Mon, Nov 30, 2020

काम, क्रोध एवं वासना का त्याग

प्रश्न – सुख और दुःख किस उद्यान में होते हैं ॽ
उत्तर – सुख और दुःख एक ही डाली पर होनेवाले दो फूल हैं जो मनरूप चमन में होते हैं । मन में होनेवाले संकल्प-विकल्प उसके बीज हैं । इस मन के उद्यान के बिना दुनिया के किसी उद्यान में – युरोप, अमरिका या कहीं भी सुख और दुःख के फूल नहीं मिलेंगे । अतएव महापुरुष कहते हैं कि संकल्प रूपी बीज को नष्ट कर दो या उसको शुद्ध करो तभी शांति या समता रूपी फूल मिल सकेगा ।

प्रश्न – यदि संकल्प विकल्प को जला दिया जाएगा तो शेष कुछ भी न रहेगा ॽ
उत्तर – कुछ भी न रहेगा यह मानना गलत है । सबकुछ नष्ट हो जाने के बाद जो बचता है वह सत्य है । उसीको प्राप्त करके मनको उसीमें तन्मय कर देने की आवश्यकता है ।

प्रश्न – जगत में अज्ञान अत्यधिक है - इसके लिए क्या किया जाए ॽ
उत्तर – अज्ञान को दूर करने के लिए अपने आपको विशुद्ध निर्मल बनाइए । अपने हृदय में ज्ञान की ज्योत जलाइए । आप स्वयं मुक्त एवं पूर्ण बनें । इतना करने पर आप वैयक्तिक रूपमें दुनिया की बहुत बड़ी सेवा कर सकेंगे । तत् पश्चात् परमात्मा स्वयं आपका पथ-प्रदर्शन करेंगे । अगर पूर्ण विकास प्राप्त करने में असमर्थ हो तो यथाशक्ति दूसरे की निःस्वार्थ सेवा करें और पूर्णता के ध्येय को न छोडें । यदि आप परमज्ञान प्राप्त न करे तो दूसरों को क्या दे सकेंगे ॽ

प्रश्न – काम और क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए क्या किया जाये ॽ
उत्तर – सोचना चाहिए कि काम और क्रोध क्यों उत्पन्न होता हैं और वह किस पर होता है । ज्ञानी कहते हैं कि बिना ईश्वर के इस संसार में कुछ भी नहीं हैं । इस तरह सोचने से समझ में आयेगा कि काम क्रोध किस पर करना है । इस विचार पैदा होने से ही भेदभाव टलते हैं तथा काम एवं क्रोध का मूल कारण अज्ञान भी दूर होता है ।
जनसाधारण के लिए इसका आसान इलाज प्रभु के चरणों में प्रीति करना है । इससे हृदय स्नेहिल एवं पवित्र होगा तथा काम क्रोध स्वतः भाग जाएँगे । एकांत में बैठकर मनुष्य को अपनी दुर्बलता के लिए व्याकुल हृदय से रोना चाहिए, ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए । ऐसा करने पर ईश्वर उसकी कमजोरी को दूर करके उन्हें काम क्रोध जैसे दुर्गुणों से मुक्त करता है । प्रभु के चरणों में प्रीति होने से विषयों की आसक्ति स्वतः हठ जाती है उसमें कोई सन्देह नहीं । इसलिए सबसे उत्तम है – प्रभु के लिए प्रेम जगाने की कोशिश करें । ईश्वर-प्रेम जीवन की सभी समस्याओं का रामबाण इलाज है, इसमें कोई शक नहीं ।

प्रश्न – विषयों का भोग करते हुए क्या वासना का त्याग नहीं हो सकता ॽ
उत्तर – हो सकता है, किंतु यह काम दृढ मनोबलवाले पुरुषों का है । सामान्यतया मनुष्य भोगोपभोग में इतना आसक्त हो जाता है कि वह विवेकहीन हो जाता है, अपनी शक्ति नष्ट कर देता है और भोग की रसवृत्ति का त्याग करने में अशक्त हो जाता है । जनक की भाँति रहना आसान नहीं है । जनक तो पहले से ही ब्रह्मज्ञानी थे । उनका उदाहरण नहीं लिया जा सकता । वे तो अपवादरूप थे । वासना-त्याग का उत्तम और आसान उपाय है भोग से दूर रहना । मन को सत्संग में जोडिए । जो लोग भोग्य पदार्थों को न छोड सकें, उन्हें भी सत्संग करने की जरूरत है । इससे मन भोग्य पदार्थों से उपराम होकर प्रभुपरायण बनने लगेगा ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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Not everything that can be counted counts, and not everything that counts can be counted.
- Albert Einstein

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