प्रश्न – चमत्कारों का धर्म या ईश्वर के साथ कोई सम्बन्ध है क्या ॽ
उत्तर – जिस प्रकार के चमत्कारों की बात आप करते हैं अथवा सामान्यतया लोग जिसे चमत्कार मानते हैं, इस प्रकार के चमत्कार जादू विद्या के प्रयोग जैसे होते हैं । अक्सर इन चमत्कारों का मूल मैली विद्या में होता है । ये चमत्कार ज्यादातर लोकरंजन के लिए या कीर्ति तथा धनप्राप्ति के लिए किए जाते हैं । उनका आश्रय लेनेवाला उच्च कोटि का आध्यात्मिक विकास कर चुका है या करना चाहता है ऐसा हम नहीं कह सकते । ऐसे चमत्कारों का धर्म, ईश्वर, आध्यात्मिकता या मनुष्य के वैयक्तिक विकास के साथ तालुक्क न हो यह आसानी से समझ सकते हैं लेकिन चमत्कारों का एक दूसरा प्रकार भी है जिसका धर्म, ईश्वर, आध्यात्मिकता या मानव के वैयक्तिक विकास के साथ वास्ता हो सकता है ।
प्रश्न – ये कौनसा प्रकार है इस पर आप प्रकाश डाल सकते हैं ॽ
उत्तर – अवश्य, इस प्रकार के बारे में मैं प्रकाश डालूँ उसके पहले यह समझ लीजिए कि उसे चमत्कार के अति प्रचलित नाम से पहचानने के बदले उसे विशेष शक्ति या सिद्धि के नाम से पहचानना अधिक उचित होगा । चमत्कार शब्द की ध्वनि में एक प्रकार की अलग व्यंजना निहित है । इस शब्द में किसीको दंग कर देनेवाले जादू के प्रयोगों का भाव समाविष्ट है । लोग प्रायः इस शब्द को इसी तरह पहचानते हैं परंतु हम जिसकी बात कर रहे हैं वह शक्ति भिन्न है । आत्मोन्नति की दिशामें आगे बढ़नेवाले साधकको उसकी उपलब्धि स्वतः अथवा स्वाभाविक रूपसे ही होती है । फूल में जैसे सुगंध, मध में मीठास और सूर्य में प्रकाश सहज होते है उसी तरह साधना में तरक्की करनेवाले साधक या सिद्धपुरुष में इस शक्तिका प्रादुर्भाव कुदरत के नियमानुसार खुद-ब-खुद ही होता है । अमुक प्रकार के प्राणायाम से, निरंतर ध्यान या समाधि के अभ्यास से, ईश्वर-दर्शन से या तो मंत्रानुष्ठान से ऐसी असाधारण शक्ति का उद्भव होता है । उद्भूत शक्ति धीरे धीरे विकसित होती है । सामान्य जन उसे चमत्कार के नाम से पहचानते हैं परंतु चमत्कार शब्द उसके लिए उचित नहीं है । चमत्कार शब्द आध्यात्मिक विकास का परिचायक नहीं है । इसलिए मैं विशेष शक्ति या सिद्धि ऐसे शब्द का प्रयोग करता हूँ ।
प्रश्न – आत्मिक विकासकी ओर अग्रसर होनेवाले हर साधकको ऐसी शक्ति प्राप्त होती है ॽ
उत्तर – न्यूनाधिक रूपमें होती है । कतिपय समय बहुत लम्बे अरसे के बाद होती है, फिर भी शक्ति का मोह रखनेके बजाय साधकको सर्वशक्तिमान ईश्वरका ही मोह रखना चाहिए और परमात्माके प्रत्यक्ष परिचय या साक्षात्कार के लिए ही साधना करनी चाहिए । जो शक्ति के पीछे पड़ता है वह सर्वशक्तिमान प्रभुको भूल जाता है और गलती करता है । शक्ति की अपेक्षा शक्ति के स्वामी महान है यह याद रखना है और अपने जीवन के ध्येय के रूपमें शक्ति नहीं पर उसके स्वामी की पसंदगी करनी चाहिए । शक्ति न होने पर भी जीवन का कल्याण हो सकेगा मगर परमात्मा के बिना जीवन की सार्थकता हासिल नहीं होगी ।
प्रश्न – सिद्धियों में पड़कर होश गँवा बैठने का या रास्ता भूल जानेका डर रहता है क्या ॽ
उत्तर – रहता है किन्तु निर्बल मन के, विषयलोलुप साधकों के लिए । जिसका मनोबल मजबूत है और जिसके मनमें ईश्वर के बिना किसी भी चीज की लालसा नहीं है उसको भय रखने की जरूरत नहीं है । ना, सपनों में भी नहीं । जिनका मनोबल दुर्बल है वह तो सिद्धि हासिल न हो, फिर भी अन्य साधकों की बातों में आकर अपने होश खो बैठेंगे या मार्ग भूल जाएँगें । वे तो सभी परिस्थितियों में असलामति का अनुभव करेंगे । याद रखिए कि उच्च कोटि के साधक विशेष शक्ति या सिध्धि के लिए व्यर्थ प्रयत्न नहीं करते, उसे आदर्श मानकर भी नहीं चलते । वे अपने साधनापथ में सहजरूप से मिलनेवाली शक्तियों का स्वीकार करते हैं । शक्तियाँ उन्हें पथभ्रांत न करे इतना आत्मबल उन्होंने हासिल किया होता है ।
- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

