तारीख २ जून १९४६ के दिन सोलन में माता आनंदमयी से मेरी भेंट हुई । फिर पूरा जून मास मैं वहाँ रहा । उन दिनों की कुछ बातें यहाँ बताना उचित समजता हूँ ।
धरमपुर लौट आने के तीन दिन बाद मैं फिर सोलन गया और माँ आनन्दमयी को मिला । माताजीने एक बंगाली सदगृहस्थ को मेरी महेमाननवाजी सौंपी, जो खुद माँ आनन्दमयी के दर्शन-सत्संग हेतु बंगाल से आये थे । उन्होंने मेरे रहने का इन्तजाम तो कर दिया मगर उनके साथ रहना मुझे रास नहीं आया । उनका खानापीना और रहनसहन भिन्न होने के कारण मुझे उनसे अलग होना पडा । माता आनन्दमयी से सत्संग करने तकरीबन पचास सत्संगी वहाँ ठहरे थे । उनके लिये स्वतंत्र भोजनगृह था, जिसका खर्च सोलन-नरेश देते थे ।
जैसे की मैने बताया, सोलन के सुप्रसिद्ध जयोतिषी श्री हरदेव शर्मा से मेरा परिचय हुआ था । उनके पास एक छोटा-सा मकान खाली पडा था । उन्होंने मुझे वहाँ रहने की अनुमति दी । इस तरह मेरा रहने का प्रश्न सुलझ गया । मैं माता आनन्दमयी के साथ साधना विषयक वार्तालाप करके उनका मार्गदर्शन पाना चाहता था । मैं सानुकूल समय की तलाश में था क्योंकि पूरे दिन माता आनन्दमयी के कमरे में कुछ-न-कुछ सत्संग का कार्यक्रम चलता रहता था । सुबह में हरिबाबा कीर्तन करने के लिये आते थे । नौ से ग्यारह के बीच माताजी का जीवनचरित्र पढा जाता था । फिर विश्राम रहता था । शाम को छे से साडे सात के बीच सोलन के राजमाता आते थे । उस वक्त किसी भी भाइयों को प्रवेश नहीं मिलता था । रात को आठ से दस के बीच भजन-कीर्तन एव सत्संग होता था । यह समयक्रम के भीतर माताजी से व्यक्तिगत मिलने का वक्त जुटा पाना मुश्किल था मगर मुझे परमात्मा की कृपा पर विश्वास था ।
एक दिन शाम को माँ आनन्दमयी ने भक्तजनों से व्यक्तिगत भेंट करने के लिये वक्त निकाला । जब मेरी बारी आयी तो मैंने अपने दिल की बात बताई । उन दिनों में मेरा अंतर भावप्रधान था । मैंने माता आनन्दमयी को मेरे पूर्वजन्म तथा वर्तमान जीवनप्रवाह से अवगत कराया । मेरे पूर्वजन्म की बात सुनकर शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा । पूर्वजन्म जैसे गंभीर अनुभव को प्रगट करने में मुझसे जल्दबाजी हो गई एसा लगा । मेरा आशय शुभ था मगर वक्त सही न था । जो गल्ती हो चुकी थी उसे तो मैं सुधार नहीं सकता था । मगर मैंने तय किया की आगे जाकर मैं किसीको अपने अंतरंग आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में नहीं बताउँगा । केवल प्रगाढ परिचय या अनिवार्य आवश्यकता होने पर ही किसी के आगे उसका उदघाटन करुँगा ।
माता आनन्दमयी की प्रतिक्रिया से मुझे उनकी शक्ति या सुयोग्यता के बारे शंका नहीं हुई । हाँ, ये जरुर लगा की जो विशेष हेतु से मैं यहाँ आया था वो साध्य नहीं होगा । माँ आनन्दमयी से मेरी भेंट कराने के लिये मैंने माँ जगदम्बा का आभार माना । अगर उनसे यूँ भेंट न होती तो मेरी एक ख्वाहिश अधूरी रह जाती । जो भी ईश्वर का शरण लेता है उसकी सर्व मनोकामना पूर्ण होती है । उसका कभी, किसी भी कारण अमंगल नहीं होता ।
मैंने माता आनन्दमयी से भविष्य में आकर रहने के बारे में पूछा तो उन्हों ने कहा : 'दीदी को खत लिखने से आपको माहिती मिल जायेगी । अगर मैं एकांत में जाउँगी तो आपको बुलाउँगी ।'
उनका उत्तर सुनकर मुझे तसल्ली हुई । मैंने उनको भावपूर्वक प्रणाम किया । मेरे मन में जो जो प्रश्न थे उसका उत्तर मुझे मिल चुका था इसलिये अब रुकने की आवश्यकता नहीं थी ।
रात को कुछ वक्त मैं सुप्रसिद्ध पंडित श्री हरदेव शर्मा पास बैठा । वे अति नम्र, प्रामाणिक, बुद्धिशाली एवं प्रेमी व्यक्ति थे । मेरी जन्मकुंडली का निरीक्षण करके उन्होंने बताया की 'लाखो में किसी एक की कुंडली एसी होती है । एसी कुंडली भगवान कृष्ण एवं राम की थी । आपकी कुंडली तो कोई अवतारी महापुरुष की है ।' उनकी बातें आश्चर्यकारक एवं रोचक थी । कोई ज्योतिषी ही उनके कथन की सत्यासत्यता के बारे में बता सकता था । मैं तो साधनापथ का एक साधारण यात्री था । मुझमें कई त्रुटियाँ थी, जिसे दूर करके मुझे पूर्णता में प्रतिष्ठित होना था । किसी के कहने पर मैं अपने आपको पूर्ण और मुक्त कैसे मान लूँ ? अवतारी महापुरुष सुनने में भले अच्छा लगे, उसकी जिम्मेवारी का मुझे अहेसास था । मगर पंडितजी मेरी बात कहाँ सुनने वाले थे । उन्होंने अपनी बात दोहराई 'आपका जीवन उज्जवल है तथा आगे जाकर अधिक उज्जवल होगा ।'
मैंने उन्हें धरमपुर जानेका मेरा निर्णय बताया । उनकी ख्वाहिश थी की मैं कुछ दिन सोलन में रहूँ । मगर मैं अपने निर्णय में दटा रहा । दुसरे दिन सुबह एक हाथ में पितल का डिब्बा और दूसरे में खादी का थैला लेकर मैं धरमपुर के लिये चल पडा । तकरीबन दस मिल की दूर पैदल तय करके ग्यारह बजे मैं धरमपुर पहूँचा । मुझे देखकर सिन्धी शेठ बहुत प्रसन्न हुए । कहने लगे : 'मैंने आपको नहीं कहा था की आपको वहाँ पसंद नहीं आयेगा ? ये जगह कितनी बढ़िया है । अब कहीं मत जाना, यहीं रहना ।'
उनसे विशेष चर्चा करना बेमतलब था । भोजन के पश्चात मैं चंपकभाई को मिलने गया और उन्हें अपने अनुभवों के बारे में बताया ।

