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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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भारत धर्मप्राण देश है । हालाकि वर्तमान समय में धर्म की अवदशा हुई है । धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण हो रहा है । क्या सही और क्या गलत है ये परखने की, नीर-क्षीर विवेक करने की हंसवृत्ति कुंठित हो गयी है । एसे हालात में अगर कोई महापुरुष के दर्शन हो जाते है तो लगता है की अंधेरो के बीच उजाला मिल गया । दिल में खुशी की लहर दौड जाती है । तसल्ली होती है की हाँ, भारत में अब भी सच्चे संतपुरुष मौजूद है और भारत का आध्यात्मिक भविष्य उज्जवल है ।

जिस महापुरुष के बारे में मैं लिखने जा रहा हूँ, उसको मिलने की तमन्ना मेरे दिल में काफि वक्त से थी । वो बडौदा में रहते थे । पीछले कुछ अरसे से मैं वहाँ नहीं गया था इसलिये उनके दर्शन का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था । भाई भवानीशंकर ने मुझे बताया की वो मुझे मिलना चाहते है । ये भी कहा की अगर किसी कारणवश मुझे उनसे मिलने में दिक्कत आती है, तो वो खुद मुझे मिलने आयेंगे । एक वृद्ध महात्मा को तकलीफ देने के बजाय खुद उनके पास जाना उचित था । इसलिये मैंने प्रत्युत्तर भेजा की मैं अवश्य आपके दर्शन करने आउँगा ।

निर्धारित किये गये समय पर महात्माजीने मेरे लिये गाडी भेजी । साधारण रूप से हमारी ये कल्पना रहेती है की संतपुरुष का स्थान एकांत में होता है, मगर महात्माजी का घर बस्ती के बीचोबीच था । हालाकि घर के आसपास का माहौल शांत लगा । जैसे ही सीढियाँ चढकर हम उनके कक्ष तक पहूँचे, अपने आसन से खडे होकर उन्होंने मेरा स्वागत किया । मैंने उनको प्रणाम किया । मैं नीचे बैठने जा ही रहा था की उन्होंने मुझे आसन पर बैठने को कहा । उनके जैसे अनुभवी वृद्ध महापुरुष के साथ आसन पर बैठना मुझे अजीब लगा फिर भी उनके आग्रह के कारण मुझे एसा करना पडा । इस छोटी-सी बात से उनकी महानता का परिचय मिलता है । आजकल लोग उम्र या पढाई देखकर छोटे-बडे का भेद करते है और योग्यता को नजरअंदाज करके स्वयं को बडा दिखाने की कोशिश करते है । उच्च आसन पर बैठना, औरों से अपनी पूजा करवाना, प्रसंशा के शब्द सुनना उन्हें अच्छा लगता है । उनकी तुलना में, वयोवृद्ध महात्मा की मुझे आसन देने की चेष्टा उनकी विनम्रता तथा बडप्पन की द्योतक थी । एसा करना कितना कठिन है ये कोई अनुभवी पुरुष ही समज पायेगा ।

महात्माजी की उम्र काफि थी, इसका निश्चित अंदाजा लगाना मुश्किल था । सुनने में आया की, ८० साल के वृद्ध, जो अभी जिन्दा है, उनको महात्माजी ने जब वो बच्चा था, खिलाया-पीलाया था । इससे उनकी उम्र सो साल से ज्यादा होने का अनुमान लगाया जा सकता था । उनके शरीर को देखकर इस धारणा को पुष्टि मिलती थी । वो अत्यंत धीमी गति से चलते थे । हाथ में माला लेकर भगवन्नाम के जाप करते हुए जब वो मेरे पास बैठे तो उनकी आँख और मुखाकृति देखकर मुझे बहुत कुछ जानने को मिला ।

जब बाबा रामनाथजी कालीकमलीवाला संस्था में थे, तब महात्माजी ऋषिकेश रहते थे । उनको रामनाथजी से काफि स्नेह हो गया था । पीछले कुछ सालों से महात्माजी बडौदा में खुद का मकान लेकर रहते थे । बीच-बीच में अपने जन्मस्थान भी जाते थे । जलगाँव, खंडवा, आदि जगहों पर उनके कई भक्त थे । उनके कुछ भक्त, परिवार समेत, अपना सबकुछ महात्माजी के चरणों में अर्पण करके उनकी सेवा में रहें थे । महात्माजी का स्वभाव शांत, नम्र और प्रेमाल था । कभीकभा कोई विद्वान पुरुष उनसे मशवरा लेने आते थे मगर ज्यादातर वो प्रसिद्धि से बचकर रहते थे । शिष्यों की संख्या में वृद्धि करने की उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी । युवावस्था में लिये गये उनके कौपीनधारी फोटों से लगता था की उन्होंने भारी तपश्चर्या की होगी । महात्माजी के साथ मेरी कुछ बातचीत हुई । फिर उन्होंने मुझे भजन गाने के लिये कहा इसलिये मैंने दो-तीन भजन सुनायें ।

जब मैं भजन गा रहा था तो महात्माजी ने अपने किसी भक्त को मेरी पूजा करने की सूचना दी । मैंने कहा, ‘ये ठीक नहीं है । मैं तो एक साधारण बालक हूँ । आपके सन्मुख मेरी पूजा हो, ये मुझे उचित नहीं लगता ।’ फिर भी उन्होंने विधिपूर्वक चंदन का टीका लगाकर मेरी पूजा करवाई, हार और फूल का गजरा दिलाया । महत्व पूजन का नहीं था मगर जिस तरह से उन्होंने मेरा पूजन करवाया, वो उनकी महानता दर्शाता था । भक्तसमुदाय के आगे किसी अन्य व्यक्ति का अपने भक्तों से पूजन करवाना आम बात नहीं है । इसके लिये असाघारण विनम्रता, पवित्रता तथा उदारता चहिये । उनके बर्ताव से मेरे हृदय में उनके प्रति जो पूज्यभाव था, अनेक गुना बढ गया । जब उनसे बिदा लेने का वक्त हुआ तो उनका स्नेह देखकर हृदय गदगदित हो गया ।

उनके जीवन से भले कुछ और न सीखें, केवल नम्रता का गुण सिख ले तो भी हमारा जीवन उज्जवल हो सकता है । एसी सरलता और मृदुता शायद ही किसी महापुरुष में देखने को मिलती है । एसे महापुरुष जहाँ भी हो, जो भी वेशभूषा में हो, हमारे लिये पूजनीय और वंदनीय है इसमें कोई संदेह नहीं है ।

महात्माजी अपने भक्तगण में अन्नदाता के नाम से जाने जाते थे । उनके पास गया हुआ कोई भी व्यक्ति प्रसाद लिये बिना वापिस नहीं लौटता था । पंढरीनाथ भगवान विठ्ठल की उन पर कृपा थी, और लक्ष्मीजी उनकी सेवा के लिये हमेशा तत्पर रहती थी । मुझे मिलने के लिये उन्होंने निमंत्रण दिया तो भाई भवानीशंकर को सूचना दी की मेरे लिये बाजार से फल तथा सूकामेवा लाया जाय ।

महात्माजी की समर्थता को प्रदर्शित करते हुए कई प्रसंग है । उनमें से एक, जो मैंने विश्वस्त सूत्रों से सुना था, यहाँ बता रहा हूँ । मध्य भारत में उदयगढ से पाँच मील की दूरी पर चांदोद गाँव है । यहाँ एक मकान में उन्होंने तीस दिन तक बिना कुछ खायेपीये तपश्चर्या करने का प्रण लिया । उदयपुर के महाराणा को महात्माजी पर प्रेम था । उनकी तपश्चर्या निर्विघ्न हो इस हेतु-से उन्होंने महात्माजी के कमरे के बाहर पहेरेगीर रखा और किसीके भी कहने पर कमरा नहीं खोलने की सूचना दी । तीस दिन खत्म होने पर महात्माजी ने कमरा खोलने का आदेश दिया । पहेरेगीर ने कहा की राजा की आज्ञा मिले बिना वो कमरा नहीं खोल सकता । महात्माजी ने कहा, मैं तो सिर्फ इश्वर का हुकम मानता हूँ, कोई राजा-महाराजा का नहीं । ये कहकर वो अपने आप कमरे के बाहर आ गये । जब महाराणा वहाँ आये तो महात्माजी को कमरे के बाहर देखकर हैरत में पड गये । उन्होंने महात्माजी को प्रणाम किया और उसी जगह पर विठ्ठल मंदिर की स्थापना की । आज भी यहाँ साधुसंत तथा अतिथिओं को भोजन कराया जाता है ।

दंभ, पाखंड तथा कपटवृत्ति से मीलों दूर हो, एसे कुछ गिनेचुने महापुरुष आज बचे है । वो केवल इश्वर के प्रेमरस में डूबे रहते है । पूर्व के पुण्योदय से जब हमारी एसे महापुरुषों से भेंट होती है तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता । अन्नदाता के समागम से मुझे जो आनंद मिला था, वो कैसे कहूँ ?

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