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आकर्षण का अर्थ

नियमित अभ्यास से मेरी सोच बिल्कुल बदल गई, काम और क्रोध के रहे-सहे अंकुर नष्ट हो गये और मन सहज शांति से संपन्न हो गया । उसमें पवित्र भाव और विचार उठने लगे । निर्मल प्रेम के आविर्भाव से मेरे रोमरोम में प्रसन्नता फैल पडी । प्रेम, पवित्रता और सुंदरता का मूर्तिमंत स्वरूप - माँ की झाँकी आसपास की सभी चिजों में होने लगी । उस कुमारी को पढ़ाने जब पास बैठता तब मेरी आंतरिक दशा एक बालक जैसी हो जाती थी । माँ जगदंबा के पवित्र प्रकाश की अनुभूति उस युवती के अंदर होती थी । उसकी आँखो में माँ का नूर और उसकी वाणी में माँ का सूर सुनाई देता था । मैं मन-ही-मन उसे प्रणाम करने लगा था । एक दफा तो मैंने सोचा की मेरी मनःस्थिति को बयाँ करूँ और उसके चरणों में झुककर साक्षात प्रणाम करूँ । मगर ईस विचार को मैंने रोक लिया क्योंकि ऐसा करने में कुछ जोखिम था । पहला तो ये कि मेरे मन के भाव मेरे तक ही सीमित रहै वो आवश्यक था और दूसरा, उसको प्रणाम करने से उसे या किसी ओर को गलतफहमी होने की गूँजाईश थी । अतः ये बात मेरे मन की गहराईयों में दबी पडी रही ।

   रात को सोने से पहले दिन का विश्लेषण करना, आत्मचिंतन करना और मंथन करके अपनी भूलों के लिए पश्चाताप करना मेरा क्रम बन गया था । ईससे मुझे काफि मदद मिली । रात के सन्नाटे में मैं माँ से हृदयपूर्वक प्रार्थना करता । संस्था के छात्रों के साथ मिलनाजुलना मैंने कुछ हद तक कम कर दिया और आवश्यकता से अधिक बातचीत करना भी बंद किया । शाम के बाद, देर रात तक संस्था की अगाशी में या फिर मैदान में चकडोल के पास मैं एकाग्रता से बैठता । कुछ छात्रों को शायद मेरे स्थान के बारे में पता चल गया । कुछ दिनों बाद वो लडकी को पता चला, शायद किसीने उसे बताया । वो मुझे ढूँढती हुई वहाँ चली आयी । तब मैं आँखे बंद करके माँ को प्रार्थना कर रहा था । मुझे देखकर वो हैरान हुई क्यूँकि उसने मुझे पहले कभी ईस तरह से नहीं देखा था । उसे आश्चर्य हुआ होगा कि एसे शांत और एकांत स्थल में, अंधरो के घर में बैठा, मैं क्या कर रहा था ? जब उसने मुझे पुकारा तब मुझे पता चला की वो यहाँ आयी थी ।

उसने पूछा, यहाँ क्या कर रहे हो ?

मैंने संक्षेप में बताया, कुछ भी नहीं ।

यह सुनकर वो मुझे पढाने के लिए घर आने का कहके चली गई ।

एक दिन शाम को मैं अगाशी में बैठे-बैठे आकाश में फैले सुंदर रंगो का मज़ा ले रहा था । वो अचानक आयी और मुझे पूछने लगी, आप यहाँ हररोज बैठते हो, उसकी क्या वजह है ? क्या आपको यहाँ बैठना अच्छा लगता है ?

मैंने कहा, क्यूँ नहीं ? मुझे एकांत में मजा आता है । शाम के वक्त पूरा आकाश तरह तरह के रंगो से भर जाता है, चिडीयाँ अपने घर लौटती है ..ये सब देखने में मुझे बडा मजा आता है । यहाँ बैठकर हररोज मैं ये देखा करता हूँ ।

मेरे एकांतप्रिय स्वभाव से वो कुछ हद तक वाकिफ हुई । उसे शायद लगा होगा कि मैं कुछ अच्छा कर रहा हूँ , अतः उसका मेरे प्रति सम्मान बढता गया ।

आज तो ये सब बाते पूर्वजन्म की हो ऐसी लगती है । आज मेरा जीवन संपूर्णतया बदल गया है । यहाँ तक की वो दिन मेरी जिन्दगी का कभी हिस्सा थे एसा भी नहीं लगता । शायद एसा जरूरी भी न हो । जीवन तत् पश्चात् कई अवनविन अनुभवो में से गुजरकर आगे बढा है । उन दिनों की याद किये बिना भी मैं अच्छी तरह से जीवन यापन कर सकता हूँ, लेकिन फिर भी वाचको कों मेरी उन दिनों की मनःस्थिति का अंदाजा हो, मेरे जीवनप्रवाह का ज्ञान हो, इसी वजह से और ईश्वर की ईच्छा से ये सब लिख रहा हूँ ।

लड़की के पिताजी का स्वभाव बहुत अच्छा था और उनको मेरे लिये सदभाव था । मेरे चारित्र्य पर उनको पूरा भरोसा था । अगर मेरे वर्तन में या उस लडकी के व्यवहार में कोई बदतमीजी या गलत बात दिखाई दी होती तो वो हमें अवश्य सावधान करते । शायद उनके घर जाकर पढाने का मेरा क्रम या अधिकार भी समाप्त हो जाता, लेकिन एसी कोई घटना नहीं घटी । ईश्वर ने मेरी पवित्रता की रक्षा की, मेरे तन और मन की निर्मलता को कायम रखी ।

उस कुमारी के मन में मेरे लिए क्या भाव थे उसका तो मुझे अंदाजा नहीं था । शायद उसकी उम्र कम होने की वजह से उसकी सोच में फर्क हो सकता था । मेरे मनमें तो उनके प्रति पवित्र प्रेम का सागर भरा हुआ था । वो विशुद्ध प्रेम ही था, उसमें काम या मोह का अंश नहीं था । तभी मेरा जीवन विशुद्ध और उर्ध्वगामी हो पाया और आध्यात्मिकता के परमाणु उसमें निखर उठे । अगर उसका स्थान मोह या काम ने लिया होता तो परिस्थिति कुछ अगल होती, जीवन निर्मल होने के बजाय मलिन होता, साधना का प्रवाह रुक जाता और जीवन अशांति और पतन की गर्ता में चला जाता । लेकिन ईश्वर बड़ा दयालु है, उसकी ईच्छा हमेशा मंगलकारी होती है । मेरे लिए उसने बडी मंगलकारक योजना बनायी थी ।

प्रेम और आकर्षण के बारे में लोग तरह तरह की बातें सोचते है । एक आदमी को दुसरे आदमी के प्रति आकर्षण होता है तब क्या होता है ? ये हि की एक व्यक्ति का आत्मा दुसरे व्यक्ति में रहे आत्म-तत्व के साथ एकता या संयोग करने का प्रयास करता है । ये आकर्षण केवल मनुष्यों के लिए मर्यादित नहीं मगर पशु-पक्षी और यहाँ तक की जड-चेतन सभी पदार्थो में होता है । सृष्टि के कणकण में परमात्मा का वास है ईसलिए जब भी किसी व्यक्ति को किसी ओर व्यकित या वस्तु से आकर्षण होता है तब उसे सोचना चाहिए की ये आकर्षण ना तो वो वस्तु या व्यक्ति से हो रहा है, मगर उनमें बसे परमात्मा के चेतन तत्व से हो रहा है । पुरुष अगर ईस तरह से किसी स्त्री के बारे में और स्त्री ईसी तरह किसी पुरुष के बारे में सोचेगी तो उनका परस्पर आकर्षण उनकी आत्मिक उन्नति में बाधाजनक होने के बजाय सहायरूप होगा । ज्यादातर लोग आकर्षण का उपयोग आत्मोन्नति के लिए नहीं मगर भोगों के उपभोग के लिए करते है । वे आकर्षण की वस्तु या व्यक्ति में फँस जाते है, उससे छुटने का कोई प्रयास नहीं करते । समझदार आदमी को चाहिए की वो उससे पर रहें और सब में व्याप्त ईश्वरी सत्ता का अनुभव करे । अगर सच्चे दिल से प्रयास किया जाय तो कामवासना से मुक्ति पाना मुश्किल नहीं है । आकर्षण और प्यार कोई बुरी चिज नहीं, सिर्फ उसका उपयोग आत्मा की एकता के लिए होना चाहिए । तभी वह सही मायने में वंदनीय और मुक्ति के साधन माने जायेंगे ।

मेरे जीवन की अत्यंत भावुक अवस्था और विकास के मुश्किल काल में जाने-या-अनजाने में सहायता पहूँचाने के लिए मैं उस कुमारी का अत्यंत शुक्रगुजार हूँ । माँ के उस स्वरूप को में शत शत वंदन करता हूँ ।

 

Today's Quote

Let us not pray to be sheltered from dangers but to be fearless when facing them.
- Rabindranath Tagore

prabhu-handwriting

Shri Yogeshwarji : Canada - 1 Shri Yogeshwarji : Canada - 1
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
Shri Yogeshwarji : Canada - 2 Shri Yogeshwarji : Canada - 2
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
 Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA
Lecture given at Los Angeles, CA during Yogeshwarji's tour of North America in 1981 with Maa Sarveshwari.
Darshnamrut : Maa Darshnamrut : Maa
The video shows a day in Maa Sarveshwaris daily routine at Swargarohan.
Arogya Yatra : Maa Arogya Yatra : Maa
Daily routine of Maa Sarveshwari which includes 15 minutes Shirsasna, other asanas and pranam etc.
Rasamrut 1 : Maa Rasamrut 1 : Maa
A glimpse in the life of Maa Sarveshwari and activities at Swargarohan
Rasamrut 2 : Maa Rasamrut 2 : Maa
Happenings at Swargarohan when Maa Sarveshwari is present.
Amarnath Stuti Amarnath Stuti
Album: Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji; Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
Shiv Stuti Shiv Stuti
Album : Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji, Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
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