Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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शांताश्रम - शांता नदी के तट पर स्थित पवित्र और शांत आश्रम ! शास्त्रों में हिमालय का वर्णन किया गया है की यहाँ ऋषिमुनि रहते है, जगह-जगह पर उनके आश्रम है जिसमें यज्ञयागादि होता है, गौसेवा होती है । ऋषिमुनिओं को हुए हजारों साल हो गये । अब हिमालय की भूमि पहले जैसी नहीं रही । यहाँ ना तो हिरन है, ना झरने है, ना कोई फलफूल बचा है । उत्तराखंड के ज्यादातर गाँवो में पानी की समस्या है । साधुसंतो के लिये हिमालय में कोई प्रबंध नहीं है । ऋषिकेश को छोडकर शायद ही कोई एसी जगह है जहाँ साधुओं को भोजन मिलता है । शायद इसी कारण ज्यादातर साधुसंत यहाँ पाये जाते है । हाँ, ये अलग बात है की इनमें से कुछ गिनेचुने साधु साधना का मर्म समजते है । ज्यादातर साधु भिक्षा माँगते है और वेदांत का अध्ययन करते है । जनसमाज इसी कारण से साधुओं तथा धर्म के प्रति उदासीन है ।

थोडी देर के लिये इस बात को भूल जाते है और हिमालय के नैसर्गिक सौन्दर्य का लुत्फ उठाते है । पतितपावनी गंगा के पुनित प्रवाह से पावन हुई यह भूमि पहेली नजर में आकर्षक और मनभावन लगती है । पिछले कुछ सालों से, इश्वरेच्छा से मैं यहाँ निवास कर रहा हूँ और ये मुझे राजप्रासाद से अधिक सुखद और आनंददायी लगती है । हालाकि मेरा आनंद चिरस्थायी नहीं है क्योंकि मुझे साधना की फिक्र है, मेरे लक्ष्य की चिंता लगी रहती है ।

ईश्वर ने मेरे लिये पहाडीयों के बीच शांताश्रम की एकांत और निर्जन जगह पसंद की है ! मेरे लिये यह नियति है, इश्वर की योजना है । भारतीय फिलसूफी में एक विचारधारा एसी है, जो चुपचाप नियति का स्वीकार करने के बजाय पुरुषार्थ का महिमा गाती है । शांताश्रम की शोभा देखते ही बनती है, इसके आसपास कई आम्रवृक्ष है । जिस आम्रवृक्ष के नीचे यह कुटिया है, वो धन्य है । इसकी छाया में बैठकर मैंने ढेर सारा चिंतन-मनन किया है, साधना की है, अवनवीन अनुभव प्राप्त किये है । अब मेरी साधना के मंदिर पर सिद्धि का सुवर्णकलश लगना बाकी है । एसा होने पर ये आम्रवृक्ष, ये हराभरा वन, धन्य और कृतार्थ हो जायेंगे । उनकी नजरों के आगे एक नया इतिहास लिखा जायेगा । वे इस घटना के मूक साक्षी होंगे । ये पर्वतशिखर, ये शांता नदी, ये चिडीयों के समूह – सब अपनी भाषा में उस धन्य घडी को व्यक्त करेंगे । धन्य है हिमालय ! तेरी गोद में रहकर मेरी काया कृतार्थ हो गई । मेरा इस संसार में आना सफल हो गया ! धन्य है पतितपावनी गंगा ! तेरे तट पर रहकर मेरी जवानी आत्मकल्याण तथा विश्वहित की साधना में व्यतीत हुई । यह जीवनकाल मेरे लिये फलदायी और सिद्ध साबित हुआ । इस संसार में आये अनगिनत लोगों की तरह मेरा जीवन स्त्री, धन, संतान या कीर्ती के पीछे भागने में व्यतीत नहीं हुआ । ना ही अन्य लोगों की तरह मुझे संसार से खाली हाथ वापिस जाना पडेगा । भरी जवानी में अपने पुरोगामी ऋषिमुनिओं से प्रेरणा पाकर मैंने पूर्णता के पथ पर कदम रक्खे । हे प्रभु, मेरे जीवन को अपनी कृपा से आलोकित करो । आपका सुखद सहवास जीवनभर रहें और मैं अपनी शक्तिओं का उपयोग 'बहुजनसुखाय और बहुजनहिताय' कर सकूँ, एसा आशीर्वाद दो । हिमालय की पुण्यभूमि में मेरे दिन एसी भावनाओं में व्यतीत हुए ।
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यहाँ आने के कुछ दिन बाद मुझे चंद्रवदनी जाना पडा । बंबई से एक उपासक बदरीनाथ की यात्रा करने आये थे । उनका आग्रह था की मैं उनके साथ चंद्रवदनी चलूँ । माताजी को कुछ दिनों के लिये मैं मगनभाई के घर छोड आया । पिछले कुछ वक्त से माताजी मेरे साथ रहती थी । हिमालय का कष्टप्रद जीवन उन्होंने स्वीकार किया था । यह पहला मौका था की वो इस तरह मुझसे तीन दिन के लिये अलग हुई ।

चंद्रवदनी समुद्रतल से करीब सात हजार फीट की उँचाई पर है । देवप्रयाग से चंद्रवदनी १७-१८ मील की दूरी पर है । यहाँ जाने के लिये पैदल रास्ता है । जाते वक्त खच्चर की सुविधा थी इसलिये ज्यादा श्रम नहीं करना पडा । चंद्रवदनी देवीमाँ का स्थान है । यहाँ मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है, केवल यंत्र है । मंदिर प्राचीन है और पर्वत के शिखर पर स्थित है । यहाँ से हिमालय तथा गढवाल के पहाडों की चोटीयाँ दिखाई पडती है । गर्मी की मौसम के बावजूद यहाँ काफि ठंड थी ।

नीचे उतरने वक्त हमें पैदल आना पडा क्योंकि खच्चर ठीक तरह से चल नहीं सकते । उतरते वक्त हाथ में लकडी रखने से आसानी होती है । मेरे पास खच्चरवाले की लकडी थी । उसने बीच रास्ते कहा, 'मुझे खच्चर हाँकने के लिये इसकी आवश्यकता है ।'
मैंने कहा, 'एसी दूसरी लकडी काटकर बनाई जा सकती है ।'
मैंने एसा इसलिये कहा क्यूँकि वो बारबार मुझे आशीर्वाद देने को कहता था ।
मैंने कहा, 'तू देवप्रयाग तक चलने के लिये मुझे अपनी लकडी नहीं दे सकता और मुझसे जीवनभर के आशीर्वाद की कामना करता है ? आशीर्वाद की तुलना में लकडी तो अत्यंत साधारण चीज है । बडी चिज पाने के लिये छोटी चिजों का त्याग करना पडता है । तू इतना भी नहीं कर सकता ?'
मेरी बात उसकी समज में आयी । फिर उसने आशीर्वाद के लिये आग्रह नहीं किया । उसका हृदय सरल था । मैंने भी उसको उसकी लकडी दे दी ।

बात भले ही साधारण लगें, मगर उसमें बडा रहस्य छीपा है । हम में से बहुत सारे लोग एसे है जो इश्वर या महापुरुषों से कृपा की याचना करते है, मगर इसके बदले में क्या करना चाहिये यह नहीं सोचते । प्रथम हमें अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी, फिर कृपा अपने आप होगी ।