Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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अनसूया
महर्षि व्यास के विराट व्यक्तित्व को अंजलि देकर, प्रभात के प्रथम प्रहर में, हम अनसूया माता के स्थान गये । मंदिर सरितातट से थोडी दूरी पर है । अनसूया माता के बारे में यह कथा सुप्रसिद्ध है । एक दफा ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश, उनकी पवित्रता की परीक्षा करने अत्रि मुनि के आश्रम गये । अनसूया माता उनको भीक्षा देने लगी तो तीनों ने हठ ली की वो निर्वस्त्र होकर भीक्षा दें, तभी वो उसका स्वीकार करेंगे । अनसूया ने अपने योगबल से तीनों को शिशु बना दिया और भिक्षा दी । जब तीनों अपने मूल रूप में आये, तो उन्हें अपने किये पर पछतावा हुआ । अनसूया माता की माफी माँगकर तीनों आश्रम से निकल पडे । अत्रि ऋषि को जब यह पता चला तो वो आश्चर्यचकित रह गये ।

एक और कथा प्रसिद्ध है, जिसका उल्लेख पुराणों में है । एक पतिव्रता स्त्री को मालूम पडा की सूर्योदय होते ही उसका पति मर जायेगा तो उसने अपने प्रभाव से सूर्य को उदय होते रोक दिया । कई दिनों तक संसार में अंधेरा छाया रहा । इसका हल ढूँढने देवतागण अनसूया के पास गये । अनसूया माता ने उनको आश्वासन दिया और कहा की सूर्योदय जरूर होगा । अनसूया वो स्त्री के पास गयी और उसे कहा की ‘अगर मैं मन-वचन-कर्म से पतिव्रता हूँ तो तेरा पति जिन्दा रहेगा, उसे कुछ नहीं होगा ।’ इस पर भरोंसा करके स्त्रीने सूर्योदय होने दिया । मगर जैसे ही सूर्योदय हुआ, स्त्री का पति श्राप के कारण मर गया । तभी अनसूया ने अपनी शक्ति से उसे फिर जिन्दा किया ।

अनसुया के घर चंद्रमा, दुर्वासा और दत्तात्रेय के रुप में तीन देवों ने जन्म लिया था । अनसूया नारी की विराट शक्ति का प्रतीक है । संयम के स्थान पर स्वच्छंदता और शक्ति के स्थान पर निर्बलता के प्रतीक हुए भारत के स्त्रीपुरुषों को देखकर अत्रि, अनसूया तथा दत्तात्रेय के दिल पर क्या बीतती होगी ? चोबीस गुरुओं से प्रेरणा लेनेवाले, और संसार के प्रत्येक पदार्थ से अपनी गुणग्राहकता से सार ग्रहण करनेवाले हे दत्त भगवान, आप हमारे देशवासीयों में सेवा, शक्ति, स्नेह और देशभक्ति भरो ! अनसूया माता के स्थान में हम इसके अलावा क्या प्रार्थना कर सकते थे ?
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सीसोदरा का आश्रम
अनसूया माता का स्थान देखकर हम सीसोदरा गये । सीसोदरा सीनोर के बिल्कुल सामने पडता है । यहाँ आते आते ग्यारह बज गये, इसलिये धूप काफि हो चुकी थी । यहाँ गाँव से थोडी दूरी पर एक आश्रम है । इस आश्रम के ट्रस्टी कोठारीजी का आग्रह था की मैं वहाँ आउँ और अगर मुझे यह स्थान पसंद आये तो जब भी गुजरात आउँ, यहाँ रहकर साधना करुँ । आश्रम में हमें दो साधुपुरुष मिले, जिन्होंने हमारे रहने का इन्तजाम किया ।

आश्रम की जगह अच्छी थी । चारों ओर आम्रवृक्ष थे, पानी के लिये हेन्डपंप लगा था । हालाकि सरितातट पर न होने के कारण आश्रम की शोभा कुछ फिकी लगी । आश्रम में एक स्वामीजी अपनी पत्नी के साथ रहते थे । उन्होंने अपना नाम राम और सीता तथा अपने शिष्य का नाम पवनसुत रक्खा था । जब हम वहाँ गये तो स्वामीजी बंबई गये थे, तथा उनका शिष्य नागपुर गया था । इनके अलावा एक गुजराती परिवार अपने चार संतानो के साथ आश्रम में रहता था । परिवार के मुखिया का नाम ब्रह्मचारी था । उनका स्वभाव विवेकी और मिलनसार लगा । एसे पचरंगी वातावरण में रहने का मन नहीं हुआ । इसलिये एक-दो दिन रहकर हम सिनोर आये ।

सिनोर नर्मदातट पर स्थित महादेव का स्थान है । ये भीडभाड से दूर और कुछ उँचाई पर होने के कारण साधना के लिये योग्य लगा । यहाँ धर्मशाला तथा अन्य आवश्यक सुविधा है । सिनोर से दोपहर की ट्रेन में हम मालसर आये । मालसर अपने तीन मंदिरो की वजह से प्रख्यात है । इनमें से एक माधवदासजी का है, जो हिमालय में साधना करके यहाँ आये थे, और सिद्धपुरुष थे । मालसर से हम सिनोर आये और वहाँ से बडौदा के लिये रवाना हुए । हमारी एक सप्ताह की नर्मदा-यात्रा इस तरह पूर्ण हुई ।

नर्मदातट की यात्रा करने का प्रधान लक्ष्य सीसोदरा के आश्रम का मोआईना करना तथा तटवर्ती स्थानों का नजारा करना था । मुझे पहली नजर में, साधना के लिये कोई स्थान पसंद नहीं आया । हम शूलपाणेश्वर नहीं गये, इसलिये उसके बारे में कुछ बता नहीं सकता ।

अधिक वैशाख मास चल रहा था । इस पवित्र महिने में साबरमती और नर्मदा – दो नदीयों के दर्शन-सेवन का लाभ मिला । अब गंगाजी की बारी थी ।