Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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दिन ६ (आसो सुद ५, मंगलवार तारीख १३-१०-१९५३)

जो मुसाफिर मार्ग में आनेवाली रुकावटों से हारकर बीच सडक बैठ जाता है, वो अपनी मंझिल नहीं पा सकता । जो साधक निराश या हताश होकर अपना प्रयास अधूरा छोड देता है, वो सफल नहीं हो पाता । जो गोताखोर समंदर की लहरों को देखकर किनारे पर बैठ जाता है, वो मोतीओं को हासिल नहीं कर पाता । कीमती मोती पाने के लिये उसे समंदर की गहराईयों में जाना होगा, अपना जीवन दाव पर लगाना होगा ।

परमात्मा की कृपा और आत्मिक साधना का समंदर भी गहेरा है । उसमें पूर्णता का मोती पाने के लिये साधक को अपना सबकुछ दाव पर लगाना होगा । उसे ये बात हमेशा याद रखनी होगी की जरा सा अहंकार साधना को नष्ट कर देता है । सिद्धिरूपी मोती हासिल करने के लिये उसे नम्रता से प्रभुकृपा के लिये प्रयास करना होगा । परमात्मा के प्रेमसिंधु से अब तक कोई साधक निराश होकर नहीं लौटा । आशा है, आप भी मुझे खाली हाथ नहीं लौटायेगें, मुझे अवश्य कृतार्थ करेंगे ।
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दिन ७ (आसो सुद ६, बुधवार तारीख १४-१०-१९५३)

गंगाजी का प्रवाह कितना हृदयंगम है । उसे देखते ही दिलोदिमाग में प्रसन्नता की लहर दौड जाती है । गंगाजी के प्रवाह में कोई स्नान करता है, कोई सुबह-शाम उसके निर्मल जल का अर्घ्य देता है, कोई उसके तट पर आसन लगाकर संध्यापाठ करता है, कोई उसकी आरती उतारता है, कोई उसके पुनित प्रवाह में पुष्प समर्पित करता है तो कोई उसे दो हाथ जोडकर प्रणाम करता है । एसा करने की वजह ये है की लोग उसे सिर्फ पानी का प्रवाह नहीं मानते मगर चैतन्य का प्रतीक समजते है ।

गंगा की धारा निर्मल है, सरल है, औरों के लिये लाभदायी है, मंगलकारक है । समुद्र की ओर निरंतर अभिसरण करना उसका लक्ष्य है । अगर हमारा जीवन भी उसकी तरह निर्मल, सरल और लोगों के लिये उपकारक हो जाय, तथा परमात्मा की और अभिसरण करने लगे तो इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है ।

मगर आपकी पूर्ण कृपा के बगैर क्या एसा हो सकता है ? इसी लिये तो मैं गंगाजी के तट पर आसन जमाकर आपको बिनती कर रहा हूँ की हिमालय की पर्वतमाला से निकलकर जिस तरह से सूर्योदय होता है, आप अपने कृपाकिरण लेकर मेरे जीवन में प्रकट हो जाओ । मुझे दिव्य प्रकाश और शांति का वरदान दो । इससे ज्यादा मैं आपको क्या कहूँ ?

कलियुग अन्न को प्राण कहा गया है । प्राणीमात्र अन्न ग्रहण करके जिन्दा रहते है और मैं अन्न-त्याग करके अनशन कर रहा हूँ । फिर भी आप मुझे चूपचाप देख रहे हो, कुछ करते नहीं, क्या यह आश्चर्य नहीं है ? अगर आप मेरे जैसे प्रेमी भक्तों की एसी परीक्षा लेते हो, तो आम आदमी का क्या होगा ?

गंगाजी में जब कोई नाव फँस जाती है तो गंगाजी की लहरें उसे धक्का लगाती है, हवा उसका साथ देती है, और नाव इधरउधर होती रहती है । लोगों को एसा तमाशा देखने में मजा आता है । मगर नाव की असहायता के बारे में कोई नहीं सोचता । एसे में कोई नाविक वहाँ आकर उसे बचाने के लिये कूद पडता है, उसे हलेसा मारकर उसके निर्धारित लक्ष्य पर ले जाता है । तब नाव की खुशी का ठिकाना नहीं रहता ।

मेरी हालत बिल्कुल उस नाव की तरह है । आपके प्यार और विरह के जल में वो हालमडोलम होती रहती है । उसे आप जैसे माँझी की जरूरत है । आपके अलावा कौन उसे अपनी मंझिल तक ले जायेगा ? इसीलिये कहेता हूँ की आप जल्द से जल्द आकर मेरी जीवननैया पार लगाओ ।
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दिन ८ (आसो सुद ७, गुरुवार तारीख १५-१०-१९५३)

आज अनशन का आठवाँ दिन है । फिर भी आप निश्चल होकर तमाशा देख रहे हो । क्या आपका दिल नहीं करता की मुझे आकर सांत्वना के दो शब्द कहो ?

लोग कहते है की स्त्री का हृदय कुसुम सा कोमल होता है, इससे किसीका दुःख नहीं देखा जाता । तो क्या मेरे कष्ट को देखकर आपको कुछ नहीं होता ? आपकी करुणा का स्रोत क्या मेरे लिये सूख गया है ?

शास्त्रों में लिखा है तथा संतो ने कहा है, की कलियुग में आपकी कृपा जल्दी हो जाती है । मगर मुझे एसा नहीं लगता । अगर एसा होता तो अब तक आपकी कृपा मुझ पर नहीं होती ?

विपत्ति, विरह और वेदना की वह्नि में मैं दिनरात जल रहा हूँ । आपके प्रेम की भभूति लगाकर, विषयों का त्याग करके आपके चरणों में मुक्तिसुख पाने के लिये मैं तलसता रहता हूँ । ममता और आसक्ति का त्याग करके, एकमात्र आपको जीवनसर्वस्व मानकर, तपस्या की वेदी में अपने आपको जला रहा हूँ । फिर भी मैं आपकी पूर्ण कृपा से अभी तक वंचित हूँ । क्या यही आपका प्यार है ?

जिसके हौसले बुलंद नहीं होते, जिसके इरादे फौलाद के नहीं होते, वे कुछ कदम चलकर लौट आते है । जिसका मन अहंकार से उन्मत्त होता है, वो असफल रहता है, उसके नसीब में आपकी कृपा नहीं होती । मगर नम्र और निरहंकारी साधक, जो चातक पक्षी की तरह केवल आपकी प्रेमसुधा के लिये तरसता है, उस पर आपकी कृपा होती है । उसके दुःख दर्दो का हमेशा के लिये अन्त होता है । बस, इस बात पर भरोंसा करके, आपके प्रेम पर विश्वास करके, मैं तरस रहा हूँ ।

शायद मैं आपके काबिल नहीं हूँ, मगर काबिलियत तो आपके दर्शन से आ जायेगी । अगर मुझमें कोई एब है, मैंने कोई दुष्कर्म किये है, तो वो आपके दर्शन से नेस्तनाबूद हो जायेंगे । आपके सुधामय संस्पर्श से मेरा तन, मन, और अंतर बदल जायेगा । मेरा जीवन अलौकिक हो जायेगा ।

हे भक्तों के पारसमणि ! अब तनिक भी विलंब न करो । मेरे आगे तत्क्षण प्रकट हो जाओ । मुझे अपने शीतल, सुमधुर और सुगंधित स्पर्श से सुवर्णमय करो । मुझे प्रेम, पवित्रता और पूर्णता का पारस करो ।
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दिन ९ (आसो सुद सातम, गुरुवार तारीख १५ अक्तूबर १९५३)

आज नवरात्री का आखरी दिन है । मेरी आपसे आग्रहभरी बिनती है की आज आप मुझ पर कृपा करो, मेरी चिन्ता तथा वेदना का सुखद अन्त करो ।

नवरात्री में लोग आपके नाम से उत्सव मनाते है, रातभर जागकर नृत्य, गान और भजन करते है । अगर आप मुझ पर कृपा करो तो मैं भी परमानंद का भागी बनूँ । आप दर्शन देकर मेरे तन-मन-अंतर में एसा रास जगाओ जो हमेशा चलता रहै ।
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दिन १० (विजयादशमी, शनिवार, तारीख १७ अक्तूबर १९५३)

आज विजयादशमी है । मैंने सोचा था की आजका दिन मेरे लिये विजय पर्व होगा । सभी लोगों की तरह मैं भी उत्साह और आनंद से उसे मनाउँगा । मगर हाय, मेरी किस्मत में एसा कहाँ ?

आज के दिन भगवान राम ने रावण का नाश किया था । मेरे जीवन में विरह रूपी रावण अब भी जीवित है, उसका नाश अभी होना बाकी है । आपके धर्मराज्य में एसे रावण का जीवित होना शोभा नहीं देता । आपने रणचंडी बनकर महिषासुर, चंड, मुंड, शुंभ, निशुंभ जैसे पराक्रमी असुरों का सफाया किया था । फिर ये विरह नामका असुर कैसे बच गया, और अब तक क्यूँ जीवित है, यह आश्चर्य की बात है । आपके लिये यह पडकार है । जिस दिन यह विरहासुर का नाश होगा, सिद्धिरूपी सीता मुक्त हो जायेगी । आपका जीवन असुरों का विनाश करने के लिये है । तो फिर आप ये विरहासुर को मारने में क्यूँ विलंब कर रहे हो ?

आज चारों और लोग खुशी मना रहे है । घर तथा दुकानों को सजाया गया है । लोग गंगास्नान कर रहे है, तथा मंदिरो में भक्तों का तांता लगा है । काश, मुझ गरीब की कुटिया में भी रोशनी हुई होती, उसमें फूलमालाएँ चढाई गयी होती, दीपक जलाये गये होते । मगर लगता है दिल्ली अभी दूर है । कितनी दूर, ये तो सिर्फ आप बता सकते हो । मगर मैं कहना चाहूँगा हूँ की अब बहुत हो गया । मैंने चूपचाप बहुत कुछ सह लिया और आपने भी चूपचाप बहुत देख लिया । मगर अब नहीं । अब तो मेरी चिन्ता, वेदना और तपश्चर्या का अन्त लाओ, जल्दी से जल्दी यहाँ आ जाओ ।

मैं जानता हूँ की आपके लिये एसा करना बाँये हाथ का खेल है । आप चाहे तो विजयादशमी को मेरे लिये विजय पर्व बना सकते है । रात का अंधेरा चला जाय और सूर्य की प्रथम किरण धरती पर पडें इससे पहले आप मेरे जीवन में पूर्णता का सूर्योदय करो । आजका पर्वदिन हमेशा हमेशा के लिये अमर कर दो । यही मेरी आपको बिनती है ।