if (window.top.location.href !== window.self.location.href && !window.top.location.href.startsWith('https://www.swargarohan.org/')) { window.top.location.href = window.self.location.href; }

Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921

आलमोडा से लंबी सफर तय करके हम ऋषिकेश आये । उत्तराखंड में आकर हमें अच्छा लगा । गंगाजी के कारण ऋषिकेश की शोभा देखते ही बनती है । यात्रा का समय था, इसलिये हजारों की तादात में यात्री देखने को मिले । बदरीनाथ जाने के लिये ऋषिकेश आना पडता है । देवप्रयाग और ऋषिकेश के वातावरण में बहुत फर्क है । ऋषिकेश के आगे का प्रदेश नैसर्गिक रुप से सुंदर, एकांत, तथा आध्यात्मिक परमाणुओं से भरा है । देवप्रयाग में रहकर मैंने साधना की थी, इसलिये मुझे देवप्रयाग ज्यादा पसंद था मगर शांताश्रम इस वक्त रहनेलायक नहीं था । पिछले दो साल से हम जिस शेठ के मकान में रहते थे, उसने अपने कमरे यात्रीओं को किराये पर दिये थे, इसलिये वहाँ रहना मुमकीन नहीं था । हमने ऋषिकेश में रहना तय किया । भरत मंदिर के ज्योतिप्रसाद भट्ट और देवप्रयाग के मुरलीधर शास्त्री की पहचान से भरत मंदिर में हमारे रहने का इन्तजाम हुआ । भरत मंदिर की धर्मशाला सुंदर है, यहाँ से गंगाजी तथा हिमालय का दर्शन होता है । यहाँ हमारे दिन आनन्द से कटने लगे ।

वैसे तो पहाडी इलाकों में गर्मी कम होती है, मगर इस साल ऋषिकेश में सख्त गर्मी थी । यात्रीओं की काफि भीड थी इसलिये शुरु-में थोडी अशांति महसूस हुई मगर यात्रा की मौसम खत्म होने पर माहौल शान्त हो गया ।

बारीश की ऋतु में हिमालय और गंगाजी की शोभा सविशेष होती है । हालाकि अब वो ऋषिकेश नहीं रहा जो २५-३० साल पहले हुआ करता था । तब यहाँ कई सिद्ध और कृतकाम महात्मा निवास करते थे । हरिद्वार में लक्ष्मण सिद्ध और कामराज सिद्ध तथा ऋषिकेश में शीलनाथ महाराज की कहानियाँ सुनने को मिलती थी । आज भी यहाँ समर्थ सिद्धपुरुष रहते है, मगर लोग उससे अनजान है । लोगों का भरोंसा बना रहें इसलिये मैं कुछ प्रसंगो का उल्लेख करना चाहता हूँ ।

ऋषिकेश के पास विरभद्र का स्थान है । वहाँ एक ब्राह्मण हररोज पूजा करने जाता था । एक दिन किसी कारणवश वो लेट हो गया । शाम हो गयी और बारीश शुरु हुई । ब्राह्मण दुविधा में पड गया की वीरभद्र कैसे जायें ? वो मार्ग में कहीं रुक गया । उसने भगवान शंकर का स्मरण किया । तभी जंगल की और से पावडी (लकडी के जूते) की आवाज आयी । मुडके देखा तो कोई महात्मा आ रहे थे । उनके मुख पर उजाला था । उन्होंने आकर ब्राह्मण से पूछा, 'क्या वीरभद्र जाना चाहते हो ? मेरे साथ चलो, मैं भी वहाँ जा रहा हूँ ।' एसा कहकर वो आगे-आगे चलने लगे और ब्राह्मण उसके पीछे । महात्मा के आसपास प्रकाशपूंज था, इससे मार्ग साफ दिखाई पडता था । महात्मा के साथ चलते-चलते ब्राह्मण मंदिर तक पहूँच गया । उसने देखा तो बारिश रुक गयी थी और महात्मा अदृश्य हो गये थे । पूजा करने के बाद ब्राह्मण मंदिर से वापिस लौटा तो आकाश बिल्कुल साफ था । चांदनी थी इसलिये रास्ता तय करने में कोई कठिनाई नहीं हुई ।

दूसरी घटना भरत मंदिर में घटी थी । मंदिर में काम कर रहे एक मजदूर को पैर में चोट आयी थी । वो ठीक तरह से चल नहीं सकता था । एक दफा जब वो मंदिर के कुए के पास बैठा था तो एक महात्मा आये । उन्होंने मजदूर के पैर में औषधि लगाई, जिससे उसकी सारी पीडा चली गयी । वह बिल्कुल पहले की तरह चलने लगा । उसे यकीन हो गया की महात्मा कोई साधारण पुरुष नहीं है । उसे ढूँढने के लिये वो पीछे-पीछे गया मगर वो कहीं नहीं मिले । मानो अदृश्य हो गये ।

आज भी इस भूमि में कई सिद्धपुरुष रहते है । उनके दर्शन आसानी से नहीं होते, मगर अधिकारी जीव को, वो अपनी मरजी से दर्शन देते है ।

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.