आलमोडा से लंबी सफर तय करके हम ऋषिकेश आये । उत्तराखंड में आकर हमें अच्छा लगा । गंगाजी के कारण ऋषिकेश की शोभा देखते ही बनती है । यात्रा का समय था, इसलिये हजारों की तादात में यात्री देखने को मिले । बदरीनाथ जाने के लिये ऋषिकेश आना पडता है । देवप्रयाग और ऋषिकेश के वातावरण में बहुत फर्क है । ऋषिकेश के आगे का प्रदेश नैसर्गिक रुप से सुंदर, एकांत, तथा आध्यात्मिक परमाणुओं से भरा है । देवप्रयाग में रहकर मैंने साधना की थी, इसलिये मुझे देवप्रयाग ज्यादा पसंद था मगर शांताश्रम इस वक्त रहनेलायक नहीं था । पिछले दो साल से हम जिस शेठ के मकान में रहते थे, उसने अपने कमरे यात्रीओं को किराये पर दिये थे, इसलिये वहाँ रहना मुमकीन नहीं था । हमने ऋषिकेश में रहना तय किया । भरत मंदिर के ज्योतिप्रसाद भट्ट और देवप्रयाग के मुरलीधर शास्त्री की पहचान से भरत मंदिर में हमारे रहने का इन्तजाम हुआ । भरत मंदिर की धर्मशाला सुंदर है, यहाँ से गंगाजी तथा हिमालय का दर्शन होता है । यहाँ हमारे दिन आनन्द से कटने लगे ।
वैसे तो पहाडी इलाकों में गर्मी कम होती है, मगर इस साल ऋषिकेश में सख्त गर्मी थी । यात्रीओं की काफि भीड थी इसलिये शुरु-में थोडी अशांति महसूस हुई मगर यात्रा की मौसम खत्म होने पर माहौल शान्त हो गया ।
बारीश की ऋतु में हिमालय और गंगाजी की शोभा सविशेष होती है । हालाकि अब वो ऋषिकेश नहीं रहा जो २५-३० साल पहले हुआ करता था । तब यहाँ कई सिद्ध और कृतकाम महात्मा निवास करते थे । हरिद्वार में लक्ष्मण सिद्ध और कामराज सिद्ध तथा ऋषिकेश में शीलनाथ महाराज की कहानियाँ सुनने को मिलती थी । आज भी यहाँ समर्थ सिद्धपुरुष रहते है, मगर लोग उससे अनजान है । लोगों का भरोंसा बना रहें इसलिये मैं कुछ प्रसंगो का उल्लेख करना चाहता हूँ ।
ऋषिकेश के पास विरभद्र का स्थान है । वहाँ एक ब्राह्मण हररोज पूजा करने जाता था । एक दिन किसी कारणवश वो लेट हो गया । शाम हो गयी और बारीश शुरु हुई । ब्राह्मण दुविधा में पड गया की वीरभद्र कैसे जायें ? वो मार्ग में कहीं रुक गया । उसने भगवान शंकर का स्मरण किया । तभी जंगल की और से पावडी (लकडी के जूते) की आवाज आयी । मुडके देखा तो कोई महात्मा आ रहे थे । उनके मुख पर उजाला था । उन्होंने आकर ब्राह्मण से पूछा, 'क्या वीरभद्र जाना चाहते हो ? मेरे साथ चलो, मैं भी वहाँ जा रहा हूँ ।' एसा कहकर वो आगे-आगे चलने लगे और ब्राह्मण उसके पीछे । महात्मा के आसपास प्रकाशपूंज था, इससे मार्ग साफ दिखाई पडता था । महात्मा के साथ चलते-चलते ब्राह्मण मंदिर तक पहूँच गया । उसने देखा तो बारिश रुक गयी थी और महात्मा अदृश्य हो गये थे । पूजा करने के बाद ब्राह्मण मंदिर से वापिस लौटा तो आकाश बिल्कुल साफ था । चांदनी थी इसलिये रास्ता तय करने में कोई कठिनाई नहीं हुई ।
दूसरी घटना भरत मंदिर में घटी थी । मंदिर में काम कर रहे एक मजदूर को पैर में चोट आयी थी । वो ठीक तरह से चल नहीं सकता था । एक दफा जब वो मंदिर के कुए के पास बैठा था तो एक महात्मा आये । उन्होंने मजदूर के पैर में औषधि लगाई, जिससे उसकी सारी पीडा चली गयी । वह बिल्कुल पहले की तरह चलने लगा । उसे यकीन हो गया की महात्मा कोई साधारण पुरुष नहीं है । उसे ढूँढने के लिये वो पीछे-पीछे गया मगर वो कहीं नहीं मिले । मानो अदृश्य हो गये ।
आज भी इस भूमि में कई सिद्धपुरुष रहते है । उनके दर्शन आसानी से नहीं होते, मगर अधिकारी जीव को, वो अपनी मरजी से दर्शन देते है ।

