ज्ञानेश्वर महाराज की कृपा

प्रार्थना करते-करते मेरे मन में विचार आया: चलो, ज्ञानेश्वर महाराज के नाम का संकीर्तन करें । समाधि मंदिर के होल में आकर हमने खडे-खडे संकीर्तन का प्रारंभ किया :
निवृति ज्ञानदेव सोपान मुक्ताबाई
एकनाथ नामदेव तुकाराम !
तुकाराम तुकाराम !!

अंत में केवल ज्ञानदेव ज्ञानदेव... की आवाज लगाते हुए धून में तल्लीन हो गये । मेरे हाथ में करताल थी, मेरी आँखे बन्द थी । पैर अपने आप थीरक रहे थे । हृदय ज्ञानेश्वरजी के दर्शन के लिये उछल रहा था । मन में प्रार्थना चल रही थी । रोमरोम में यही पूकार थी की ज्ञानेश्वर महाराज दर्शन दे ।

पूरजोश में कीर्तन चल रहा था तब न जाने कहीं से, एक वृद्ध पुरुष आये और कीर्तन में जुड गये । मेरे साथ मेरे माताजी भी थे । उनका कहेना था की वह वृद्धपुरुष बाहर से मंदिर में आये थे । उन्होंने रेशमी वस्त्र धारण किया था । उनके बाल सफेद थे, और उम्र काफि थी । उनके हाथ में पूजा की थाली और लोटा था । मंदिर में आकर उन्होंने थाली और लोटा नीचे रख दिया और हमारे साथ कीर्तन में जुड गये । ताल में ताल मिलाकर वो मेरे साथ कीर्तन करने लगे । वृद्ध होने के बावजूद उनकी चुस्ती-फूर्ति आश्चर्यजनक थी ।

कुछ देर कीर्तन चला फिर भावावस्था में आकर मैं गिर गया । कोई मेरे लिये पानी लेने गया, कोई पंखा डालने लगा । लोगों की भीड जमा हो गई । दो-तीन भाईयों ने वृद्धपुरुष को ढूँढने की कोशिश की । वे उनको दक्षिणा देना चाहते थे । मंदिर और मंदिर के बाहर - सभी जगह ढूँढा मगर उनका अतापता नहीं मिला । उनके हाथ में जो थाली और लोटा था, वो भी नहीं मिला । मंदिर के परिसर में दुकानें लगी थी, वहाँ जाकर पूछा मगर किसीने एसे वृद्धपुरुष को मंदिर में आते या बाहर जाते नहीं देखा था । मेरे साथ आये लोगों को लगा की शायद ज्ञानेश्वर महाराज स्वयं वहाँ वृद्धपुरुष के स्वरूप में आये थे ।

जब मैंने यह सुना, तो मेरे दिल में भावनाओं का तूफान उठा । ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन करने की मेरी बडी चाह थी । कीर्तन करते वक्त मेरी आँखे बन्द थी, इसलिये मैं ही उनके दर्शन नहीं कर पाया । मैं रो पडा, ओर कर भी क्या सकता था ?

शाम को हम पूना वापिस लौटे । रात होने पर मेरा हृदय आर्द्र हो गया । मन में आलंदी की घटना गूँजती रही । देर रात को ज्ञानेश्वर महाराज ने स्वप्न-दर्शन दिया और कहा: 'इस बार आपको दर्शन नहीं मिला मगर दूसरी बार आओगे तब अवश्य दूँगा ।'

स्वप्न के इस अनुभव से मुझे यकीन हो गया की वह वृद्ध पुरुष कोई ओर नहीं मगर स्वयं ज्ञानेश्वर महाराज थे । एक तसल्ली भी मिली की दूसरी बार आलंदी जाने पर खाली हाथ लौटना नहीं पडेगा ।

वक्त को चलते हुए कहाँ देर लगती है । वक्त पानी के प्रवाह की तरह तेजी-से निकल जाता है । आलंदी गये तकरीबन दो साल हो गये । उसके दौरान मुझे कई आध्यात्मिक अनुभव मिले, जिसके बारे में वक्त आने पर मैं बताउँगा । यहाँ आलंदी की बात चल रही है, तो इसके अनुसंधान में यह कहेना चाहूँगा की दूसरी दफा जब मैं वहाँ गया तो मेरे साथ बंबई से पंद्रह लोग आये थे । उनके मन में था की पिछली बार की तरह इस बार भी वह वृद्ध पुरुष आयेंगे और हम उनके दर्शन करके धन्य हो जायेंगे । इस बार उनको कहीं जाने नहीं देंगे, उनका पूरा लाभ लेंगे । मगर इश्वर की लीला अपार है । आदमी चाहता कुछ है और वो करता कुछ है ।

मुझे मिली प्रेरणा के मुताबिक हमे कोई धर्मशाला में नहीं मगर मंदिर में रहना था । रात को जब चांदनी फैल गई तो मैंने मंदिर में बैठकर ज्ञानेश्वर महाराज को पुकार लगाई । हे प्रभु ! इस बार तो मुझे दर्शन देना ही पडेगा । मैं आपके द्वार पर आया हूँ । अतिथि का सत्कार करना आपका फर्ज है ।

हे ज्ञानेश्वर महाराज !
तमारुं होय खरेखर साच (२)
सजीने बधो साज,
मने तो दर्शन आपो आज,
हे ज्ञानेश्वर महाराज !

जैसे जैसे रात ढलती गई, मेरी आतुरता बढती गई । एक-के-बाद-एक करके साथ आये सब भक्तजन सो गये । मैं मंदिर में इकतारा लेकर ज्ञानेश्वर, तुकाराम और एकनाथ के पद गाता रहा । वातावरण दिव्य और अलौकिक हो चुका था । रात के दो बजे के बाद मेरा देहभान चला गया । लय की वह दशा में मेरे सामने ज्ञानेश्वर महाराज और निवृत्तिनाथ प्रकट हुए । दोनों के स्वरूप अत्यंत तेजस्वी थे । उन्होंने स्मित करके मेरे हाथ में फूल दिया और आशीर्वाद प्रदान किया । कुछ देर बात करके दोनों अदृश्य हो गये ।

दूसरे दिन मैंने साथ में आये भाईयों को इसके बारे में बताया । हालांकि मैं चाहता था की जैसे एकनाथजी को ज्ञानेश्वर महाराज दिव्य रूप धारण करके मिले थे, मुझे भी मिलें और अपने प्रेम से मुझे परिप्लावित करें । उनके लिये एसा करना असंभव नहीं क्योंकि वे ईश्वरतुल्य है । समर्थ संत ज्ञानेश्वर महाराज का जयजयकार हो !

Today's Quote

Clouds come floating into my life, no longer to carry rain or usher storm, but to add color to my sunset sky.
- Rabindranath Tagore

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