भगतजी देखने में आकर्षक थे मगर पहली नजर में उतने सात्विक नहीं लगे । लम्बे बाल, गौर और सुन्दर मुखाकृति, रेशमी वस्त्र और शांत आँखे उनकी विशेषताएँ थी । उनके सर पे मोरपीच्छ था । अपने निवास के बाहर बैठकर वे आनेवाले भक्तजनों को आशीर्वाद देते थे । पहाडी इलाके के एक छोटे-से गाँव में इतने सारे लोगों का जमा होना अपने आपमें आश्चर्य था । लोगों की भीड होने पर कुछ भक्तजन व्यवस्था में जुटे थे । ज्यादातर दर्शनार्थी पंजाबी थे ।
भगतजी के पास एक-एक करके लोग जाते थे । भगतजी किसीको कहते थे की 'महात्मा का भजन करो, भगवान का भजन करो, इच्छा पूरी होगी ।' तो किसीको कहते थे की 'महात्मा का सुमिरन करो, भगवान का भजन करो, रोग दूर होगा ।' लोग यही दो कामना लेकर उनके पास आते थे – संतानप्राप्ति या रोगनिवारण । और भगतजी उन्हें यही आशीर्वाद देते थे । अगर किसीके भाग्य में संतानप्राप्ति या व्याधिमुक्त होना नहीं लिखा तो भगतजी साफ ना बोल देते थे । जिनकी मनोकामना पूर्ण नहीं हुई एसे लोग फिर-से आशीर्वाद लेने के लिये आये थे । भगतजी किसीसे ज्यादा बात नहीं करते थे, दो-तीन पंक्ति में अपनी बात बता देते थे । वे किसी भेंट का स्वीकार नहीं करते थे । शायद इसलिये लोग उन्हें ज्यादा मानते थे । हाँ, उनके साथ रहनेवाली स्त्री भक्तजनों की भेंट का स्वीकार करती थी । लेकिन कीसी-भी प्रकार की जबरदस्ती या प्रलोभन का यहाँ सर्वथा अभाव था ।
कहा जाता है की एक दफा गाँव में कोई सिद्धपुरुष आये थे । तब भगतजी ने दिल लगाकर उनकी सेवा की थी । बीदा होने के वक्त उन्होंने भगतजी को आशीर्वाद दिया था । तब-से भगतजी दूसरों के मन की बात जान लेते थे । उन्हें वचनसिद्धि भी मिली थी, जिसका उपयोग वे लोगों की भलाई के लिये कर रहे थे ।
मेरे मन में भगतजी को लेकर कुछ धारणाएँ थी । मैंने सोचा था की वे कोई महात्मा पुरुष होंगे, किसी विषय पर वार्तालाप देनेवाले योगीपुरुष होंगे । मगर यहाँ आकर देखा तो बात कुछ ओर थी । पहले के वक्त में लोग महात्मा पुरुषों के पास मंत्रदीक्षा के लिये, या अपनी जिज्ञासा को शान्त करने के लिये जाते थे । महात्माओं के पास लौकिक हेतु से शायद ही कोई जाता था । मगर भगतजी के पास लोग केवल संतानप्राप्ति और रोगमुक्ति के लिये आते थे । भगतजी किसीसे आध्यात्मिक वार्तालाप करना चाहें भी तो किससे करें ? उनके पास कोई जिज्ञासु नहीं आता था । शायद भगतजीने लोगों को बिगाडा था । वो शुरु-से मना करतें तो लोग एसी लौकिक कामना लेकर उनके पास थोडे आते ? मगर इसके बारे में टिप्पणी करनेवाले हम कौन होते हैं ?
एक साधुपुरुष से हमें यह ज्ञात हुआ की भगतजी इस झमेले से छुटना चाहते थे । उन्होंने अपना आदमी भेजकर साधुपुरुष से छुटने का मार्ग पूछा था । मगर उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा, 'जो आपने शुरु किया है, उसे आप ही मिटा सकते हैं ।'
अगर साधुपुरुष की बात सच मान ले तो भगतजी ने ये लोगों की भलाई के लिये शुरु नहीं किया होगा, उसके पीछे कोई और मकसद होगा । सेवाभाव से शुरु किये गये काम से कोई आदमी छुटना क्यूँ चाहेगा ? जो भी हो, भगतजी लोगों का दुःखदर्द दूर कर रहे थे । अगर वे इसी प्रवृति को कोई आध्यात्मिक चिज से जोड लेते तो ज्यादा लाभ हो सकता था । जैसे की आशीर्वाद पानेवाले हरेक व्यक्ति को किसी निश्चित नियम का पालन करने के लिये कहना । एसा करने से व्यक्ति की लौकिक और आत्मिक उन्नति होगी । ये तो सिर्फ मेरा सुझाव है । जो भी हो, मगतजी मुझे निस्पृही लगे ।
लोग एक-एक करके बीदा हुए । अन्त में शेठ के रसोईये की बारी आयी ।
भगतजीने पूछा, क्यूँ आये हो ?
उसने कहा, 'आप तो अंतर्यामी हो, सब जानते हो ।' और फिर हाथ जोडकर बैठा रहा ।
भगतजी बोलें : 'आपका शेठ बिमार है न ? उसे कहो भगवान का भजन करें, महात्मा का भजन करें । थोडा वक्त जरुर लगेगा मगर एसा करने पर उसकी बिमारी चली जायेगी ।'
शेठ की बिमारी की बात भगतजी अपने आप जान गये । भगतजी का सामर्थ्य बताने के लिये इतना काफि है ।
मैं भगतजी के पास बैठा था । उन्होंने मुझे पूछा, 'आपको क्या चाहिये ?'
मैंने कहा : 'मुझे दीक्षा मिली है मगर उसका निर्धारित परिणाम नहीं दिखाई पडता ।'
'वक्त आने पर सबकुछ होगा और अवश्य होगा । आपकी सारी चिंताएँ मिट जायेगी । आनंद आनंद हो जायेगा ।'
भगतजी ने रुकने के लिये कहा मगर आधा घण्टा रुकने के बाद हम निकल पडे । पैदल चलकर कंडाघाट आये और रात की ट्रेन से धरमपुर पहूँचे । दूसरे दिन शाम को चार बजे जब मैं चंपकभाई के पास बैठा था, तब मेरे दाहिने कान में जोर-से घण्टनाद शुरु हुआ । इसे मेरी अब तक की साधना का परिणाम कहूँ या भगतजी के वचनों का प्रभाव ? जो भी हो, मैं इससे अति प्रसन्न हुआ । दाहिने कान में शुरु हुआ नाद बाद में बायें कान में शुरु हुआ और फिर चौबीसों घण्टे चलता रहा । चेल के महात्मा यानि भगतजी से भेंट करने के पश्चात मुझे यह अनमोल तोहफा मिला था । मैंने ग्रंथो में पढा था की दीक्षा के फलस्वरूप एसा नाद सुनाई पडता है, और नादश्रवण से समाधिप्रवेश आसान होता है ।
*
चेल से जब हम धरमपुर लौटे तो जाते वक्त स्टेशन पर साधुपुरुष मिले थे उसकी याद आयी । रसोईये ने उनके बारे में छानबीन की मगर उनका कोई अतापता नहीं मिला । आज भी वह अनजान साधुपुरुष की स्मृति मानसपट पर बनी हुई है । और भगतजी को मैं कैसे भूल सकता हूँ ? मुझे मिले अनेकविध महापुरुषों में उनका नाम भी शामिल है । उनका व्यक्तित्व असाधारण, विशद और वंदनीय था, इसमें कोई दोराय नहीं है ।

