if (window.top.location.href !== window.self.location.href && !window.top.location.href.startsWith('https://www.swargarohan.org/')) { window.top.location.href = window.self.location.href; }

Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921

१ अप्रैल १९५२ के दिन हम वेरावल गये । चैत्र मास चल रहा था, इसलिये मेदानी इलाकों में गर्म हवा थी । यहाँ आने पर समंदर की शीतल हवा का अनुभव हुआ । स्टेशन पर मनुभाई हमें लेने आये थे । मनुभाई वेरावल में डेप्युटी कलेक्टर नियुक्त हुए थे । उन्होंने अच्छी पढाई की थी, और इश्वरकृपा से उन्हें अच्छी नौकरी मिली थी । उनको रहने के लिये सरकारी मकान दिया गया था । मकान गाँव से दूर मगर समंदर तट पर था इसलिये गर्मी का नामोनिशान नहीं था । यहाँ रहना हमें अच्छा लगा । हम कुल मिलाकर बीस दिन यहाँ रहें ।

वेरावल के पास सोमनाथ मंदिर है । मंदिर का इतिहास जानने लायक है । इस पर विधर्मीओं ने कई दफा आक्रमण किया, मगर उसका नाश नहीं कर पाये । जब भी मंदिर का ध्वंस होता था, उसे फिर बनाया जाता था । मंदिर, मस्जीद या किसी धर्मग्रंथ का नाश करने से लोगों की धार्मिक भावना नष्ट नहीं होती । वो तो दिल की गहराईयों में छूपी होती है । धर्म का बाह्य कलेवर भले खत्म हो जाय, उसकी भावना दिल से मिटाना मुश्किल है । काश, ये बात सबकी समज में आ जाये तो धर्मांतरण तथा जोर जबरदस्ती का अन्त हो जायें । धर्मों के बीच जो झगडे हो रहे है इसका अन्त हो जायें । जितनी जल्दी हम ये सिख ले, हमारे लिये लाभदायी होगा ।

वेरावल से हम प्राची गये । प्राची पौराणिक तीर्थस्थान है । कहा जाता है की यहाँ पृथु राजा ने यज्ञ किया था । मार्ग में हमने गोरख मढी का दर्शन किया । यहाँ गोरखनाथजी का भूगर्भ स्थान है । वेरावल में गायत्री देवी का प्राचीन मंदिर है । हम उनका दर्शन कर आये । अब हिमालय जाने का वक्त समीप आ गया था, इसलिये सरोडा जाना आवश्यक था ।

वेरावल से लौटने के बाद कुछ दिन साबरमती रहें । इस बार देवप्रयाग जाने को मन नहीं कर रहा था क्योंकि शांताश्रम रहनेलायक नहीं रहा था । मेरा विचार ऋषिकेश में किसी अच्छे स्थान की तलाश करके वहाँ रहने का था । मन में आल्मोडा जाने की इच्छा भी थी क्योंकि वेरावल के एक भाई ने आल्मोडा के तीन प्रतिष्ठित व्यक्तिओं के नाम मुझे चिठ्ठी दी थी । एक विचार उत्तरकाशी जाने का था । इन तीन स्थानों में से कहाँ जाना चाहिये ये तय नहीं हो रहा था । एक दिन माँ ने प्रेरणा की मुझे आलमोडा जाना चाहिये ।

अहमदाबाद से हम आल्मोडा जाने के लिये ट्रेन में बैठे । हमें बांदीकुई और अचनेरा – दो जगह पर ट्रेन बदलनी थी । हमारी पहली ट्रेन चार घण्टा लेट हो गयी, इससे अचनेरा की ट्रेन छूट गयी । न चाहते हुए भी हमें बांदीकुई में रात गुजारनी पडी । वहाँ हमारी भेंट रेल्वे में काम कर रहे गुजराती भाई से हुई । वो हमें आग्रह करके अपने घर ले गये । उनके घर पे रेल्वे के जनरल टिकट इन्स्पेक्टर से भेंट हुई । उन्होंने हमे आग्रा जाने की सलाह दी । कहा की आल्मोडा जाने के लिये काठगोदाम की ट्रेन आग्रा से चलती है, इसलिये वहाँ से बैठना ठीक रहेगा । हमने आग्रा जाना तय किया । अभी रात बांदीकुई में गुजारनी थी ।

रात को गुजराती भाई ने कठपूतली का खेल दिखानेवाले आदमीयों को बुलाया । करीब देढ घण्टे तक उनका कार्यक्रम चला । इससे हमारा वक्त अच्छी तरह से कट गया । कठपूतली का खेल देखकर मन में विचार आया की जैसे आदमी पूतलीओं को नचा रहा था, ईश्वर भी हमें नचा रहा है । हम भले कर्म करने के लिये स्वतंत्र है मगर हमारे कर्म किसी अदृश्य शक्ति की प्रेरणा से होते है । गाँव के गरीब और अनपढ लोग पेट भरने के लिये कठपूतली का खेल करते है और लोग उसे खुशीखुशी देखते है । इसमें ज्यादातर राजा-रानी की कहानियाँ होती है । अगर वे हमारे इतिहास या किसी प्रेरणादायी व्यक्तित्व को कहानी के माध्यम से पेश करें तो लोगों को बहुत कुछ सिखने को मिलेगा । ज्ञान के साथ गम्मत होगी । वरना आज के जमाने में पढेलिखे लोगों को एसा खेल शायद ही पसंद आयेगा ।

दूसरे दिन सुबह हम आग्रा पहूँचे । उस दिन वैशाखी पूर्णिमा और बुद्ध जयंति थी । आग्रा में देखनेलायक चिज ताजमहल है । कहा जाता है की मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी पत्नी की याद में उसे बनवाया था । यमुनाजी के तट पर संगेमरमर से बना ताजमहल विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है । ताजमहल को बने बरसों हो गये फिर भी वो एसा दिखता है, मानो कल बना हो । कवियों ने ताजमहल पर न जाने कितनी कवितायें लिखी है । अब लोग चाहते है की इमारतों की पूजा होने के बजाय इससे देश या समाज को लाभ हो । आज बुद्ध जयंति थी, इसलिये हम जीवन की चंचलता, मृत्यु की अवश्यंभाविता तथा अपने जीवन की एसी-ही उत्तुंग इमारत खडी करने के बारे में सोचते रहें ।

रात को आग्रा से निकलकर सुबह काठगोदाम पहूँचे । यहाँ से बस में बैठकर आल्मोडा गये । बाद में किसीने बताया की आल्मोडा जाने के लिये काठगोदाम के बजाय हल्दवानी से बस लेना अच्छा रहता है । पहाडीयों के सर्पाकार रास्तों से गुजरते हुए, करीब छे घण्टे की सफर के बाद हम आल्मोडा पहूँचे ।

काफि अरसे के बाद हम हिमालय में आये । हिमालय का नाम सुनते ही दिलोदिमाग में खुशी की लहर दौड जाती है । आल्मोडा की चारों ओर उत्तुंग पर्वतमालाएँ है । अन्य पहाडी प्रदेशों की तुलना में औलमोडा का विकास अच्छा हुआ है, एसा पहली नजर में लगा । दूसरे दिन सिफारीश के खत लेकर हम संबंधित व्यक्तिओं से मिलने गये मगर हमारा काम नहीं बना । आल्मोडा में रहने का इन्तजाम नहीं हुआ इसलिये हमने ऋषिकेश जाने का फैंसला किया ।

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.