साधु रामदास का परिचय

आलंदी में ज्ञानेश्वर महाराज की अनुभूति मिलने के पश्चात मैं हिमालय लौट आया । देवप्रयाग के शांताश्रम में आकर मुझे असाधारण आनंद की अनुभूति हुई । ऋषिमुनिसेवित हिमालय की उत्तुंग पर्वतमालाएँ, पतितपावनी गंगा, स्वच्छ और निरभ्र आकाश और पावन धरती के दर्शन से मैंने धन्यता का अनुभव किया ।

भारी उत्साह और उमंग के साथ मैं फिर साधना में जुट गया । एक दिन चक्रधरजी किसी साधुपुरुष को लेकर कुटिया पर आये । उनका नाम रामदास था । रामदास ने देवप्रयाग में समाधि लेनेवाले बंगालीबाबा की मन लगाकर सेवा की थी । पिछले कुछ सालों से रामदास का मन चंचल हो गया था । मुझे एक बार मिलने पर उनको शांति मिली इसलिये उन्होंने मेरे पास रहने की अनुमति माँगी । चक्रधरजी ने उनकी बात में अपना सूर मिलाया । मैं एकांतिक साधना के लिये हिमालय आया था इसलिये कोई मेरे साथ रहें ये मुझे पसंद नहीं था । फिर भी चक्रधरजी और रामदासजी के अत्याग्रह से मैंने रामदासजी को दो-चार दिन के लिये नीचे के कमरे में रहने की अनुमति दी ।
उन दिनों में, रात को करीब एक बजे, कुटिया के बन्द द्वार पर किसी के डण्डा ठोकने की आवाज आती थी । आधे धण्टे के बाद कुटिया के पीछले द्वार पर एसी आवाज आती थी । शुरुशुरु में इससे मैं चौंक जाता था मगर फिर आदत-सी हो गयी थी । एसा कौन और क्यूँ करता था ये मेरे लिये रहस्य था । मगर जब भी आवाज आती तो मैं मन-ही-मन कहेता की मैं सोया नहीं हूँ, जाग्रत हूँ, साधनभजन कर रहा हूँ, वक्त का सही उपयोग कर रहा हूँ ।

एसी आवाज नियमित अंतराल के बाद होती रही । तकरीबन एक साल एसा चला । जब रामदास मेरे साथ रहने आये, उसी रात को एसी आवाज आयी । सुबह जब मैं नीचे आया तो वो कहने लगे: 'अब मैं यहाँ एक दिन भी नहीं रहूँगा ।'
मैंने पूछा, 'क्यूँ ?'
वो बोले, 'कल रात किसीने दरवाजे पर जोर से डण्डा मारा, एक नहीं, दो-तीन दफा । अब मुझे यहाँ भय लगता है ।'

मैंने उन्हें होंसला दिया, तो वो एक रात ओर रहने को राजी हो गये । मगर दुसरे दिन जब मैं नीचे आया तो वो अपना सामान बाँधकर जाने के लिये तैयार थे ।
'महात्माजी, अब आप कुछ भी कहें, मैं यहाँ एक दिन ओर नहीं रहूँगा ।'
'क्यूँ ? क्या हुआ ?'
'डण्डे की आवाज के अलावा और एक अनुभव हुआ ।'
फिर उन्होंने मुझे कमरे के बाहर ले जाकर जमीन पर पंजे का निशान दिखाया । मैंने देखा तो पथरीली जमीन का एक हिस्सा साफ करके किसीने वर्तुल बनाया था । बीच में बडा-सा, पंजे का निशान था । पंजे को देखकर नहीं लगता था की वह किसी मानव का है ।

धबराये हुए रामदासजी अब रुकने के मूड में नहीं थे । कुटिया से जाते हुए उन्होंने कहा: 'यहाँ किसी भूत-प्रेत या सिद्धपुरुष का निवास है । आप यहाँ रह सकते है, मैं नहीं । अगर मैं रहूँगा तो मेरी जान निकल जायेगी या मैं बिमार हो जाउँगा ।'
मैंने कहा: 'आपको मेरी सेवा नहीं करनी ?'
'करनी है, मगर यहाँ रहकर कतई नहीं । नीचे गाँव में रहकर करूँगा ।'
फिर वो शांताश्रम कभी नहीं लौटे ।

रामदासजी का स्वभाव विचित्र था । वे सेवाभावी और श्रद्धाभक्तिसंपन्न जरुर थे मगर उनका दिमागी संतुलन कब चला जाय ये कहना मुश्किल था । खास करके, जब उन्हें किसी कठिनाई का सामना करना पडता, तो वो मुँह लटकाकर कुटिया में खंभे के पीछे जाकर बैठ जाते और कोई बातचीत नहीं करते थे ।

एक दफा यूँ हुआ की रघुनाथ मंदिर के उनके निवासस्थान में एक बिच्छु ने उनको काट लिया । तो आगबबुला होते हुए शांताश्रम आकर मुझे कहने लगे: 'आप बिच्छु बनकर मुझे काटते हो । जब मैं चलता हूँ तो आप मेरे मार्ग में पथ्थर बनकर ठोकर लगाते हो । जब मैं भीक्षा लेने जाता हूँ तो किसीके दिल में मुझे भीक्षा नहीं देने की प्रेरणा करते हो । आप यह सब जानबुझ कर करते हो ।'

उनकी बातों से मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने कहा: 'मैं भला आपको तकलीफ क्यूँ पहूँचाउँगा ? आप एसा क्यूँ सोचते हो ?'
मगर वो अपनी बात पर अडे रहते ।
*
कुछ अरसे के बाद हम साथ दशरथाचल गये मगर उनकी चंचलता के कारण मुझे जल्दी लौटना पडा । जब दशरथाचल पर्वत पर गये तो उन्होंने सामान का थैला अपने कंधो पर लिया था । कुछ देर के बाद न जाने क्या हुआ, उन्होंने सामान का थैला नीचे फेंक दिया । जब मैंने उनको पूछा की आपने एसा क्यूँ किया तो मुझे कहने लगे: 'आपने ही उसे फेंकने की प्रेरणा दी थी ।'
'मैंने आपको कब प्रेरणा दी ? मैंने तो सामान का थैला देवप्रयाग ले जाने को कहा था ।'
'हाँ, आपने एसा अवश्य कहा था मगर फिर आपने उसे फेंकने की अंतःप्रेरणा की तो मेरा फर्ज बनता है की मैं आपके आदेश का पालन करुँ ।'
मैं सोच में पड गया । यह किस प्रकार की अंतःप्रेरणा है !

मैंने कहा: 'अब सामान बहार निकालना पडेगा । थेले में से कुछ बरतन नीचे गिर गये हैं । अच्छा है की थेला पेड और बडे पत्थर की बीच अटक गया है ।'
'सामान तो आप जिसे प्रेरणा करोगे वो निकालेगा ।'
कुछ देर के बाद वहाँ पहाड के दो लोग आये । उन्होंने बडी तकलिफ से गिरे हुए बरतन एवं थेले को बाहर निकाला । जब रामदासजी ने थेला फिर-से उठाया तो मैंने कहा: 'देखो, मैं आपको आदेश देता हूँ की आप इसे देवप्रयाग ले जाय । मेरी बात ध्यान-से सुनो, ये मत कहेना की मैंने उसे फेंकने का आदेश दिया है ।'
रामदासजी हँस पडे और बोले: 'प्रेरणा देनेवाले भी आप है और उसे पलटने वाले भी आप है ।'
मैंने कहा, 'अब इसे पलटने का सवाल ही नहीं है ।'

शाम को हम देवप्रयाग आये । मेरी खुशकिस्मती से रामदासजी ने थेला ठीक तरह संभाला, कहीं गिराया नहीं । उनके बारे में कुछ भी अनुमान करना मुश्किल था । फिर भी वे नम्र और सरल स्वभाव के थे । देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर की पीछेवाली गुफा में वे रहते थे और अक्सर मुझे मिलने आते थे ।

Today's Quote

We turn to God for help when our foundations are shaking, only to learn that it is God who is shaking them.
- Unknown

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