मंथन के दिनों में भी साधना का क्रम जारी रहा । ध्यान और प्रार्थना में मेरी विशेष रुचि थी । उससे मुझे शांति मिलती थी । आध्यात्मिक साहित्य का पठन भी जारी था । बंबई में मैंने स्वामी रामतीर्थ के बारे में थोडा पढा था । बडौदा में उनका जीवनचरित्र मेरे हाथ लगा । उसने मुझे प्रभावित किया । खास करके हिमालय के विविध वर्णनो ने मेरा मन मोह लिया । वैसे भी मैं हिमालय की ओर आकर्षित था । हिमालय जाने का खयाल मेरे दिल में बार-बार आने लगा । हिमालय के शान्त और एकान्त प्रदेश में साधना करने का सौभाग्य पाने के लिए मैं बेसब्री से इन्तजार करने लगा । हिमालय जाने से साक्षात्कार का सपना कम-से-कम वक्त में पूर्ण हो सकेगा एसा मुझे लगता था । मगर हिमालय में कहाँ, कैसे, किस जगह जाना चाहिए, कहाँ रुकना चाहिए, उसकी जानकारी मुझे नहीं थी । इस मुसीबत में कौन मेरा मार्ग प्रशस्त करेगा, मेरे हृदय के भावों को कौन समझ पायेगा, ये मैं नहीं जानता था । आज तक ईश्वर ने मेरे जैसे कई साधकों को रास्ता दिखाया है, कितनों का हाथ थामकर उन्हें मार्गदर्शन दिया है, उनको भवसागर से पार निकाला है । भला वो मुझे रास्ता क्यूँ नहीं दिखायेगा ? मेरा दिल ये कहेता था कि वक्त आने पर वो मेरा हाथ थाम लेगा और विडंबना से पार उतारेगा ।
वैराग्य और त्याग के खयाल मेरे मन में प्रबल होते जा रहे थे । उसकी असर मेरी रोजबरोज की जींदगी पर होने लगी । मैंने दिन में एक दफा भोजन लेना शरू किया । मैंने कोट पहेनना छोड दिया, जूते-चंपल का त्याग किया । यहाँ तक की कॉलेज में खुले पैर जाने की आदत डाली । सादगी और संयम मेरा जीवनमंत्र बन गये । मेरा मन कहीं लगता नहीं था, केवल परमात्मा के साक्षात्कार की धून मेरे दिमाग पर सवार थी ।
एक दिन मैने एक स्वप्न देखा जिसमें मुझे सुनाई पडा, ‘अगर आत्मसाक्षात्कार करना चाहता है तो रमण महर्षि के पास चला जा ।’ मैंने रमण महर्षि का जीवनचरित्र नही पढा था मगर इतना जरूर सुना था कि वे एक आत्मदर्शी और उच्च कोटि के महापुरुष है । उससे महर्षि के प्रति सम्मान की भावना पैदा हुई । अगर उन दिनों उनका जीवनचरित्र मेरे हाथ लग गया होता, या तो किसी परिचित व्यक्ति से उनके बारे में विस्तार से सुना होता तो उनके आश्रम के लिए मैं निकल पडता । मगर ईश्वरेच्छा ऐसी नहीं थी । ईश्वर की ईच्छा थी की मैं दक्षिण भारत में कदम रखने से पहले उत्तर भारत की यात्रा करूँ । हिमालय जाकर साधना करने का खयाल मेरे मन में बस चूका था । रमण महर्षि के दर्शन के लिए मैं नहीं गया क्यूँकि उन्हीं दिनों में मेरे प्रयासो में नया मोड आया ।
मेरे हाथ में स्वामी परमानंद की लिखी हुई किताब आई, जिसमें उन्होंने अपने गुरु स्वामी शिवानंद के बारे में विस्तार से वर्णन किया था । उसमें लिखा था की स्वामी शिवानंद भी स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ की श्रेणी के महापुरुष है ओर अष्ट सिद्धि तथा नव निधि से संपन्न है । यह पढकर मेरे आनन्द का ठिकाना ना रहा । विशेष आनन्द इस बात का था कि स्वामी शिवानंद कोई गई गुजरी हस्ती नहीं थे, मगर जीवित महापुरुष थे, और उनका आश्रम कहीं ओर नहीं बल्कि गंगातट पर ऋषिकेश में था । मुझे लगा कि एसे महान पुरुष की संनिधि पाकर मैं धन्य हो जाउँगा । हिमालय, गंगा और संतपुरुष का संग – तीनों का संयोग कितना विरल होगा ! मेरे मन में लड्डू फुटने लगे । मुझे लगा कि ईश्वर ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली है ।
दो-चार दिन में मैंने स्वामी शिवानंद को खत लिख दिया । खत में मेरे वर्तमान जीवन का चितार दिया और साधना करने के लिए उनके आश्रम में प्रवेश की अनुमति माँगी । मुझे लगा कि श्री अरविंद की तरह मुझे स्वामी शिवानंद के प्रत्युत्तर के लिए प्रतिक्षा करनी होगी मगर एसा नहीं हुआ । मेरे आश्चर्य और आनन्द के बीच सिर्फ एक हप्ते में उनका खत आया । अपने खत में उन्होंने मेरे आध्यात्मिक संस्कारो की सराहना की थी । ये भी लिखा था की इस मार्ग पर चलते रहने से मेरी प्रगति होती रहेगी । साथ में आश्रम में प्रवेश के लिए कुछ देर तक इंतजार करने को कहा था ।
मैंने खत पढा । इंतजार करने की बात मुझे ठीक नहीं लगी । मुझे लगा कि स्वामीजी को मेरी वैराग्यवृति या ईश्वर-प्राप्ति की लगन का सही रूप से अंदाजा नही है । अगर होता तो वे मुझे तुरन्त अपने आश्रम में बुला लेते । मुझे ये भी लगा कि छोटे-से खत में अपने हृदय के भावों को यथार्थ रूप से बयाँ करना नामुमकिन है । इसके लिये मुझे स्वयं जाकर उनसे मिलना होगा । जब मैं स्वामीजी को मिलूँगा तो अपने विचारों को अच्छी तरह प्रदर्शित कर पाउँगा, और वे मुझे आश्रम में रहने की अनुमति दे देंगे ।
उन दिनों मैं मेरे मामा, यानि माताजी के बडे भाई, रमणभाई के यहाँ रहता था । मैंने अपना हिमालय जाने का फेंसला उनको बताया । उनको मेरी आध्यात्मिक भूमिका के बारे में कुछ पता नहीं था । मेरी बात सुनकर उन्हें बडा आश्चर्य और दुःख हुआ ।
वे मुझे समझाने लगे, अगर मैं हिमालय चला गया तो माताजी का खयाल कौन रक्खेगा ?
मैंने कहा, ईश्वर सबको सम्हालता है, वो माताजी को भी सम्हालेगा । माताजी की फिक्र करके मैं यहाँ बैठा नहीं रहूँगा । ईश्वर सब की रक्षा करता है और जो उनकी पनाह लेता है, उसकी सभी जिम्मेदारी वो सम्हालता है । मुझे माताजी की फ्रिक नहीं है । हिमालय जाने का मेरा निर्णय अचल है ।
मेरी दृढता देखकर उन्हें हैरानी हुई । फिर कुछ दफा सोच-समझकर उन्होंने मेरे आगे एक शर्त रखी । वे बोले, ‘तुमको जाना ही है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, मगर तुम्हारे लिए मैंने जो कर्ज लिया था उसके सो रूपये अभी लौटाने बाकी है । उसे चुका दो, फिर खुशी से चले जाना ।’
शर्त कठिन थी । उनके मन में ये खयाल था कि मुझे इतना सारा रूपया कहाँ से मिलेगा ? और अगर मैं रुपिया नहीं जुटा पाया तो हिमालय जानेका खयाल मेरे दिमाग से निकल जायेगा ।
मैंने काफि सोचा मगर कोई रास्ता नजर नहीं आया । मुश्केलीओं से परेशान होकर, निराश और नाहिंमत होकर, सहमे हुए बैठे रहना मेरे स्वभाव में नहीं था । मेरी आदत प्रतिकूलता में मार्ग ढूँढ निकालने की थी । मैं तकलीफों से हारनेवालों मे नहीं था इसलिए शर्त से बिल्कुल नहीं गभराया ।
जिन्हें आगे बढना है, मंझिल को पाना है, उन्हें मार्ग में आनेवाली कठिनाईयों से झुझना होगा, अंधकार और आंसु को पीना होगा, एक योद्धा की तरह निर्भय और नीडर होकर आगे बढना होगा । जीवन के जंग में तभी उसकी जीत होगी ।

