ऋषिकेश में हमारा निवास सभी प्रकार से सुखमय रहा । भरत मंदिर का स्थान साधना के लिये सभी प्रकार से योग्य था । यहाँ नियमित रूप से 'गीतादर्शन' का लेखन होता रहा । साधना हमेशा की तरह होती रही । नवरात्री आते ही उसमें नया जोश आया । इस वर्ष नवरात्री का व्रत बारह दिन तक चला । तत्पश्चात कार्तिक मास की पूर्णिमा तक नियमित अंतराल पर उपवास होते रहे । ये मेरे जीवन का सुवर्ण समय था । एसा वक्त जीवन में बार-बार नहीं आता । दिवाली के बाद ठंडी में इजाफा हुआ फिर भी हवामान कुल मिलाकर अच्छा था ।
मेरे नवरात्री के उपवास समाप्त होने पर एक विद्वान संन्यासी मुझे मिलने माये । वो जानते थे की मैं केवल पानी लेकर अनशन कर रहा हूँ ।
उन्होंने मुझसे पूछा: क्या आपका व्रत समाप्त हो गया ?
मैंने कहा: हाँ ।
कुछ देर तक शांति छायी रही । फिर वो बोले: क्या आप हठयोग में विश्वास रखते है ?
मैंने कहा: हाँ, हठयोग मुझे प्रिय है और मैं मानता हूँ की तन-मन की तंदुरस्ती के लिये आसन, षट् क्रिया और प्राणायाम आवश्यक है । मैंने इसका अभ्यास किया है तथा आज भी शरीर को चुस्त और दुरस्त रखने के लिये मैं इसका अभ्यास करता हूँ ।
वो बोले: ये तो ठीक है । परमानंद की प्राप्ति के लिये विविध साधन है, मगर लोग पसंदगी में भूल कर देते है ।
फिर उन्होंने हठयोग के बारे में जो कुछ कहा, इससे मुझे लगा की इनको हठयोग क्या है इसके बारे में कुछ पता नहीं है । बहुत सारे विद्वान लोगों की यह दशा है । हठयोग का मतलब हठ या जोरजबरदस्ती करना नहीं है । एसा मानना अज्ञान के अलावा कुछ नहीं है । हठयोग का इससे दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है । दरअसल हठयोग शरीर, मन और प्राण के संयम का योग है । परम प्रकाश को पाने के लिये प्राण को इडा और पिंगला नाडी से सुषुम्णा तक ले जाने की साधना है । 'हठयोग प्रदीपिका' और 'घेरंड संहिता' जैसे हठयोग के ग्रंथो में ये बात कही गयी है । मगर बहुत सारे लोग हठयोग का सही मतलब नहीं जानते और एसी वैज्ञानिक पद्धति को तिरस्कार की नजर से देखते है । वे मानते है की हठयोग की साधना का मुख्य आधार हठ या जोरजबरदस्ती है । हाँ, साधना में संयम आवश्यक है मगर इसका अर्थ जोरजबरदस्ती हरगिज नहीं है ।
संन्यासी महाराज मुझे मिलने आये, उसके पीछे उनका क्या हेतु था, उनके मन में क्या चल रहा था, ये मुझे बाद में पता चला । उनका मानना था की मेरे अनशन के पीछे मेरी हठ कारणभूत है ! दुनिया में एसी भी लोग होते है जो अपने नजरिये से दुनिया को देखते है । उनके लिये जो अपने हिसाब से ठीक लगे वो सही और बाकी सब गलत । विद्वान या पंडीत कहे जानेवाले लोग भी इसका शिकार होते है, यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ ।
मैं उनको समजाना चाहता था मगर उन्हें जाने की जल्दी थी, इसलिये मौका नहीं मिला । सोचने पर लगा की हमारे शास्त्रों ने साधना को गुप्त रखने की जो सलाह दी है, गलत नहीं है । हरएक आदमी को ये बताने की जरूरत नहीं है की हम क्या रहें है । अगर आप बतायेंगे तो भी कितने लोग उसे समज पायेंगे ? हालाकि मैंने उनको अनशन की बात नहीं बतायी थी मगर भरत मंदिर के मेनेजर भट्टजी ने एसा किया था ।
अब जब हठ करने की बात निकली है तो उसके बारे में थोडा विचारविमर्श कर लेते है । कोई अपनी साधना के लिये व्रत या उपवास रक्खे, उसे हठ कहना क्या सही है ? मेरी समज के मुताबिक ये हठ नहीं मगर आग्रह है । साधना का एसा सत्याग्रह ध्रुव ने किया था, वाल्मिकी ने किया था, नरसिंह, तुकाराम, और पार्वती ने किया था । उनका सत्याग्रह केवल दिखावा नहीं था, प्रेम से भरा प्रयास था । भगवान के लिये उनके दिल में एसा प्यार था की उनका मन खाने-पीने की चिजों से उपर उठ गया था, उपराम हो गया था । उनके अनशन के मूल में इश्वर के प्रति तीव्र प्रेम था । हरएक व्यक्ति में इतना तीव्र इश्वरप्रेम नहीं होता । मगर इससे उसके प्रयासों को हठ कहकर उसकी मश्करी करना क्या ठीक है ? अगर आप मुझसे पूछे, तो उसके प्रयासों में इश्वर को पाने की इच्छा है, इसलिये एसे प्रयास आवकारदायक है, प्रसंशनीय है ।
कोई भाषा के अनुसार प्रांतरचना करने के लिये अनशन करता है, कोई गौहिंसा समाप्त करने के लिये अनशन करता है तो कोई हृदय की शुद्धि के लिये अनशन करता है । जैन धर्म में अनशन को धर्म का एक हिस्सा माना गया है । हम अपनी निजी जिन्दगी के बारे में बात करें तो कोई स्वजन की मौत होने पर, घर से कीमती सामान चोरी हो जाने पर, या धंधे में नुकसान होने पर लोग खानापीना छोड देते है, उन्हें नींद नहीं आती । कोई संबंधी या स्नेही लापता हो जाता है तो हम अखबार में इश्तहार देते है : तूम जहाँ भी हो, लौट आओ । तुम्हारे चले जाने के बाद तुम्हारे माता-पिताने खानापीना छोड दिया है । कोई ईश्वर के लिये एसा करता है ? अगर किसी के दिल में इश्वर के लिये एसा प्यार उमडे, और वो व्रत या अनशन करें तो इसमें क्या बूरा है ? इससे हमें क्यूँ आपत्ति होनी चाहिये ? उसे बिना पूछे हम क्यूँ सलाह दें ? फिर भी लोग न्यायाधीश होकर अभिप्राय दे ही देते है । आश्चर्य तो तब होता है, जब उन्हें उस विषय की पूरी जानकारी नहीं होती और वो औरों को अपनी सलाह देने निकल पडते है । हमारे शास्त्रोंने तप और व्रत करने की आज्ञा दी है, इसके पीछे शुभ आशय है । अगर आपको वो पसंद नहीं है तो कम-से-कम दूसरों को एसा करने से मत रोको ।

