दक्षिणेश्वर की मुलाकात

कोलकता की यह मेरी पहली यात्रा थी । दोपहर करीब तीन बजे मैं कोलकता स्टेशन पर उतरा । स्टेशन से दक्षिणेश्वर जाने के लिये मैंने आवश्यक पूछताछ की और फिर बस पकड ली । बस चलते ही कंडकटर आया । उसने कहा, आप गलत बस में बैठे हो, ये बस दक्षिणेश्वर नहीं जायेगी । मैं बस से उतरा । फिर दुसरी बस में बैठा । मगर दुसरी बस भी गलत निकली । मुझे फिर बस से उतरना पडा । एक घण्टा एसे ही निकल गया । मैंने सोचा की अब बस की ज्यादा प्रतीक्षा न करते हुए टाँगा कर लूँ ।

टाँगेवाला मुसलमान था, धार्मिक था । उसने मुझे यकिन दिलाया की वो मुझे दक्षिणेश्वर काली माता के मंदिर पर पहूँचा देगा । उसने ये भी कहा की उसने दक्षिणेश्वर देखा हुआ है ।

कलकत्ता के व्यस्त मार्गों पर होते हुए टाँगा आखिरकार मन्दिर के पास आकर रुका । यहाँ आते-आते करीब दो घण्टे लग गये । शाम हो चुकी थी । मुझे लगा की अब मंदिर में जाकर दर्शन करना और कमरे में जाकर मेरी थकान मिटाना शेष होगा । मगर एक नयी मुसिबत मेरा इन्तजार कर रही थी । मंदिर में आने पर पता चला की यह दक्षिणेश्वर का मंदिर नहीं है मगर कलकत्ता का सुप्रसिद्ध काली मंदिर है ! अब क्या करुँ ? मुझे टाँगेवाले की अज्ञानता पर बेहद आश्चर्य हुआ । वक्त और पैसा दोनों बरबाद हुए ।

मैंने टाँगेवाले को कहा, भैया, आप मुझे गलत जगह पर ले आये । अब दक्षिणेश्वर ले चलो ।

अब तक धर्म की बडी-बडी बातें करनेवाला टाँगेवाला अपनी गलती के लिये शरमिंदा होने के बजाय बोला, 'बहुत देर हो गयी है । अब मैं आगे नहीं आ सकता, मुझे जाना होगा । कृपया मेरा किराया दे दो ।'

जक्की आदमी से वार्तालाप करना मूर्खता होगी, एसा सोचकर मैंने टाँगेवाले को किराया दे दिया । ईश्वर से मनोमन प्रार्थना की और मैं पैदल चल पडा । जहाँ रामकृष्णदेव ने अपनी जीवनलीला की थी तथा जिसे देखने के लिये भारत तथा विदेशों से कई लोग आते है, एसे दक्षिणेश्वर के बारे में किसीको कुछ पता नहीं ! कोलकता के लोग इतसे अनजान होंगे, ये बात जल्दी हजम नहीं हुई ।

अब दक्षिणेश्वर जाउँ तो कैसे जाउँ ? शाम ढल चुकी थी । मैं सोचने लगा, अगर रामकृष्णदेव स्वयं मुझे प्रेरणा देकर मुझे हिमालय से यहाँ ले आये हैं, तो फिर ये सब उल्टापुल्टा क्यूँ हो रहा है ?

मगर जो भी हमारे साथ होता है, बिना वजह नहीं होता । उसके पिछे कुछ न कुछ रहस्य अवश्य होता है । हाँ, कई दफा हम उसे ठिक तरह से समझ नहीं पाते । आदमी अगर भरोंसा रखें तो कठिन परिस्थितियों में भी स्वस्थ रह सकता है ।

मैं गहरी सोच में डूबा था तब एक आदमी आया । वो मुझे पूछने लगा की कहाँ जाना है ? मैंने उत्तर दिया, दक्षिणेश्वर, श्री रामकृष्ण परमहंसदेव के स्थान में ।

उसने कहा, मेरे साथ बस में चलो । मैं उसी ओर जा रहा हूँ ।

उस अनजान आदमी के लिये मेरे दिल में अहोभाव होना स्वाभाविक था । उसने एसे वक्त में मेरा हाथ थामा जब मुझे उसकी बेहद जरूरत थी । कुछ ही देर में बस आयी और हम चल पडे । अपना मुकाम आने पर वो बस से उतर गया । मगर उसके पहले उसने मुझे दक्षिणेश्वर के लिये योग्य मार्गदर्शन दिया । मैं कुछ ही देर में दक्षिणेश्वर आ पहूँचा ।

बस-स्टेन्ड से मंदिर थोडी दूरी पर था । वहाँ कुछ लोगों ने मेरी सहायता की । मेरे पहनावे से उन्होंने मुझे महात्मा मान लिया । मेरा सामान देखकर उन्हें लगा की मैं लंबी सफर तय करके आया हूँ । पूछने पर मैंने उनको बताया की मैं हिमालय से आ रहा हूँ ।

हिमालय का नाम सुनकर उन्हें आश्चर्य और आनंद हुआ । वे मुझे दक्षिणेश्वर मंदिर तक ले गये । मंदिर बंध था । चारों ओर नीरव शांति थी । रात का अंधेरा फैल चुका था । गंगाजी अपनी मस्ती में शांतिपूर्वक बह रही थी । रामकृष्णदेव का कमरा खुला था इसलिये मुझे दर्शन का सौभाग्य मिला । मेरे साथ आनेवाले सज्जन ने कहा की वैसे तो यहाँ किसीको ठहरने की इजाजत नहीं है। मगर अंधेरा काफि हो गया है । आप यहाँ रुके जायें तो कोई कुछ नहीं कहेगा ।

गंगाजी के घाट पर जाकर मैंने प्रणाम-आचमन किया । फिर मैं मकान की ओसरी में सो गया । अगर मैं यहाँ जल्दी आ जाता तो निश्चित यहाँ रुक नहीं पाता । अब मुझे लगा की इश्वर ने जो किया, ठीक किया ।

सुबह उठकर मैंने गंगाजी में स्नान किया । ध्यानादि करके मैं मंदिर-परिसर में गया । रात के अंधेरे में मैंने जो देखा था उससे यह स्थान कुछ भिन्न लगा । रात और दिन – दोनों का एक अलग सौन्दर्य है । दक्षिणेश्वर का मंदिर अत्यंत विशाल था । हालाकि, दक्षिण भारत के विख्यात मंदिरो जैसी भव्यता या जैन मंदिरो जैसी शिल्पकला उसमें नहीं थी, मगर आध्यात्मिक परमाणु से मंदिर भरा-भरा लगा । किसी भी मंदिर की महत्ता उसके शिल्प-स्थापत्य या उसकी भव्यता से नहीं मगर उसकी चेतना तथा चिरंतन शांति से होती है । तभी वो भाविक भक्तों के हृदय को छूता है, और अपनी जगह बना लेता है । दक्षिणेश्वर में रहकर रामकृष्णदेव ने न जाने कितने जिज्ञासु पथिकों की पिपासा का शमन किया होगा । उनका प्रभाव यहाँ के वायुमंडल में, उसके अणु-परमाणु में अब भी था । श्रद्धाभक्तिसंपन्न साधक उसे आज भी महसूस कर सकतें है ।

मैंने जब मंदिर में प्रवेश किया तो मेरा हृदय अवनवीन संवेदना से झंकृत हो उठा । मन मानो नाचने लगा । मैंने मन-ही-मन भारत और विश्व के इस महान पुरुष को नमस्कार किया । भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस ! जिसके पट्टशिष्य स्वामी विवेकानंद ने देश-दुनिया में अपने गुरु का नाम रोशन किया था, भारतीय तत्वज्ञान का डंका बजाया था । यह वही महापुरुष थे, जिनका जिवनचरित्र पढकर १४ वर्ष की आयु में मेरा मन आध्यात्मिक भावों से भर गया था, और जिनके नक्शेकदम पर चलकर मैंने इश्वर को माँ के रूप में पाने के लिये प्रयास किया था । एसे महामानव की लीलाभूमि में आना मेरे लिये मुक्ति के मंगलमय द्वार में प्रवेश करने के बराबर था । मेरा रोम-रोम हर्ष से रोमांचित हो उठा । मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा ।

 

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- Mahatma Gandhi

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