भिक्षु अखंडानंद से भेंट - 1

मामाजी की शर्त को पूरी करना मेरे लिए कठिन था । परीक्षा की कठिन घडीयों में मेरे दिमाग में एक खयाल आया, यूँ कहो कि इश्वर ने ही मुझे सुझाया । मैंने कुछ धार्मिक लेख लिखे थे । मुझे लगा कि अगर मैं उन्हें सस्तु साहित्यवर्धक कार्यालय के संचालक श्री भिक्षु अखंडानंद को प्रकाशनार्थ भेज दूँ और साथ में हिमालय जाकर साधना करने की मेरी ईच्छा प्रकट करुँ तो शायद कुछ हो सकता है । मेरे लेख पढकर शायद वे मुझे पुरस्कार के तौर पर सो रूपिया दे दें । यूँ तो भिक्षु अखंडानंदजी से मेरा कोई पूर्व-परिचय नहीं था फिर भी हिम्मत जुटाकर मैंने उनको एक खत लिखा । खत के साथ मेरे लिखे हुए पंद्रह-बीस लेख जोडे । एसा करने के अलावा मेरे पास ओर कोई चारा नहीं था । खत रवाना करने के बाद मैं उनके प्रत्युत्तर की प्रतिक्षा करने लगा ।

प्रत्युत्तर के लिए मुझे ज्यादा प्रतिक्षा नहीं करनी पडी । सप्ताह के अंदर उनका जवाब मुझे मिल गया । स्वामीजी ने खत में लिखा था कि पत्र मिलते ही फौरन प्रत्यक्ष मुलाकात के लिए नडीयाद चले आओ । मुलाकात नडीयाद स्टेशन के पास संन्यास आश्रम में होगी । वहाँ व्यक्तिगत रूप से सभी प्रश्नो की चर्चा करने में आसानी रहेगी ।

उनके सहानुभूतिपूर्ण प्रत्युत्तर से मुझे खुशी हुई । मुझे लगा कि शायद ईश्वरकृपा से मेरा काम बन जायेगा । सच पूछो तो खत लिखते वक्त मैंने कुछ अलग सोचा था । मैंने सोचा था कि मेरे लेख पढकर स्वामीजी प्रसन्न हो जायेंगे । अगर उन्हें मेरे लेख प्रसिद्धि-योग्य न लगे तो भी मेरी हालात का अंदाजा लगाकर वे मुझे सौ रूपये खत में भेज देंगे । मगर उन्होंने एसा करने के बजाय मुझे प्रत्यक्ष मुलाकात के लिए नडीयाद बुलाया है । शायद इसमें कोई ईश्वरीय संकेत है । मैं स्वामीजी को भले नहीं पहेचानता मगर उनसे मुलाकात करने में हर्ज ही क्या है ? मेरे मिलने पर उन्हें मेरी सोच, मेरे वर्तमान जीवन तथा मेरी आध्यात्मिक भूमिका के बारे में काफि कुछ पता चलेगा । वे मुझे सहाय करने के लिए राजी हो जायेंगे । एसा सोचकर मेरा हौसला बुलंद हुआ । दो घंटे बाद छुटनेवाली ट्रेन में मैं नडीयाद जाने के लिए रवाना हुआ ।

मेरे लिये नडीयाद उतरनेका यह पहेला अवसर था । उसकी भूगोल से मैं अपरिचित था इसलिए संन्यास आश्रम का पता ढूँढनेमें मुझे थोडा वक्त लगा । संन्यास आश्रम पहूँचने पर पता चला कि स्वामीजी उपर के कमरे में ठहरे हुए थे और अपना काम कर रहे थे । मैंने अपने आने की खबर उन तक पहूँचायी । उन्होंने फौरन मुझे पास बुलाया ।

स्वामीजी एक साधारण-सी कुर्सी पर बैठकर भजन की किताब की प्रुफ देख रहे थे । उनके मेज पर कुछ किताबें पडी थी और दोनों ओर दो बडी मूर्तियाँ रखी थी । मैंने स्वामीजी को ध्यान से देखा - उनका चहेरा थोडा मोटा मगर तेजस्वी लगा । उनका बदन तंदुरस्त था । उन्होंने गेरुए रंग का कुर्ता पहेना था । उनकी प्रभावशाली मुखमुद्रा को मैं कुछ देर तक देखता रहा । उनके प्रथम दर्शन से मैं उनके प्रति आकर्षित हुआ ।

मैं स्वामीजी को पहले मिला नहीं था, मगर मैंने उनके प्रकाशित किये हुए कुछ ग्रंथ पढे थे । उनके जीवन की कहानी बडी रोचक थी । वे बोरसद गाँव के लोहाणा सदगृहस्थ थे । जब वे बंबई में थे तो उन्होंने भगवद् गीता पढनी चाहि । किताबघर में दुकानदारने में भगवद् गीता की कीमत बतायी तो उन्हें कुछ ज्यादा लगी । उनको लगा कि गीता जैसे ग्रंथ की उपलब्धि सस्ते दामो में और सभी जगह होनी चाहिए । बस, उन्होंने ठान ली और उस संकल्प ने भीक्षु अखंडानंद को जन्म दिया । अपने संकल्प को मूर्तिमंत करने के लिए उन्होंने अपनी ओर से पूरी कोशिश की । लोगों से पैसा उधार लेकर सस्तु साहित्यवर्धक कार्यालय नामक संस्था की स्थापना की । संस्था ने अपने नाम को चरितार्थ करते हुए सस्ते दामों में धार्मिक और जीवनोपयोगी साहित्य आम जनता के लिए उपलब्ध किया । उनकी यह प्रवृत्ति के पीछे पैसे कमाने या व्यापार करने की नहीं मगर लोगों की सेवा करने की वृति थी । ईसलिए कुछ ही वक्त में उनकी संस्था और उनका नाम लोगों की जबाँ पर आ गया । उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंसदेव, स्वामी विवेकानंद, रामतीर्थ और चैतन्य महाप्रभु के जीवन के अलावा ज्ञानेश्वरी गीता, भागवत, रामायण, योगवाशिष्ठ, तथा दासबोध जैसे उत्तम ग्रंथो का गुजराती जनता को परिचय करवाया, भगीरथ की तरह ज्ञान की गंगा को गुजराती जनता के लिए प्रवाहित किया ।

हालाकि स्वामीजी को इस बात का कोई अभिमान या घमंड नहीं था । उनकी नम्र और सरल आकृति इस बात की द्योतक थी । ईश्वरीय प्रेरणा से, निष्काम और निराभीमानी रहकर, वे अपने कार्य में जुटे हुए थे । वे एक सच्चे कर्मठ और सेवाव्रतधारी पुरुष थे । उनका हृदय भक्तिभाव से भरा था । ईश्वर की उन पर पूर्ण कृपा थी क्यूँकि सफलता, यश तथा किर्ती मिलने पर भी वे अहंकारी नहीं थे । कोई साधारण आदमी अगर उनकी जगह पर होता तो एसा होने पर बहक जाता । स्वामीजी नम्र और विवेकी बने रहे और लोगों की सेवा में दटें रहे । उन्हें अपनी प्रशंसा बिल्कुल पसंद नहीं थी । गुजराती लोगों के लिए इतना कुछ करने के बाद और इतना लोकप्रिय होने के बावजूद वे जिस तरह अपना परिचय देते थे उसे पढकर किसीको भी हैरानी होगी । लोग अपने नाम के आगे खिताबें जोडने के लिए बेताब रहते है, मगर स्वामीजी अपने परिचय में क्या लिखते थे ? - सबकुछ जानते हुए भी अपने जीवन में उसे चरितार्थ न करनेवाला, ओरों को सलाह-मशवरा देने में माहिर (परोपदेशे पांडित्य जतानेवाला), बुराई के लायक व्यक्ति - भिक्षु अखंडानंद । कोई साधारण आदमी अगर एसी हरकत करता तो इसके पीछे भी अपनी नम्रता के लिए सम्मान पाने की बू आती मगर स्वामीजी का दर्शन करनेवाले, उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात करनेवाले लोग ये अवश्य स्वीकार करेंगे की स्वामीजी विनम्रता की मूर्ति थे, जिन्हे अपनी प्रसंशा हरगीज़ पसंद नहीं थी । ईश्वर की कृपा से मैं एसे महापुरुष की प्रत्यक्ष संनिधि में बैठा था । मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था ।

मुझे लगा कि मेरे मिलने पर वे मुझे शाबाशी देगें और तुरन्त सहायता की राशि दे देंगे मगर स्वामीजी तो कुर्सी पर बैठकर शांति से अपना कार्य निपटा रहे थे । मेरे खत के बारे में, मेरे भिजवाये हुए लेखों के बारे में या खत में व्यक्त किये गये मेरे हृदय के भावों के बारे में उन्होंने एक लब्ज़ भी नहीं कहा । वे तो एसे बैठे थे मानो मुझे पहचानते ही नहीं,  मुझसे पूरी तरह से अनभिज्ञ और अपरिचित है । मैं अपने भावों में डूबा हुआ उनकी कार्यपूर्ति की प्रतिक्षा करता रहा ।

काफि देर तक स्वामीजी अपना कार्य करते रहे । फिर उन्होंने किताब को एक ओर हटाकर मेरी ओर देखा ओर वार्तालाप का आरंभ किया । इतनी कम उम्र में मुझे वैराग्य क्यूँ हुआ, हिमालय जाने की इच्छा कैसे पैदा हुई, हिमालय जाकर मैं क्या करनेवाला हूँ वगैरह विषयो पर हमारी चर्चा हुई । मैंने उनके प्रश्नों के उत्तर दिये । मेरे उत्तरों से वे संतुष्ट दिखाई दिये । मेरी आध्यात्मिक भूमिका के बारे में मैने कहा कि मेरा वैराग्य दृढ है और ये कोई एक-दो दिन की बात नहीं है । विकास के स्वाभाविक क्रम से गुजर कर मैं यह स्थिति पर पहूँचा हूँ । मेरी दिमागी हालत बिल्कुल ठीक है, और भावों में बहकर ये सब नहीं कर रहा । मेरा मन संसार के किसी पदार्थ में नहीं लगता । मुझे लगता है कि ईश्वर के साक्षात्कार किये बगैर जीवन व्यर्थ चला जा रहा है । उसका साक्षात्कार करने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ । हर स्त्री में माँ जगदंबा के दर्शन करने की मेरी आदत है । ब्रह्मचर्य का पालन मेरे लिए सहज हो गया है । मुझे कामवासना नहीं सताती । मेरे लिए वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मुझे पूरा यकीन है कि हिमालय के शांत और एकांत माहौल में मैं बहुत जल्द परमात्मा का साक्षात्कार कर पाउँगा । मेरा जीवन परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही है, और जब तक यह ध्येय को मै सिद्ध न कर लूँ, तब तक मूझे चैन नहीं मिलेगा । मैंने इसलिए आपको सहायता करने की बिनती की है ।

कुछ देर तक मैं अपने भावों का वर्णन करता रहा । फिर यकायक मेरी दृष्टि स्वामीजी पर पडी तो मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । उनकी आँखो में से अश्रु की धारा बह रही थी । उनके मुँह पर करुणा भरी थी । मेरे लिए स्वामीजी का ये बिल्कुल भिन्न स्वरूप था ।

मुझे देखकर वे बोले, ‘इतनी कम उम्र में तुम ईश्वर-प्राप्ति के बारे में सोचते हो ये तुम्हारा सदभाग्य है । मेरा जीवन तो यूँ ही चला गया ।’

 उनके शब्दों में उनके भक्तिभावपूर्ण हृदय का मुझे दर्शन हुआ । मेरे लिये स्वामीजी का यह एक ओर स्वरूप था । जिसने गुजरात के लाखों लोगों के लिए उत्तम साहित्य उपलब्ध करवाया, जिसने अपना सारा जीवन निस्वार्थ कर्मयोग में खर्च किया, जो श्री और संपत्ति की मोहिनी से कोसों दूर रहा, जिन्हें प्रसिद्धि की बिल्कुल परवाह नहीं थी, - एसे महापुरुष का जीवन यूँ ही चला गया ? मेरे हिसाब से तो उनका जीवन धन्य और अमर हो गया । फिर भी वे अपने जीवन को व्यर्थ चला गया एसा कहते है, ये उनकी विनम्रता नहीं तो ओर क्या ? कर्मपरायण रहते हुए भी उनका हृदय कितना शुद्ध और अंतरात्मा कितना जाग्रत था ? उनके जैसे विवेकी सज्जन संतपुरुष के मुख से ही एसे लब्ज निकल सकते थे । जो लोग भिक्षु अखंडानंद को केवल शुष्क कर्मयोगी मानते है उन्हें अपनी भूल सुधार लेनी चाहिए । स्वामीजी एक कर्मयोगी होने के अलावा भक्तपुरुष थे, उनका हृदय ईश्वरी अनुराग से छलक रहा था । स्वामीजी की बात से कोई भी व्यक्ति अहोभाव में डूब जाती । मैं भला कैसे अछूत रह सकता था ?

कुछ देर तक बातें होती रही । फिर उनके मेज पर लगी मूर्ति की ओर अंगूलिनिर्देश करते हुए उन्होंने मुझे पूछा,

‘आपको यह मूर्ति कैसी लगी ?’

मूर्ति भगवान श्रीकृष्ण की थी और मनभावन थी ।

‘बहुत सुंदर है ।’ मैंने बेझीझक उत्तर दिया ।

‘क्या आपको ये पसंद है ?’ उन्होंने प्रश्न किया ।

‘हाँ’, मैंने उत्तर दिया ।

‘तो फिर आप यह मूर्ति रख लो ।’ उन्होंने प्रस्ताव रखा । मुझे आश्चर्य हुआ ।

‘मूर्ति सुन्दर है इसका ये मतलब नहीं की मुझे वो चाहिए । इसको पाने के लिए मैंने यह नहीं कहा था ।’ मैंने स्पष्टीकरण किया ।

मगर स्वामीजी कहाँ रुकनेवाले थे ?

‘अगर आपको पसंद है तो आप उसे रख लो । आपको जो चीज पसंद है उसे रखकर मैं क्या करूँगा ?’ उन्होंने अपना आग्रह जारी रखते हुए पुनः कहा ।

उनके दृढ आग्रह के सामने मेरी एक ना चली । मैंने अपनी हार स्वीकार कर ली । उन्होंने मूर्ति मेरे पास रखी । दो-चार पल के बाद उनकी नजर मेज के दूसरे छोर पर लगी मूर्ति की ओर लगी । फिर मेरी ओर देखकर उन्होंने कहा, ‘आपको यह मूर्ति कैसी लगी ?’

मुझे लगा कि मेरे उत्तर का परिणाम शायद मेरे प्रथम उत्तर जैसा आएगा । मुझे मूर्ति पाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी मगर क्या सिर्फ इसलिए मैं उनके प्रश्न का गलत जवाब दूँ ? नहीं, मै एसा नहीं कर सकता ।

‘यह मूर्ति भी अति सुंदर है ।’ मैंने प्रत्युत्तर देते हुए कहा ।

‘आपको पसंद है ?’ उन्होंने फिर पूछा ।

‘हाँ’, मैंने उत्तर दिया ।

‘तो फिर उसे भी रख लो । मुझे ये नहीं चाहिए ।’ और ये कहकर उन्होंने मेरे सामने दूसरी मूर्ति रख दी । कोई दलील की यहाँ गुंजाईश नहीं थी । मुझे वो मूर्ति भी स्वीकार करनी पडी ।

मुझे लगा कि इस महापुरुष का व्यक्तित्व कुछ विचित्र नहीं लगता ?

बातों बातों मे शाम का वक्त हो गया । उन्होंने मुझे अपने साथ घुमने के लिए चलने को कहा । वैसे भी मुझे घुमने का शौक था इसलिए मैं राजी हो गया । घुमते घुमते हम स्टेशन तक पहूँच गये । वहाँ पैड के नीचे लगी एक बैठक पर अपना आसन जमाया । स्वामीजी ने ऋषिकेश की यात्रा की थी । वहाँ के माहौल से वो पूरी तरह परिचित थे । कुछ साधु-संतो से उनका संपर्क हुआ था । अपने ऋषिकेश निवास के अच्छे-बुरे प्रसंग उन्होंने मुझे सुनाये । मैंने अपने जीवन-प्रवाह के बारे में उनको अवगत कराया और हिमालय जाकर साधना करने का मेरा संकल्प दोहराया ।

घुमने के बाद जब हम वापस लौटे तो उन्होंने शाम के भोजन का जीक्र किया । मैंने बडी विनम्रता से कहा की ज्यादातर मैं एक वक्त भोजन करता हूँ । शाम को भोजन न करने से पेट हल्का रहता है ओर इससे साधन-भजन में सहायता मिलती है । सुबह को जल्दी उठने में दिक्कत नहीं होती । इससे ओर भी कई लाभ होते है इसलिए मैं एक वक्त ही रोटी खाता हूँ । मेरे बात सुनकर उन्हें खुशी हुई ।

आश्रम में वापस आकर उन्होंने मुझे पूछा, ‘आप जूते-चंपल का इस्तमाल क्यूँ नहीं करते ?’

मैंने कहा, ‘मैंने एसा कोई नियम नहीं रखा है । जब बंबई था तो जूतों का इस्तमाल करता था  मगर अभी-अभी मैंने उसका उपयोग करना बंद किया । मैं विद्यार्थी हूँ, किसी ओर की कमाई पर मेरा गुजर-बसर होता है । मुझे चाहिए की मैं अपनी जरूरतो को कम रखूँ । वैसे भी मुझे हिमालय जाकर साधना करनी है, त्यागमय जीवन बिताना है । मेरे लिए त्याग और संयम की आदत डालना बहुत जरूरी है, शरीर को मजबूत और सहनशील बनाने की आवश्यकता है । इसी वजह से मैंने कोट और जूतों का त्याग किया है ।’

मेरे उत्तर से वे संतुष्ट हुए मगर मेरा खुले पैर चलना उन्हें ठीक नहीं लगा । वहाँ कमरे की एक ओर जूते-चंपल का ढेर था । उन्होंने मुझे आदेशात्मक स्वर में कहा, इसमें से आपको जो पसंद है, वो पहन लो ।

मैंने अपनी सफाई में कहा, ‘एसा नहीं की मुझे जूते नहीं मिलते । मेरे पास इतने पैसे तो है, मगर मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं, इसलिए मैं उसका उपयोग नहीं करता ।’

‘अगर एसा है फिर भी मेरे आग्रह को मानकर इनमें से किसी एक को पसंद कर लो और पहन लो ।’ उन्होंने अपना आग्रह जारी रखा ।

स्वामीजी जैसे महापुरुष के आगे एक छोटी-सी चिज के लिए बहस करना मुझे अच्छा नहीं लगा । उनका मन रखने के लिए मुझे जूते लेने पडे ।

 

Today's Quote

We turn to God for help when our foundations are shaking, only to learn that it is God who is shaking them.
- Unknown

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