Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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मुझे पक्का यकीन है की इस प्रकरण का शीर्षक पढकर आपको ताज्जुब्ब होगा । जो गांधीजी के नाम और काम से परिचित है, तथा उनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से जुडे है, वो इसे पढकर चौंक जायेंगे । इसे पढकर किसीको आश्चर्य होगा, किसीको कुतूहल होगा, तो किसीको ये पागल दिमाग की उपज लगेगा । जब कोई बात कल्पना के बाहर होती है, तो उसके प्रत्याघात एसे होना स्वाभाविक है । मगर जो सत्यप्रेमी, संशोधनशील और जिज्ञासु है, वो इसे पढकर खुश होंगे । वो जान पायेंगे की साधनापथ पर कैसे कैसे अनुभव मिलते है तथा एसे अनुभवों का क्या महत्व होता है । मैं भलीभाँति जानता हूँ की इस विषय पर चर्चा होगी, शक या सवाल किये जायेंगे । इसके बावजूद मैं अपना अनुभव पूरी प्रामाणिकता से लोगों के सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ । एसा करना मैं अपना कर्तव्य समजता हूँ । मुझे आशा है की पाठक इसे खुले मन से पढेंगे ।

कुछ लोग अपने मन के द्वार बन्द कर देते है, उसमें नये विचारों के लिये कोई जगह नहीं होती । वो अपने खयालों का प्यारपूर्वक जतन करते है और उसके विपरीत किसी विचार का स्वागत नहीं करते, उसके बारे में खुले दिल से नहीं सोचते । इसके फलस्वरूप वो जीवनभर मिथ्या खयालों की मायाजाल में फँसे रहते है और अच्छे विचारों से वंचित रह जाते है । जिन्हें सत्य जानने में दिलचस्पी है, जीवन के विकास में रस है, उन्हें एसी विचारधारा से दूर रहना होगा । सत्य तक पहूँचने के लिये उन्हें नये विचारों का स्वागत करना होगा, पूर्वग्रहों से झूझना होगा और अपने दिल के दरवाजों को खुला रखना होगा । किसी भी चिज का मोह अच्छा नहीं है – यह बात विचारों के लिये भी लागू होती है । समजदार आदमी नये विचारों का स्वागत करता है, उसे अपने जीवन में अपनाता है । अध्यात्म पथ के पथिको को ये बात समज लेनी चाहिये ।

गांधीजी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है । उनके जीवन और कार्यों पर कई ग्रंथ प्रसिद्ध हुए है । कुछ लोगों ने उनकी बुद्ध या जिसस क्राइस्ट से तुलना की है । वे एक महान संत, देशप्रेमी, कर्मयोगी और मानवतावादी महापुरुष थे, इसमें कोई शक नहीं है । एसे महापुरुष का पूर्वजन्म भी महान होगा, एसी धारणा हम कर सकते है । मुझे उनके पूर्वजन्म का ज्ञान सहज रूप से प्राप्त हुआ है । इसके लिये मैंने कोई विशेष प्रयास नहीं किये, कोई इच्छा व्यक्त नहीं की, विशेष प्रार्थना नहीं की या किसी अन्य साधना का आधार नहीं लिया । ना ही एसा संकल्प करके मैं ध्यान या समाधि में गया हूँ । इसका अनुभव मुझे केवल और केवल प्रभुकृपा से हुआ है । इसे मैं आप सब की जानकारी के लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

तारीख २६ अगस्त १९५७, सोमवार की रात, एक बजे मुझे यह अनुभव मिला । तब मैं ऋषिकेश में था । रात के वक्त ध्यान में जब मेरे चित्त का लय हो गया, तो मुझे एक अनोखा दर्शन हुआ । सरिता के तट पर छोटी-सी कुटिया थी । वहाँ एक आसन पर गांधीजी बैठे थे । उनके मुख पर गहरी शांति छायी थी । उस वक्त कोई कर्णप्रिय स्वर में गाने लगा ...
नरसैयो आ जन्म लईने मोहनदास थयो,
नरसैयो आ वेश लईने मोहनदास थयो ।

कुछ देर तक मैं इसे सुनता रहा । फिर किसीने मुझे कहा की महात्मा गांधी अपने पूर्वजन्म में नरसिंह महेता थे । नरसिंह महेता ही लोकहित को मध्येनजर रखकर गांधीजी के रुप में प्रकट हुए है । देहातीत दशा से जब मैं जाग्रत हुआ तो मन में कोई शंका नहीं रही । मन ने उसे सहज रूप से स्वीकार कर लिया ।

करीब बीस मिनट तक यह अनुभव रहा होगा । एसा अनुभव मिलने पर मुझे बेहद खुशी हुई । मेरी कोई विशेष इच्छा या प्रार्थना न होने के बावजूद ईश्वर ने मुझे एसा ज्ञान दिया, इसका मुझे आनन्द था । मेरे मानसपट पर हिमालय की उत्तुंग पर्वतमालाएँ, गंगाजी का तट और देहातीत दशा में देखी हुई कुटिया उभरने लगी । रात की नीरव शांति में भक्त कवि नरसिंह की सुप्रसिद्ध पंक्तियाँ मेरे स्मृतिपट पर गूँजने लगी -
हरिना जन तो मुक्त न माँगे, माँगे जनमोजनम अवतार रे ।
नित सेवा नित कीर्तन ओच्छव निरखवा नंदकुमार रे ।

शायद इन पंक्तियों में भक्तशिरोमणी नरसिंह महेता के पुनर्जन्म का रहस्य छीपा है । हरि के जन, यानी प्रभुभक्त मुक्ति की कामना नहीं करते, वे प्रभु की महिमा का जयगान करने के लिये, उसकी लीलाओं को देखने के लिये, अपनी स्वतंत्र इच्छा से बार-बार धरातल पर अवतीर्ण होते है । संत तुलसीदास ने एसे महापुरुषों के लिये कहा है की 'मुक्ति निरादर भक्ति लुभाने ।'

नरसिंह महेता जैसे प्रभुभक्त का पुनर्जन्म लोकहित के लिये ही हो सकता है । महात्मा गांधी के रूप में उनकी भव्य और विराट पुनरावृत्ति हुई थी, एसा खयाल सुसंगत लगता है । गांधीजी के पूर्वजन्म का ज्ञान मिलने पर मेरे मन में जो विचार उभरे, उसका उल्लेख करना मैं यहाँ उचित समजता हूँ ।

गांधीजी पूर्वजन्म में नरसिंह महेता थे, ये जानने के बाद नरसिंह महेता का सुप्रसिद्ध पद 'वैष्णवजन तो तेने रे कहिये' बार बार स्मृतिपट पर आने लगा । गांधीजी को यह भजन बहुत पसंद था । उन्होंने अपनी नित्य प्रार्थना और आश्रम भजनावलि में इसको स्थान दिया था । इतना ही नहीं, उन्होंने उसे अपने आचरण में अनुवादित करने का निरंतर प्रयास किया था । गांधीजी की बदौलत ही गुजराती भाषा में लिखा गया नरसिंह महेता का यह भजन विश्वप्रसिद्ध हुआ । इसे आप अकस्मात् या संयोग कह सकते है, मगर यह बात अवश्य गौर करने लायक है ।

नरसिंह महेता के प्रभातिया गुजराती साहित्य में अजोड है । जैसे कवि प्रेमानंद के लिये कहा गया है की - एमना पेंगडा मां पग घाले तेवो कवि पेदा नथी थयो – अर्थात् उनकी बरोबरी कर सके एसा कवि पैदा नहीं हुआ है, वैसा ही हम नरसिंह महेता के बारे में कह सकते है । कीर्तनभक्ति नरसिंह महेता को प्रिय थी । गांधीजी ने अपने जन्मगत संस्कारो को वक्त के अनुरूप ढांचे में ढाला था और इसकी अभिनव आवृत्ति प्रस्तुत की थी । गांधीजी की सुबह-शाम होनेवाली समूह प्रार्थना को हम संकीर्तन का संशोधित या संवर्धित रूप कह सकते है ।

साहित्यरसिक जनता को मालूम होगा की 'हरिजन' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नरसिंह महेता ने किया था । गांधीजीने अपने जमाने में हरिजनों की सेवा और अश्पृश्यता निवारण का महत्वपूर्ण काम किया था । नरसिंह महेता ने राजकारण में भाग नहीं लिया था । गांधीजी के लिये हालात कुछ एसे थे की उन्हें राजकारण में सक्रिय भाग लेना पडा । हालाकि राजकारण की गन्दकी के बीच वो निर्मोही बने रहे । नरसिंह महेता की धर्मपत्नी माणेकबाई के बारे में हम ज्यादा कुछ नहीं जानते, मगर कस्तूरबा ने गांधीजी को पूरी तरह से सहयोग दिया था ।

दोनों ने सौराष्ट्र को अपना जन्मस्थान बनाया था - नरसिंह महेता ने जूनागढ को और गांधीजी ने पोरबंदर को । नरसिंह महेता कृष्णभक्त थे, ज्ञानी थे, और गांधीजी कर्मयोगी । गांधीजी ने 'अखिल ब्रह्मांड मां एक तुं श्रीहरि' का रटण करते हुए अपने कर्मों से राम की उपासना की थी । नरसिंह को प्रभुदर्शन हुआ था, गांधीजी को शायद एसे दर्शन की जरुरत नहीं थी । भले उन्होंने भगवान के दर्शन नहीं किये, उनका मन हमेशा भगवान और भगवन्नाम में रहा ।

दोनों महापुरुषों के जीवन का साम्य बताकर मैं अपनी बात मनवाने की कोशीश नहीं कर रहा हूँ । ये तो सहज स्फुरणा होने पर पाठकों को बता रहा हूँ । मानव जब दूसरा जन्म धारण करता है तो उसका वर्तमान जीवन उसके पूर्वजन्म की हूबहू प्रतिकृतिरूप नहीं होता । इसमें विरोधाभास हो सकता है । एक व्यक्ति के दो जन्मों को जोडने के लिये उनकी समानता सिद्ध करना जरूरी नहीं है । वक्त के अनुरूप उनके बाह्य आचार तथा विचार भिन्न हो सकते है । हम तो केवल उनकी लाक्षणिकताओं को उजागर करने का प्रयास रहे है ।

मैंने शुरु में ही कहा की ये ज्ञान मुझे इश्वरकृपा से मिला है, इसके लिये मैंने कोई खास प्रयास नहीं किया । इतना ही नहीं, यह अनुभव मिलने के बाद मुझे अंतर्जगत में इस ज्ञान की पुष्टि करते हुए अन्य अनुभव भी मिले । इससे मुझे यह अनुभव और यह ज्ञान के बारे में कोई शंका नहीं रही । मैंने जो कुछ अनुभव किया उसे सत्य को साक्षी मानकर यहाँ अंकित किया है । लोग उसे माने एसा मेरा दुराग्रह नहीं है । मैंने इसे यहाँ इसलिये प्रस्तुत किया है ताकि लोगों को पता चले की आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में एसे अनुभव मिल सकते है ।

आज भी ये पंक्तियाँ मेरे कानों में गूँज रही है :
नरसैयो आ जन्म लईने मोहनदास थयो । (नरसिंह महेता ये वेश लेकर मोहनदास हुआ)

भक्त कवि नरसिंह महेता और महात्मा गांधी – दोनों महापुरुषों को प्रेमपूर्वक अंजलि देकर मैं यह प्रकरण समाप्त करता हूँ ।