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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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ऋषिकेश की दिव्य भूमि में इस बार देढ महिना रहना हुआ । इस दौरान अवनवीन साधनात्मक अनुभव मिले । पिछले पाँच साल से माँ की पूर्ण कृपा के लिये जो दिन मिलते थे, वो मिथ्या साबित होते थे । इसने भले मेरे जोश और जूनुन को ठंडा नहीं किया, मगर मुझे सोचने पर मजबूर किया की आखिर एसा होता क्यूँ है । ये बात अब मेरे लिये रहस्य बन चुकी थी । दिन का पूरा वक्त मै प्रार्थना, प्रतीक्षा और चिंता में व्यतीत करता था । मैं चाहता था की सिद्धि का दिन भले ही दूर हो, कोई सिद्ध महापुरुष जागृति में मुझे मिले और इसके बारे में स्पष्टता करें ।

मेरी प्रार्थना के प्रतिघोष में, नवरात्री से एक समर्थ सिद्धपुरुष के साथ मेरा संबंध स्थापित हुआ । ये एक एसा संबंध था जो चिरस्थायी रहनेवाला था । इनके साथ जुडने से मेरे साधनात्मक जीवन का एक अभिनव प्रकरण प्रारंभ हुआ । ये रिश्ता शिरडी के सुप्रसिद्ध संत श्री सांईबाबा से था ।

सांईबाबा को कौन नहीं जानता ? सन १९१८ के विजयादशमी के दिन सांईबाबा ने देहत्याग किया था । उनकी स्मृति में समाधि मंदिर की रचना की गयी है । आज लाखों श्रद्धालु उसका दर्शन करने शिरडी आते है । जब सांईबाबा हयात थे तब वो दर्शनार्थीओं को आशीर्वाद देकर उनके दुःख दूर करते थे । उन्होंने अभयवचन दिया था की मेरे मरणोपरांत मेरी समाधि भक्तों की मनोकामना पूरी करेगी । आज हजारों सांईभक्त इस बात का अनुभव कर रहे है । सांईबाबा एक समर्थ और मुक्त महापुरुष थे । भक्तों की रक्षा करना उनका व्रत था । वो आज भी लोगों को प्रेरणा देते है । सांईबाबा जैसे प्रातःस्मरणीय सिद्धपुरुष के लिये भारत गर्व कर सकता है । मेरे लिये ये परम सौभाग्य की बात है की उन्होंने मेरे साथ रिश्ता जोडा ।

अब तक जिन महापुरुषों से मेरा वास्ता रहा है, उनका जीक्र मैं अपनी जीवनयात्रा के पन्नों पर करता आया हूँ । एसा करने का मुख्य कारण साधक और जिज्ञासुओं को प्रेरणा तथा प्रोत्साहन देना है । एक प्रकार से यह उन महापुरुषों की प्रशस्ति भी है ।

सांईबाबा ने भक्तों को विविध अभयवचन दिये थे जैसे की 'मैं आपके पास हूँ, फिर आपको डरने की क्या जरूरत है ?’, ‘आप अपनी सारी चिंता मुझ पर छोड दो, मैं आपकी देखभाल करूँगा ।’ ‘अगर आप मेरी और देखोगे, तो मैं आपकी और देखूँगा ।’ ‘आप यकीन करों की मैं हमेशा आपके साथ हूँ ।'

उन्होंने ये भी कहा था, 'जो मेरे स्थान पर आयेगा, वो कदापि खाली हाथ नहीं जायेगा । जैसी आपकी श्रद्धा वैसा फल आपको मिलेगा ।'

उनके वचन साधारण वचन नहीं है । उनकी वाणी पयगंबर की वाणी है । भगवद् गीता में भगवान कृष्ण ने एसी ही अभय वाणी कही थी । श्री रामकृष्ण परमहंसदेव, चैतन्य महाप्रभु तथा इशु ने भी अपने जीवनकाल में अपने भक्तों को एसे वचन कहे थे । सांईबाबा अपने भक्तों का हित करने के लिये सदैव तत्पर रहते है । वो भक्तों के आध्यात्मिक एवं अन्य प्रश्न सुलझाने में मदद करते है । सांईबाबा की यह खासियत थी की वो सिद्ध होने के बावजूद आम आदमी की सहायता करते थे । इश्वर की पूर्ण कृपा पाने के बाद कोई व्यक्ति लोगों की किस तरह से सेवा कर सकता है, ये उनके जीवन से हम सिख सकते है । सांईबाबा की तरह कोई भी पूर्णताप्राप्त महापुरुष जनसाधारण के लिये विराट रूप से कार्य कर सकता है । सांईबाबा का जीवन मुझे इसलिये विशेष आकर्षक लगता है । एसे महापुरुषों की मौत नहीं होती, वो मृत्युंजय होते है, अमर होते है ।

सन १९१८ में जब उनकी मौत हुई तो विविध धर्म के लोगों ने उनका अंतिम संस्कार करना चाहा । किसको अनुमति दी जाय इसका हल ढूँढने एक कमिटी की रचना की गई । जब सबको समान हक दिया गया, तब जाकर उनकी अंतिम क्रिया हुई ।

आज विश्वभर में सांईबाबा के लाखों भक्त और प्रसंशक है । वे उन्हें इष्ट मानकर पूजते है । गुजरात, महाराष्ट्र तथा मद्रास में उनकी विशेष ख्याति है । यहाँ उनके कई मंदिर बनाये गये है । लोग गुरुवार के दिन उनकी पूजा करते है । पिछले कुछ वर्षो में भारत में हुए महान संतपुरुष की यादी में सांईबाबा का नाम अग्रीम है । उनसे भारत का आध्यात्मिक इतिहास अधिक गौरववान और उज्जवल हुआ है । मुझे कई दफा एसा हुआ की काश, मैं उनके दर्शन कर पाता । मगर ये परमात्मा की इच्छा पर निर्भर है । उनके साथ मेरा संबंध स्थापित होना मेरे लिये खुशी की बात है । सांईबाबा के चरणों में मेरा प्रेमभरा नमस्कार है । वंदे महापुरुष ते चरणारविंदम् ।

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