दस दिन की लंबी सफर तय करके हम बदरीनाथ पहूँचे । बदरीनाथ जाने के लिये पिपलकोटी तक बस चलती है । यहाँ से तकरीबन ३८ मील का रास्ता पैदल तय करना पडता है । मुझे शंका थी की क्या माताजी इतना चल पायेगी ? मगर इश्वर की कृपा तो देखो ! माताजी चली भी और वो भी पूरी चुस्ती और फूर्ति के साथ । इश्वर की कृपा से क्या नहीं होता ? वो सबकुछ करने के लिये समर्थ है ।
हनुमानचट्टी से पैदल चढाई करते हुए हम बदरीनाथ आये । दूर से बदरीनाथ का दर्शन करके मन में खुशी की लहर दौड गयी । बहुत सारे यात्री यहाँ ‘बदरीविशाल की जय’ के नारे लगा रहे थे । जिसका दर्शन करने के लिये लोग तरह-तरह के कष्ट उठाकर, अपने घर-गाँव से इतने दूर आये थे, उसे देखकर उन्हें प्रसन्नता क्यूँ नहीं होगी ? ३१ मई, १९५४ वैशाख वद चौदस और सोमवार के दिन हम बदरीनाथ पहूँचे । सांईबाबा तथा जगदंबा ने छ महिने पहले मुझे यहाँ आने की प्रेरणा की थी । इश्वरेच्छा से उसे पूर्ण होती देखकर मुझे आनंद हुआ । माँ अपनी मरजी से हमें चलाती है, जहाँ ले जाना हो, ले जाती है । हम तो सिर्फ उसके हाथ में हथियार है, निमित्त है । एसा यकीन होने पर चिंता नष्ट हो जाती है और मन पर कोई भार नहीं रहता । हालाकि एसी अनुभूति सबको नहीं होती । मगर जिसको होती है, मान लो उसका काम बन गया ।
चारों और पहाडों से घीरी बदरीनाथ की भूमि कितनी नयनाभिराम लगती है ! बदरीनाथ का प्राकृतिक सौंदर्य तो बेनमून है ही, उसकी आध्यात्मिक महिमा कम नहीं है । यह नर-नारायण की तपस्या भूमि रही है । सनक, सनंदन और सनत्कुमार के नाम तथा पांडवो के महाप्रस्थान की गाथा इसीसे जुडी है । महर्षि व्यास, देवर्षि नारद तथा शुकदेव जैसे सिद्ध महापुरुषों की यह भूमि है । महाभारत में भगवान कृष्णने उद्धव को यहाँ आने का आदेश दिया था । कहा जाता है की यहाँ यक्ष, किन्नर तथा गंधर्व निवास करते है । यहाँ आकर पुष्पदंत के शिवमहिम्नस्तोत्र तथा महाकवि कालिदास के मेघदूत का स्मरण होता है ।
प्रत्येक हिन्दु के मन में हिमालय का आकर्षण रहेता है । ऋषिमुनिओं की तपश्चर्या का इतिहास यहाँ लिखा गया है । आज भले यहाँ ऋषिमुनि नहीं रहें, इस भूमि का प्रभाव और आकर्षण अब भी बरकरार है और हमेशा रहेगा ।
बदरीनाथ आकर हमने गर्म पानी के कुण्ड में स्नान किया । ठहरने का इन्तजाम करने के लिये हम मंदिर के सेक्रेटरी को मिले । उन्होंने सिंहद्वार के उपरी हिस्से में हमारे रहने का इन्तजाम किया । वो चाहते तो कहीं और इन्तजाम कर सकते थे, मगर हम इस भूमि से अनजान थे, और शायद ये भगवान की मरजी थी । भगवान ने अपने महेमान समझकर हमें मंदिर में रहने का मौका दिया था, ये हमारे लिये खुशी की बात थी । रहने लिये हमें गिरिकंदरा जैसे दिखनेवाले तीन कमरें दिये गये । कमरे की खिडकी से तप्तकुंड, अलकनंदा का प्रवाह, बदरीनाथ के कुछ मकान तथा ब्रह्मकपाली का दर्शन होता था । यहाँ से मंदिर के दर्शन होते रहते थे ।
एक दिन दोपहर को जब हम मंदिर के प्रांगण में बैठे थे, तो एक लडका गलती से जूते पहनकर मंदिर में आ गया । मंदिर के कर्मचारी उसे गालियाँ देकर पीटने लगे । यह देखकर कुछ लोग आसपास जमा हो गये । लडका चूपचाप बाहर चला गया । बात साधारण थी मगर उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया । मान लो की जूते पहनकर अंदर आने से मंदिर की पवित्रता भंग होती है, और लडके ने तो जाने-अनजाने में गलती कर दी । मगर उसे गालीयाँ देकर पीटने में क्या मंदिर के कर्मचारीयों की गलती नहीं थी ? लडके ने जानबूझ कर तो एसा नहीं किया होगा । एसा बर्ताव क्या भगवान को पसंद होगा ? ये लोग शालीनता से व्यवहार करना कब सीखेंगे ?
बदरीनाथ मंदिर में मूर्ति की स्थापना श्री आद्य शंकराचार्य ने की थी । उनके साथ कुछ ब्राह्मण आये थे । उनके वारिस आज भी यहाँ पूजाविघि करते है । शाम को मंदिर में कथा होती है । सुबह और रात को कीर्तन होता है, खास करके रात का कीर्तन बहुत मनभावन होता है । दूरदराज के इलाकों से कई लोग यहाँ आते है । इनको सत्संग का लाभ मिले एसी व्यवस्था की गई थी । प्रत्येक मंदिर में एसी व्यवस्था होनी चाहिये ।

