या सुपारी रखने से और कुछ न हो तो दो हाथ जोडकर मस्तक नँवाकर पैरों पडने से, प्रेमपूर्ण गीत गाने से या प्रार्थना करने से देवी या देवता प्रसन्न होते हैं । ऐसे आसान, सीधा और निष्कलंक मार्ग का त्याग कर हिंसा के अनैतिक मार्ग का आश्रय क्यों लेना चाहिए और वह भी शास्त्रों के नाम पर ॽ

प्रश्न – तो पंडितो के अनुसार शास्त्रों में पशु बलि का उल्लेख हुआ है वह गलत ही है न ॽ आपके कथनानुसार तो वह झूठा ही है न ॽ
उत्तर – शास्त्रोक्त पशु-बलि की बात झूठी नहीं है परंतु उसका अर्थ तनिक भिन्न है । उसका भावार्थ लेना है, शब्दार्थ नहीं । शब्दार्थ ग्रहण करने से ही यह गलतफहमी फैली है ।

प्रश्न – पशुबलि का भावार्थ क्या होता है ॽ
उत्तर – पशु शब्द का अर्थ पशुता लेना है । पशु का अर्थ पशुभाव, पशुता, अज्ञान या अहंकार से युक्त जीव भाव होता है । इसके कारण ही मनुष्य को देवी-देवता, इष्ट या ईश्वर का दर्शन नहीं हो पाता । शास्त्रों ने देवी-देवता, इष्ट या ईश्वर की प्रसन्नता के लिए, उसका बलिदान देने का अथवा छुटकारा पाने के लिए कहा है । यही पशुता, अज्ञान या अहंकार के कारण जीव शिव से दूर है, वह शिव का सान्निध्य नहीं पा सकता । इससे मुक्ति पाकर देवी-देवता या ईश्वर के चरणों में गर्व समर्पण करने की जरूरत है । पशु-बलि का अर्थ ऐसा गहन एवं आध्यात्मिक है । परंतु जिस तरह दूसरे भावार्थ लुप्त हो गये हैं, उसी तरह समय के चलते पशु-बलि का भावार्थ भी विस्मृत हो गया और देवी की प्रसन्नता के नाम पर जहाँ तहाँ पशुओं की घोर हत्या होने लगी । यज्ञ में भी यही परिस्थिति पैदा हो गई । भगवान बुद्ध और महावीर जैसे महापुरुषों ने इस प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई । अर्वाचीन काल में वेदों का अध्ययन करनेवाले आलोचक महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी बलि की इस प्रथा को गलत सिद्ध की । इसलिये पशु-बलि की यह पद्धति तनिक भी आवकार्य नहीं है । इसे अच्छी तरह समझ लीजिये ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)