भिक्षु अखंडानंद से भेंट - 2

रात ढल चुकी थी । आश्विन महिने के शुरूआत थी, ठंड भी अच्छी-खासी थी । रात जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठने की मेरी आदत थी । मैं प्रतिक्षा कर रहा था की स्वामीजी किसीको मेरा बिस्तर लगाने को कहे मगर स्वामीजी के मन में कुछ ओर था ।

उन्हों ने कहा, ‘क्या आप भजन गाते है ?’

मैंने प्रत्युत्तर में कहा, ‘हाँ, कभी-कभी । वैसे मुझे भजन और गीत बहुत पसंद है ।’

उन्हें कहाँ किसी गवैये या संगीतविशारद की जरूरत थी ? उन्हें तो भजन सुनने की भुख थी, और भुख मिटाने के लिए रोटी मिले या मिष्टान्न, कोई फर्क नहीं पडता । भजन के बडी किताब को मेरे हाथ में थमाते हुए उन्होंने कहा, ‘इस किताब में से कुछ भजन सुना दो ।’

मैंने भजन गाने शुरू किये । एक खत्म हुआ तो दूसरा शुरू, फिर तीसरा .. क्रम इस तरह जारी रहा । जैसे मैं रुका, वे बोल पडे, ‘रुक क्यूँ गये ? गाते रहो’ और मैंने फिर गाना शुरू किया । भजन सुनते सुनते उनकी आँख लग जाती थी । ये देखकर मैं रुक जाता तो वे तुरन्त जागकर मुझे गाते रहने की आज्ञा करते । भजन गाने में कितना वक्त बीत गया और मैंने कितने सारे भजन गाये इसका मुझे पता नहीं । मुझे सख्त नींद आ रही थी और मैं पूरी तरह से थक चूका था । सोच रहा था कि स्वामीजी अब सोने के लिए आज्ञा करे तो अच्छा होगा ।

इश्वर ने मेरी सुन ली । स्वामीजी ने प्यार से कहा, ‘तुमको मेरे साथ अहमदाबाद चलना होगा । अब रात के दो बज चुके है और चार बजे जो मेल (गाडी) यहाँ से निकलता है उसे पकडना है । इसलिए तुम थोडी देर आराम कर लो ।’

मेरे लिए बिछाने का इन्तजाम करने के लिए उन्होंने सेवक को सूचना दी ।

सोते सोते मैं स्वामीजी के बारे में सोचने लगा । मुझे लगा कि इस संन्यासी महापुरुष का भजनप्रेम कितना भारी है ! मुझे जिस काम के लिए यहाँ बुलाया है, उसका अभी तक उन्होंने जिक्र भी नहीं किया । सुदामा की कहानी सुप्रसिद्ध है । भगवान कृष्ण ने सुदामा का बडा धामधूम से स्वागत किया और कृष्ण-मिलाप से सुदामा को अत्यंत हर्ष हुआ । मगर निर्धनता की चिन्ता सुदामा को खाये जा रही थी इसलिए कृष्ण के राजप्रासाद में उनका मन कैसे लगता ? मेरा कुछ ऐसा ही हाल था । जिस मकसद से मैं भिक्षु अखंडानंदजी को मिलने आया था, वो क्या सफल होगा ? स्वामीजी ने मुझे अपने साथ अहमदाबाद चलने को कहा इसलिए मेरी आशा कि दिपक तेज हुआ । मुझे विश्वास था कि ईश्वर जो करेगा, वो मेरी भलाई के लिए होगा ।

कुछ देर में मुझे नींद आ गई ।

सुबह चार बजे उठकर बंबई से आनेवाली मेल गाडी को पकडने के लिए हम स्टेशन पर आ पहूँचे । गाडी के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पडा । अपने नियमित वक्त पर गाडी आई और हम सेकन्ड क्लास के डिब्बे में स्वार हो गये । पूरे डिब्बे में हमारे दोनों के अलावा ओर कोई नहीं था । बाहर अभी अंधेरा था । रात को देरी से सोने की वजह से मेरी आँख भारी थी । मुझे लगा कि अब मैं थोडी देर आराम कर लूँ मगर स्वामीजी ने गाडी छूटने पर मेरे हाथ में भजन कि वो किताब फिर थमा दी और भजन गाने की आज्ञा कि ।

उनकी आज्ञा मुझे अयोग्य लगी फिर भी विरोध करने की ईच्छा नहीं हुई । आखिर वे एक महापुरुष थे । उनके साथ व्यवहार करने में मर्यादा का पालन करना आवश्यक था । मेरा मन मानता नहीं था मगर फिर भी उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए मैंने भजन गाने का प्रारंभ किया । सुनते सुनते स्वामीजी की आँख लग जाती तो मैं रुक जाता मगर वो तुरन्त जाग पडते और मुझे भजन सुनाने की आज्ञा करते । सफर का ज्यादातर वक्त भजन सुनाने में चला गया ।

मैं मानता हूँ कि ब्राह्ममूहूर्त का वक्त प्रभुस्मरण के लिए बडा लाभदायी है मगर चलती हुई गाडी का डिब्बा इसके लिए सही जगह नहीं थी । तेजी से भागनेवाली गाडी कितना शोर पैदा करती है, और एसे माहौल में भजन गाने के लिए गला फाडना पडता है । एसा कर पाना कोई उस्ताद गवैये या पहाडी आवाजवाले आदमी के लिए मुमकिन है । मेरे जैसे साधारण आवाजवाले आदमी की वहाँ क्या गिनती ? गाडी के चलने का शोर इतना ज्यादा था कि मेरी अपनी आवाज ठीक से सुनाई नहीं पडती थी । ऐसे माहौल में मेरा सूर स्वामीजी को कैसे सुनाई दे ? जबरदस्ती करके, गला फाडकर, सूर निकालने की मुझे बिल्कुल इच्छा नहीं थी फिर भी मैंने कोशिश की, महापुरुष की भावना को पूर्ण करने के लिए मैंने प्रयास किया । अखन्डानंदजी का भजनप्रेम कितना भारी था और प्रवृत्तियों के बीच उनका मन प्रभुभजन में कैसा लगा रहता था उसकी मिसाल देने के लिए यह प्रसंग पर्याप्त है । स्वामीजी का सही परिचय पाने में इससे सहायता मिलेगी ।

लोग सुबह जल्दी उठकर भजन-गान करते है, धून करते है, प्रभातिया गाते है मगर मुझे सुबह जल्दी उठकर मौन रखने की, मन-ही-मन प्रभुस्मरण करने की और ध्यान में बैठने की आदत थी । सुबह का वक्त शांति से परमात्मा के चिंतन-मनन में बीताना मुझे अच्छा लगता था और इसी वजह से सुबह चार-पाँच बजे होनेवाली प्रार्थना या समूह कीर्तन की प्रवृत्ति मुझे आकर्षित नहीं करती । यहाँ तक कि सात-आठ बजे तक लोगों को मिलने की बात भी मुझे नहीं जचती । सुबह के वक्त, एकांत में अपनी दैनिक प्रवृत्तियाँ संपन्न करना मुझे पसंद था ।

मेरे कहने का यह मतलब कतै नहीं कि सुबह में प्रार्थना या समूहकीर्तन करना ठीक नहीं, ये बात बिल्कुल नहीं है । मैं उसका विरोधी नहीं हूँ । मैं मानता हूँ कि सबको अपने ढंग से अपनी पसंदीदा साधना करने की छूट होनी चाहिए । साधक को जो भी पद्धति पसन्द आये, जिस किसी साधन से उसे शांति मिले, उसे खुशी से करना चाहिए । यह प्रश्न व्यक्तिगत रूचि का है और सभी लोगों की रुचि भिन्न-भिन्न होती है । इसलिए साधक किसी भी पद्धति या साधन का प्रयोग करे उसमें किसीको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । साधक को चाहिए की वो कोई भी साधन का आधार लेकर मन को संयमी, शांत और ईश्वरमय करें । सुबह का वक्त इसके लिए बहुत लाभदायी है, उसे व्यर्थ प्रवृत्ति या बातों में बरबाद न करें । स्वामीजी ने मुझे भजन गाने की आज्ञा देकर मानो इस बात की शिक्षा दी ।

 

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God, grant me the serenity to accept the things I cannot change, the courage to change the things I can, and the wisdom to know the difference.
- Dr. Reinhold Niebuhr

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