धरमपुर लौट आने के बाद सिन्धी शेठ के आग्रहवश होकर मुझे पुनः सोलन जाना पडा । सोलन में माँ आनंदमयी से मिलने का संयोग उपस्थित हुआ ।
जब मैं माताजी के निवासस्थान पर गया तो माताजी अपने के कमरे के बाहर कुछ दर्शनार्थी बहनों से बातचीत कर रहे थे । मुझे देखकर वे अत्यंत भावपूर्ण स्वर में बोलें: 'अरे, आप बिना बतायें किधर चले गये थे ? हमें खबर तक नहीं की ! ?'
मैंने कहा : 'यहाँ ज्यादा रहने की मेरी ईच्छा नहीं थी इसलिये मैं चुपचाप निकल गया ।'
उनकी आँखों से प्रेमाश्रु छलक पडे । वे कुछ भावुक होकर बोले: 'हाँ, आप यहाँ क्यूँ रहोगे ? आपकी सेवा करनेवाले तो बहुत होंगे ।'
मेरे लिये उनका यह अलग स्वरूप था, उनके विराट व्यक्तित्व के विभिन्न पहलूओं में से एक । उनकी बहुमुखी प्रतिभा में ओर क्या-क्या छीपा था वो कौन जान सकता है ? हम तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ।
फिर सब लोग अंदर होल में गये । मैं माताजी का मुखमंडल निहारता रहा ।
कुछ देर बाद उन्होंने कहा : 'गुजराती भजनों का लय-ताल कैसा होता है ? अगर आप हमें सुना दे तो शुक्रिया ।'
'गुजराती भजन का लय-ताल और भाव भी सुंदर होता है । अगर आपकी मरजी है तो मैं जरूर सुनाउँगा ।'
उनकी संमति मिलने पर एक बहन ने मुझे मंजीरा लाकर दिया ।
तब माताजी ने बडे सहजभाव से कहा : 'भोजन के लिये सब मेरी प्रतिक्षा कर रहें है । अभी बुलावा आयेगा ।'
मैंने उन्हें भोजन को प्रथम न्याय देने का मशवरा दिया । भोजन करके कुछ ही देर में वे होल में आये और बोले : 'हाँ, अब सुनाओ ।'
मैंने भजन शुरु किया :
सकळ सृष्टिनुं मधु लइने बन्युं म्हारी 'मा'नुं मुख.
प्रेम लइने सकळ सृष्टिनो प्रकट थयुं ए पुष्प प्रफुल्ल,
उषाकमळनी रक्तिमाभर्युं, अमृतनुं जाणे ए मूळ ... सकळ सृष्टिनुं
अशांति एने स्पर्श करे ना, परम शांत मंगल मधुरूप,
अशुद्धिनी छाया ना एमां, शांतिस्थान सौनुं ज्यम द्रुम ... सकळ सृष्टिनुं
ए नयनो गंगाजमना ने सूर्यचंद्रतारकनां मूळ,
सुंदर सत्य सनातन सर्वनुं ए मुख पूर्ण पुरातन मूळ ... सकळ सृष्टिनुं
स्वर्ग मुक्तिनी करी कल्पना कविए जोइने ए मुख,
'पागल' मुखने जोइ जोइ हुं तो वही जउं रसने पूर ... सकळ सृष्टिनुं
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फिर मैंने भजन का भावार्थ समजाया । उनको भजन का भाव बहुत पसंद आया इसलिये उसे लिपिबद्ध करने की कुछ बहनों को आज्ञा की । उसका अनुसरण करते हुए कुछ बहनों ने उसे लिपिबद्ध भी किया । फिर मैंने एक ओर भजन सुनाया और बाद में सत्संग खत्म हुआ ।
वहाँ एक अंग्रेज सन्नारी भी थी, जो की आध्यात्मिक प्रेरणा, पथप्रदर्शन तथा शांति की कामना से भारत आयी थी । वो महर्षि अरविन्द तथा रमण महर्षि से दर्शन-सत्संग कर चुकी थी । अब वो माँ आनन्दमयी की संनिधि में आकर शांति का अनुभव कर रही थी । इस संसार में किसको किससे प्रेरणा एवं पथप्रदर्शन मिलेगा यह बताना मुश्किल है । यह पूर्वजन्म के संस्कारों के अधीन होता है और केवल स्वानुभव से समज में आता है । शायद पूर्व के किसी प्रबल संस्कारों के कारण वह भारत आयी थी और यहाँ के प्रातःस्मरणीय संतपुरुषों की संनिधि में जीवन की धन्यता का अनुभव कर रही थी । माता आनन्दमयी के पास आकर उसे शांति मिली थी । उसको मेरे भजन का भावानुवाद पसंद आया । उसने कहा: 'आपका भजन मेरे मन को छू गया ।'
शाम होते हम धरमपुर लौटे । पंडित श्री हरदेव शर्मा के प्रेमाग्रह से मैं कुछ दिन सोलन रहा । तब फिर माताजी से मिलने का सुअवसर उपस्थित हुआ । हालांकि उनको व्यक्तिगत मिलने की मेरी ईच्छा अब शांत हो चुकी थी ।
माता आनंदमयी का व्यक्तित्व विराट और विलक्षण था । उनका पवित्र पारदर्शक प्रेम, अलौकिक आनंद, भाव और उनकी निखालसता, निराभिमानता और गहरी शांति, सब प्रशस्य था । पहली नजर में देखकर ही लगता की वह एक असाधारण उच्च योगिनी है । मौजूदा भारत की आध्यात्मिक विभूतिओं में उनका स्थान प्रथम पंक्ति में है और रहेगा इनमें कोई दोराय नहीं ।
सोलन के सुंदर शांत पर्वतीय प्रदेश में माता आनंदमयी की सुखद संनिधि में बीते हुए दिन सचमुच अविस्मरणीय थे । आज भी उसे याद करके मेरा हृदय भावपूर्ण हो जाता है ।

