Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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प्रश्न – मुझे एक प्रश्न बरसों से सता रहा है, वह यह कि यह भारतवर्ष में भूतकाल में अनेक श्रेष्ठ समर्थ महापुरुष हो गये हैं और आज भी वैसे साक्षात्कार प्राप्त समर्थ पुरुष विद्यमान हैं फिर भी देश की हालत क्यों नहीं सुधरती ॽ देश में अतिशय दुःख, दर्द, छल-कपट, रिश्वतखोरी, अनीति एवं गरीबी का बोलबाला हैं फिर भी ऐसे समर्थ महापुरुष क्यों कुछ भी नहीं करते ॽ
उत्तर – अतीत काल में हुए और वर्तमान काल में विद्यमान संतुपुरुष दो प्रकार के हैं । कतिपय संतपुरुष अपनी प्रकृति एवं समझ के अनुसार केवल आत्मविकास की साधना में ही दिलचस्पी लेते हैं और उसी में रत रहते हैं और इसी में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं । वे जगत के लिये सक्रिय कार्य करने में नहीं मानते जबकि दूसरे प्रकार के संतपुरुष अन्य की सेवा में मानते हैं इतना ही नहीं दूसरों की यथाशक्ति यथाशक्य सेवा करने के लिये तत्पर रहते हैं । संतपुरुषों के इन दो भेदों को समझ लेने से आप अपने प्रश्न को अच्छी तरह समझ सकेंगे ।

प्रश्न – वे भेद तो मेरी समझ में आ गये किंतु उनके ही संबंध में मैं पूछना चाहता हूँ कि दूसरे प्रकार के सेवाभावी, सेवापरायण संतपुरुष क्या संसार के विकृत वातावरण को बदल नहीं सकते ॽ क्या संसार को वे अधिक सुखमय या शांतिमय नहीं बना सकते ॽ वैसा करने के बजाय वे ऐसे सरिता तट पर या पर्वतों की प्रशांत गुफाओं में क्यों बैठे रहते हैं ॽ
उत्तर – जिस तरह आप सोचते हैं उस तरह सोचा जाय तो सर्वसमर्थ ईश्वर के लिए भी वही प्रश्न पूछने पडेंगे फिर भी संतपुरुषों की मर्यादा को वफादार रहकर यदि कहा जाय तो कह सकते हैं कि सभी सेवाभावी संत सरितातट या पर्वत की गुफाओं में नहीं रहते । वे बस्ती में हमारे बीच निवास करते हैं । वे संसार को अधिकाधिक सुख-शांतिमय बनाने की भरसक कोशिश करते हैं । वे संसार के विकृत वातावरण में आमूल परिवर्तन करने की साध रखते हैं किंतु इस इच्छा की पूर्ति क्या एकाएक बिना कुछ किए हो सकती है क्या ॽ एक हाथ से ताली नहीं बजती, समझे ॽ

प्रश्न – नहीं समझे ।
उत्तर – मतलब यह कि हमें भी प्रयत्न करना पडेगा । महापुरुषों की सेवा-पूजा करके या उनके गुणगान गा कर बैठे रहने के बजाय हमें उनके उपदेशों का आचरण करने के लिये कटिबद्ध होना पडेगा । उनके पास कोई जादूई लकडी नहीं है जिसके प्रयोग से वे सारे जगत को क्षणभर में बदल डाले । वे तो रास्ता दिखाते हैं । उस पर चलने का कार्य हमारा है । महर्षि व्यास से लेकर आजपर्यंत जो सन्त हुए हैं उन्होंने आदर्श जीवन का उपदेश हमें दिया है किंतु दुनिया ने उसका पालन शायद ही किया है । इसलिए गलती उनके उपदेश या प्रयत्न की नहीं किंतु उनको इमानदारी से ग्रहण और आचरण न करने की है । आचार की संहिता आज विस्मृत होती जा रही है । यही कारण है कि प्रजा के दुःखो में वृद्धि हुई है और अशांति एवं अनीति का साम्राज्य छा गया है । सृष्टि को सुखमय बनाने के लिए संतो के निर्देशित पथ पर उनके ज्ञानालोक से आगे बढने की आवश्यकता है । आइए उनके उपदेशों का जीवन में आचरण करें । जीवन और जगत की जड़ता इससे दूर हो जाएगी ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)