प्रश्न – स्थितप्रज्ञ पुरुष की पहचान का एक महत्वपूर्ण लक्षण शांति के बारे में आपने बताया । इसके सिवा कोई और लक्षण बता सकते हैं आप ॽ
उत्तर – अवश्य । दूसरे अनेक लक्षण हैं । स्थितप्रज्ञ पुरुष का दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण ईश्वर साक्षात्कार अथवा ईश्वर के लिए अनंत प्रेम । प्रेम के बिना ईश्वर साक्षात्कार संभवित नहीं है । और बिना ईश्वर साक्षात्कार के परमात्मा के साथ सतत समागम नहीं होता । तात्पर्य यह कि सब के मूल में ईश्वरप्रेम है । उसे स्थितप्रज्ञ पुरुष का मेरुदंड कहा जा सकता है । उसी प्रेम से प्रेरित होकर वह ईश्वर साक्षात्कार के लिए साधना करता है और अंत में साक्षात्कार कर लेता है । मनुष्य को ईश्वर साक्षात्कार दो जगह, अपने भीतर एवं बाहर करना है । भीतर यानी अपने शरीर के भीतर और बाहर यानी संसार के सभी पदार्थों में । इस द्विविध साक्षात्कार को ही संपूर्ण साक्षात्कार कह सकते हे और इन्हीं से कृतार्थता हासिल होती है । स्थितप्रज्ञ पुरुष के लिए वैसा साक्षात्कार सहज हो जाता है और फलतः उसका मन हमेशा परमात्मामें ही रत रहता है । उसके मनमें, हृदयमें, प्राणों और रोम रोम में ईश्वर और केवल ईश्वर ही रहता है ।
प्रश्न – क्या इससे आप यह कहना चाहते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष को संसार के पदार्थों से प्रीति नहीं होती है ॽ अथवा शास्त्रों में जिसे वैराग्य की संज्ञा दी गई है वे उस वैराग्य की जीती जागती तसवीर है ॽ
उत्तर – वैराग्य के अभाव में वैसी असाधारण अवस्था की प्राप्ति संभवित नहीं है अतएव इस में कोई सन्देह नहीं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष वैराग्य की प्रतिमूर्ति होते हैं । लेकिन यहाँ लोगों में वैराग्य शब्द का जो रुढ अर्थ प्रचलित हुआ है, उसे यहाँ गठन नहीं करना है समझे ॽ वैराग्य यानी संसार के विषयों में राग न होना और परमात्मा में विशेष अनुराग होना । इस दृष्टि से देखा जाय तो स्थितप्रज्ञ पुरुष इस अर्थ के अनुवाद के समान हैं । अगर यह कहा भी जाये कि संसार के पदार्थों से उन्हें प्रीति हैं तो भी उन्हें राग या मोह नहीं होता । अगर आप प्रेम और राग या प्रेम और मोह के भेद को समझ सकें तो इस कथन को भी आसानी से समझ सकेंगे ।
प्रश्न – क्या स्थितप्रज्ञ पुरुष कार्य करते हैं या नहीं ॽ
उत्तर – बिना कर्म किये कौन रह सकता है ॽ प्रत्येक देहधारीको कर्म करना ही होता है । उससे एक या दूसरे प्रकार के कर्म होते ही रहते है । किंतु स्थितप्रज्ञ किसी भी प्रकार के अहंभाव के बिना, परमात्मा की प्रेरणा से प्रेरित होकर कर्म करता है । उसे न तो उस कर्म में आसक्ति होती है न उसके फल में । वह दूसरे के लिए हितकर होता है । दूसरों के हितरूप यज्ञों की वेदी में अमूल्य आहुति के रूप में होनेवाले वे कर्म संसार के लिए हितकर सिद्ध होते हैं । वे कर्म कदापि बंधनरूप नहीं होते । सामान्य मनुष्य के कर्म इस प्रकार के नहीं माने जा सकते । वे तो विवेकरहित, अहंभाव से युक्त, राग द्वेष एवं आसक्ति से भरे, शुभाशुभ असरों से पूर्ण एवं बंधनकारक होते हैं । जब कि स्थितप्रज्ञ पुरुष कर्म करते हैं फिर भी वे उनके असर से अलिप्त रहते हैं । यह अलिप्तता अथवा अनासक्ति और परहितपरायणता स्थितप्रज्ञ पुरुष के महत्त्वपूर्ण लक्षण है ।
प्रश्न – जो महात्मा किसी प्रकार के सक्रिय कार्य या सेवा नहीं करते, भाषण, प्रवचन या प्रचार नहीं करते परंतु एकांत स्थलों में जीवन बिताते हैं उनसे क्या फायदा ॽ उन्हें एकांत का त्याग करके लोगों के बीच प्रचार हेतु आना चाहिए, एसा आपको नहीं लगता ॽ
उत्तर – आपका प्रश्न दो भागों में विभक्त हुआ है । अतएव दोनों पर विचार करना पडेगा । आप अगर यह मानते हैं कि भाषण या प्रवचन करने में और प्रचार के लिये दौड़धूप करने में ही सेवा की इतिश्री है तो यह असमीचीन है । सेवा का क्षेत्र तो बहुत विशाल है । स्थूल पद्धति की अपेक्षा अन्य अनेक पद्धतियों से सेवा की जा सकती है । गीता का कथन है कि योगीजन शरीर, मन और केवल इन्द्रियों से भी कर्म करते हैं ।
दूसरी बात यह है कि आपके और महात्माओं के दृष्टिकोण में आसमान जमीन का अन्तर हो सकता है । आपके इन्द्रियों के पदार्थ एवं सांसारिक विषय महात्माओं के लिये क्षुद्र है । जीवन की समूची शक्ति का उपयोग ईश्वर-प्राप्ति या मुक्ति के लिये करना ही महान सेवा है ऐसा वे मानते है । वे कहते हैं आप किसकी सेवा करने दौडते हैं । आप दूसरों की सेवा भले ही करें किंतु आपको अपनी सेवा भी करनी है । बंधन से मुक्त होकर आपको मुक्ति का आनंद उठाना है । आत्मा की साधना द्वारा परमात्मा के साक्षात्कार करके अल्प मिटकर विराट बनना है । मनुष्य जीवन का सबसे श्रेष्ठ पुरुषार्थ यही है । इस पुरुषार्थ की उत्कट भूख लगने के कारण ही महात्मा एकांतवासी बनकर तप करते हैं अतएव वे सेवा नहीं करते ऐसा कैसे कहा जा सकता है ॽ उनका दर्शन, वचन एवं जीवन संसार के लिये प्रेरणाप्रद है इसमें कोई सन्देह नहीं । इतनी उत्कट भूख जिसमें नहीं जगी वे कर्म के बाह्य मार्ग पर विकास करते हैं । शेष यह कि उपरोक्त कोटि के महात्मा तो अपने आध्यात्मिक आदर्श को सिद्ध करने के बाद ईश्वरेच्छा के अनुसार बाह्य कर्म में जुट जाते हैं । ऐसे महात्माओं से संसार को अत्यधिक लाभ होता है । ये महात्मा ही लोगों को आत्मिक विकास की याद दिलाते हैं । दूसरे कंचन कामिनी और कीर्ति के लिये दौड-धूप करनेवाले लाखों लोगों की अपेक्षा वैसे एक ही संतपुरुष से संसार को ज्यादा लाभ होता है ।
- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

