Wednesday, September 30, 2020

जानकीनाथ सहाय करे जब

जनवरी १९६७ की बात है ।

राजस्थान के नगर कोटा में स्थित बी. एड कोलेज में इनाम वितरण का समारोह चल रहा था । इसमें मुझे भी निमंत्रण मिला था ।

समारोह का प्रारंभिक कार्यक्रम पूरा होने के पश्चात संगीत-स्पर्धा में इनाम-प्राप्त स्त्रीपुरुषों ने बारी-बारी से अपने गीत गाये ।

इस बीच एक तेरह-चौदह साल के लडके ने हार्मोनियम पर संत तुलसीदास रचित वह सुंदर गीत छेडा ।

‘जानकीनाथ सहाय करे जब, कौन बिगाड सके नर तेरो ?
सूरज मंगल सोम भृगुसुत बुध अरु गुरु वरदायक तेरो ।
राहु केतु की नहीं गम्यता, संग शनिचर होत उचेरो,
जानकीनाथ सहाय करे जब, कौन बिगाड सके नर तेरो ?’

गीत के सुमधुर स्वर सुनकर सब दंग रह गये । गीत का लय और सूर तो सुंदर था ही, उतना ही सुंदर था गानेवाला का कंठ । ईश्वर ने उसे अति अदभुत एवं अमृतमय कंठ दिया था । इस कंठ से अदभुत सुधासमान शब्द का आस्वाद लेकर श्रोताजन आनंदविभोर हो गये । सब के दिलों से अभिनंदन निकल पडे ।

गीत पूरा होने पर कोलेज का सभाखंड तालियों की गडगडाहट से गुँज ऊठा । सबने प्रसन्नता प्रकट की । इतना ही नहीं उस समारोह के प्रधान अतिथि के रूप में आए हुए कलेक्टर श्री सूद ने भी ताली देने में अपना स्वर मिलाया । किन्तु केवल ताली देकर वे बैठे न रह पाये । उन्होंने लडके को धन्यवाद भी दिया और उसके बारे में जानकारी भी हासिल की ।

उस लडके के पिता चल बसे थे । वे देशप्रेम से प्रेरित हो देश के लिए कुरबान हुए थे । यह जान कलेक्टर के मन में अनुपम भावना पैदा हुई । उन्होंने लडके को बुलाया और दूसरे दिन अपने बंगले पर आने के लिये कहा ।

लडके ने हामी भरी ।

‘कल शाम को मुझे मिलना । मैं घर पर ही हूँगा । मेरा बंगला देखा है क्या ?’ कलेक्टर ने पूछा।

लडके ने हाँ कही और कलेक्टर ने अपना पूरा पता दिया । लडका समझ गया । कलेक्टर ने उसे अपने यहाँ फिर आनेका कहा और समारोह के प्रमुख को एवं कोलेज के प्रधानाचार्य से कहा, ‘इस लडके कि आर्थिक हालत अच्छी नहीं लगती । मैं उसे यथाशक्ति – यथायोग्य सहायता अवश्य दूँगा ।’

लडका बडा प्रसन्न होकर अपनी जगह पर आके बैठ गया । नयी उमंग और नयी आशा उसमें पैदा हो गई ।

कलेक्टर की भावना देख मुझे बडी खुशी हुई । खास तो इस बात से कि वह लडका पितृहीन, निम्न आर्थिक स्थितिवाला, दीनहीन था लेकीन भाविजीवन की संभावनायुक्त और सहायता देने के लिए पूर्णतया सुयोग्य था । ऐसे साधारण बालक पर बताई गई माया, ममता सचमुच अनमोल थी । मुझे लगा कि अब लडके का जीवन सचमुच आसान बनेगा । कलेक्टर की सहानुभूति, सहृदयता एवं सामान्य व्यक्ति को सहायता देने कि वृत्ति के कारण मेरे मन में आदर की भावना पैदा हुई ।

और क्यों न होगी ? हमारे देश के छोटे-बडे अफसर और नेता यदि इसी तरह नम्रता से युक्त होकर दूसरों को मदद करने की भावना रक्खे और उस भावना का आचरण करे तो उनकी सहृदयता और सेवाभावना जनसमाज के लिए कितनी उपयोगी व आशीर्वादरूप हो सके ? कितनी कायापलट करनेवाली साबित हो ? अफसरों और नेताओं के दिलों में ही क्यों, सबके दिल में अगर यह भावना पैदा हो तो ? तो कितना अच्छा । सारे समाज की शक्ल बदल जाय ।

वे सहृदयी सज्जन कलेक्टर साहब श्री सूद, वह साधारण गरीब पर मधुर कंठवाला लडका, वह समारोह ... आज भी मेरी नजरों के सामने उपस्थित होता है । जो गीत उसने गाया वह गीत उसके जीवन का जीता-जागता उदाहरण बन गया । जानकीनाथ अगर सहाय करे तो उसका कौन बिगाड सके ? कोई नहीं । इतना ही नहीं, बिगडी हुई या बिगडती हुई जिन्दगी सँवर जाय । जानकीनाथ ही उस लडके की बिगडी जिन्दगी बनाना चाहते थे । तभी तो एकाएक आकस्मिक रूप से कलेक्टर का मिलाप करवा दिया और इससे भी आगे बढकर कलेक्टर के दिल में भावना पैदा की ।

कुछ भी हो, वह घटना मुझे बडी पावन लगी । इसी यादगार घटना को अक्षरदेह में अंकित करते हुए मैं फुला नहीं समाता । मुझे इस बात का विश्वास है कि उस लडके ने कलेक्टर की सूचनानुसार दूसरे दिन उनकी मुलाकात ली होगी और कलेक्टर ने उसे आवश्यक सहायता भी की होगी और इससे उस लडके के जीवन में नवजीवन की प्राणवान लहर दौड रही होगी।

‘जानकीनाथ सहाय करे जब ...’ तो क्या नही हो ?

इस गीत की पंक्ति मेरे कानों में ही नहीं परंतु समुचे अंतर में, अणुअणु में गूँज उठती है । धन्य है वह पंक्ति, धन्य उसका गायक, धन्य है उन श्रोताजनों को और धन्य है उसको जीवन में अनुवादित करनेवाले !

- श्री योगेश्वरजी

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