Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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बारीश की मौसम में ऋषिकेश अधिक सुंदर लगने लगता है । पर्वत हरेभरे दिखते है, गंगा में पानी का स्तर बढ जाता है । इसे देखकर अंतर में जो आनंद उमडता है इसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है ।

इस बार ऋषिकेश कुछ बदला-बदला सा लगा । पाकिस्तान की रचना होने के बाद ऋषिकेश का तीव्र गति से विकास हो रहा है, सभी मुख्य मार्ग पक्के कर दिये गये है । पहले यहाँ दिनदहाडे हाथीओं के समूह दिख जाते थे, ट्रेन और मोटर मुश्किल से दिखते थे, मगर अब एसा नहीं रहा । फिर भी एकांतप्रिय साधक के लिये यहाँ सानुकूल वातावरण है । ऋषिकेश आने पर एक गहरी शांति का अनुभव होता है ।

देवप्रयाग के शांताश्रम में मैंने सात साल साधना की थी । अब उसका हाल कैसा है ये जानने की इच्छा होने पर हम देवप्रयाग गये । वहाँ जाकर देखा तो कुटिया का मकान जमीनदोस्त हो चुका था । हालाकि वो भूमि तथा उसके आसपास का प्रदेश अब भी वैसा था, शांता नदी का प्रवाह यथावत था । वहाँ कुछ देर बैठकर मैंने बीते हुए लम्हों को याद किया । इस परिवर्तनशील दुनिया में बडे-बडे साम्राज्य और शहर नेस्तनाबूद हो गये, तो एक छोटी-सी कुटिया का क्या हिसाब ? मगर उसने मेरे साधनात्मक जीवन में जो भूमिका अदा की थी उसे मैं कभी भूल नहीं सकता । उसकी स्मृति मेरे मानसपट पर हमेशा बनी रहेगी ।

देवप्रयाग में अलकनंदा और भागिरथी का संगम होता है । यहाँ हमारी भेंट रामदासजी से हुई । वो अब गंगातट पर जोगीवाडा के मशहुर स्थान में रहते थे । लंबे अंतराल के बाद उनको मिलकर हमें प्रसन्नता हुई ।
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नवरात्री का समय निकट आ रहा था । साधना का लक्ष्य अभी हासिल नहीं हुआ था । माँ की पूर्ण कृपा के लिये मैं अपनी पूरी ताकत लगाकर प्रयास कर रहा था । पूरे साल मैंने प्रामाणिकता और निष्ठा से प्रयास किया, इसका मुझे बेदह संतोष था । मेरा यह स्वभाव रहा है की जब तक निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो जाती, मुझे चैन नहीं मिलता । हर वर्ष की तरह इस साल भी मैंने नवरात्री में अनशन करने का सोचा था मगर माँ की मरजी कुछ और थी । जो चैतन्यमयी शक्ति मुझे प्रेरित कर रही थी, और जिसके दोरीसंचार से मेरा जीवन चल रहा था, उसकी आज्ञा के मुताबिक चलना मेरा जीवनक्रम हो गया था ।

साधना की एक फलश्रुति ये भी है की साधक इश्वर की इच्छा को पहचानने लगता है । जब वो इश्वर की इच्छा को जान लेता है, तो उसमें पूर्ण श्रद्धा रखके, उसके मुताबिक अपना जीवन निर्गमन करता है । एसा हर बार नहीं होता की जो वो चाहता है वो इश्वर भी चाहता है । कसौटी तब होती है जब साधक को जो पसंद हो उसे इश्वर नापसंद करता है, या इश्वर को जो पसंद हो, वो साधक की रुचि के प्रतिकूल होता है । इन दोनों हालात में उसे अपने मन को शांत और प्रसन्न रखना है । कुछ अनुभव मिलने के बाद साधक एसा आसानी से कर सकेगा । फिर विपरीत घटनाओं का आगाझ होने पर भी उसकी स्थिरता बनी रहेगी और वो विचलित नहीं होगा ।

३ सितम्बर १९५७ के मंगलवार को जब मैं ध्यान में बैठा था तो माँ ने कहा, 'इस बार नवरात्री में उपवास करने की जरूरत नहीं है । केवल आठम का उपवास करना ।'
१० सितम्बर, मंगलवार को सांईबाबा ने अनुभूति देकर इसकी पुष्टि की ।
मैंने पूछा, 'क्या मैं नवरात्री में अनशन करूँ ?'
सांईबाबा ने कहा, 'इसकी क्या जरूरत है ? आपको कहा गया है की इस बार अनशन नहीं करना है । आपका काम उसके बगैर ही हो जायेगा ।'

अब उपवास नहीं करने का फैंसला हो गया । जैसा की मैंने पहले भी कहा है की ये प्रेरणा और अनुभव मेरे मन की कल्पना नहीं है, मगर ध्यानावस्था या जाग्रत दशा में सांईबाबा जैसे समर्थ महापुरुषों से हुई बातें है । कभी ये अंतर के अंतरतम से तो कभी ये वाणी के स्वरूप में स्पष्ट रूप से सुनाई देती है । इसके बारे में मैं पहले कई दफा लिख चुका हूँ इसलिये अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है । हाँ, लोगों के लिये यह आश्चर्यजनक जरूर है क्योंकि एसे अनुभव बडे बडे साधक और पूजनीय कहे जानेवाले संतो को नहीं होते । मगर जो सत्य है उसे लोगों के आगे उपस्थित करना चाहिये । इसलिये मैं इसका उल्लेख कर रहा हूँ ।

मेरा विचार था की मैं अनशन करूँ मगर माँ की प्रेरणा इससे विपरीत थी । पिछले आठ-नौ साल से मैं नवरात्री में व्रत-उपवास रखता था । इस वर्ष माँ ने मना की तो उसकी सूचना को मंगल मानकर मुझे उसका अनुसरण करना था । वो जो भी आदेश देती है, उसमें मेरी भलाई होती है । मेरे अब तक के अनुभव इसका प्रमाण है ।