माँ की प्रेरणा मिलने पर हम आसो सुद पूनम के दिन ऋषिकेश से निकले और वद बीज के दिन बंबई आये । यहाँ वालकेश्वर के खीमजी जीवा सेनेटोरियम में तपास करने पर पता चला की कोई कमरा खाली नहीं है । कमरा मिलने में कुछ दिन लग जायेंगे एसा हमें कहा गया, इसलिये हम माधवबाग के एक मकान में ठहरे । लंबे अरसे के बाद हमने बंबई में दिवाली मनाई । दिवाली के बाद हम सेनेटोरियम में रहने गये और करीब देढ महिना रहें ।
ऋषिकेश में माताजी की तबियत थोडी बिगडी थी, वो बंबई आकर ज्यादा खराब हुई । बुखार के कारण माताजी पथारीवश हो गयी । करीब एक महिने तक दाक्तरों ने उसे खाना खाने से मना किया । बंबई छोडने तक माताजी की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ । सन १९४४ के बाद जीवन में पहली बार वो एसी भयंकर बिमारी का शिकार हुई । देह का कोई भरोसा नहीं है, वो काम करना कब बन्द कर दे यह कोई कह नहीं सकता । मौत जब भी आती है, अचानक आती है । इसलिये समजदार व्यक्ति को चाहिए की प्रमाद का परित्याग करके जीवन की प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करें और जीवन को समुज्जवल बनाने की कोशिश करें ।
बिमारी के कारण माताजी का शरीर दुर्बल हो गया । उसकी हालत में थोडा सुधार होने पर हमने प्रसिद्ध तीर्थस्थान आलंदी और देहु जाने की योजना बनायी । बंबई से करीब तीस भाईबहनों के साथ हम यात्रा के लिये निकले । रात्रीनिवास पूना में किया । पूना में रहने का अच्छा इन्तजाम था ।
पिछले कुछ सालों से हम शिरडी जाते थे, मगर इस साल आलंदी जाने की इच्छा हुई । आलंदी संत ज्ञानेश्वर का जन्म, लीला और समाधि स्थान है । महापुरुषों के स्मृतिस्थान प्रेरणा के स्त्रोत होते है, यहाँ जाने से व्यक्ति का मन नूतन और उदात्त होता है ।
आलंदी की ये मेरी तिसरी यात्रा थी । समाधि स्थान के प्रांगण में बैठकर हमने ज्ञानेश्वर महाराज के जीवनप्रसंगो को याद किया, कुछ तसवीरें खींची और शाम होने पर देहु के लिये निकल पडे ।
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देहु महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध संत तुकाराम का जन्मस्थान है । वैसे तो देहु छोटा-सा गाँव है मगर तुकाराम का नाम जुडने से ये जगप्रसिद्ध हुआ है । देहु में सबसे पहले हमने भंडारा पर्वत देखा, जहाँ बैठकर तुकाराम महाराज भजन, कीर्तन आदि करते थे । ये वो ही जगह थी जहाँ बैठकर उन्होंने भगवान विठ्ठल के दर्शन का प्रण लिया था और तेरह दिन के अनशन के बाद भगवान का साक्षात्कार किया था । आज भी भंडारा पर्वत तुकाराम महाराज की यशगाथा गाकर हमें संदेश दे रहा है की अगर आप में तुकाराम जैसी भावभक्ति है, अगर आपका मन परमात्मा का दर्शन करने के लिये लालायित है, अंतर बेचैन है, विरहातुर है, तो प्रभु अवश्य कृपा करेंगे, और आपको दर्शन देंगे । इसके लिये विशेष शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, और ना ही धन, संपत्ति, पद या प्रतिष्ठा की । इसके लिये जरूरी है सिर्फ और सिर्फ प्रेमपरिप्लावित प्राण से निकली हुई पुकार । तुकाराम का जीवन इसी महान सत्य का उदाहरण है ।
ईन्द्राणी नदी के कारण इस स्थान की शोभा देखते ही बनती है । सरीतातट पर एक मंदिर है, जहाँ तुकाराम संकीर्तन किया करते थे । यहाँ से थोडी दूरी पर तुकाराम महाराज का घर है । ये बिल्कुल जीर्ण दशा में है, किसी तूटी-फूटी झोंपडी जैसा लगता है ! महाराष्ट्र के जानेमाने सभी संतो का इतिहास एक जैसा है । वे साधारण गाँव में, गरीब मातापिता के घर पैदा हुए थे । उनके जीवनकाल में उनके गाँववालों और कुटुंबीजनों ने उनकी निंदा-टीका की, विरोध किया, उन्हें तरह-तरह के कष्ट दिये । मगर उनके चले जाने के बाद उन्होंने मंदिर बनवाये, मूर्तियाँ स्थापित की और उनकी पूजा करने लगे । अब वो उनके गुणगान गाते थकते नहीं है । व्यक्ति का शरीर शांत होने के बाद उनके गुण गाने के बजाय बहेतर है की जब वो जिवित है, तब उनकी योग्यता को पहचानें, उनकी पूजा करें, उनका लाभ लें । मगर आम तौर पर एसा कहाँ होता है ? जब महापुरुष हमारे बीच होते है, तो हम उनकी उपेक्षा करते है । तब हमें उनका सम्मान करने का नहीं सुझता । वरना महापुरुषों को अपने जीवनकाल में एसी कठिनाइयों से न गुजरना पडता ।
तुकाराम के जन्मस्थान पर आकर हमे खुशी हुई । साथ में ये भी लगा की इस स्थान का जीर्णोद्धार होना चाहिये । यहाँ उनका अच्छा-खासा स्मारक बनना चाहिये । तुकाराम के भक्त और प्रसंशको को इसके लिये प्रयास करने चाहिये । केवल ३६-३७ साल में तुकाराम ने जो पदों की रचना की थी, वो आज लाखों लोगों को प्रेरणा दे रहें है और भविष्य में देते रहेंगे । लोगों की धर्मभावना जागृत करने में, उनको नेकी और सदाचार के मार्ग पर ले जाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान है । साहित्य की दृष्टि से देखा जाय तो भारत के संतसाहित्य में तुकाराम की भक्तिवाणी नोंधपात्र है ।
यहाँ की ईन्द्रायणी नदी के बारे में एक विशेष बात जानने को मिली । लोगों के कहने के मुताबिक यहाँ ग्यारस के दिन मछलीयाँ अन्न ग्रहण नहीं करती, उपवास करती है । हमें नदी में बडी बडी मछलियाँ देखने को मिली ।
देहु एक साधारण और पीछडा हुआ गाँव है । कुछ लोग दलील करते है की गरीबी के कारण तथा लोगों की आलोचना सुन-सुनकर व्यक्ति का मन उपराम हो जाता है और वो प्रभुभक्ति करने लगता है । मगर वे ये भूल जाते है की भारत में एसे हजारों गाँव है और उसमें लाखों लोग जन्म लेते है । उन्हें आर्थिक तकलिफों से गुजरना पडता है, लोगों की गालीयाँ सुननी पडती है, विविध कष्ट झेलने पडते है, फिर भी उनका मन उपराम नहीं होता, वे प्रभुपरायण नहीं होते । दरअसल ये बात जन्मांतर संस्कार और ज्ञान की है । आदमी चाहे धनी हो या निर्धन, सुखी हो या दुःखी – किसी भी हाल में इश्वर के मार्ग पर चल सकता है । केवल दुःख और दारिद्रय को भक्ति का कारण बताना जायज नहीं है ।
देहु में एक और जगह देखने लायक है और वो है तुकाराम महाराज के स्वर्गगमन की जगह । कहा जाता है की तुकाराम महाराज यहाँ से सदेह प्रभु के धाम सीधाये थे । यहाँ पर एक पैड है, जहाँ देहत्याग के पहले तुकाराम ने जो अभंग लिखे थे, रक्खे गये है । प्रभु के गुणानुवाद करते हुए तुकाराम महाराज अंतर्धान हो गये थे, वो दृश्य कितना अलौकिक होगा ! सशरीर अंतर्धान होने की बात आश्चर्यजनक जरूर है मगर इसे निराधार या मिथ्या मानने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये । योगदर्शन के विभूतिपाद में योगी के अदृश्य होने की शक्ति का वर्णन किया गया है । प्रभुकृपा से किसी भी भक्त को एसी सिद्धि मिल सकती है ।
तुकाराम के स्वर्गगमन बाद किसी भक्त ने इसी स्थान में बैठकर चालीस दिनों का अनशन किया था और उसे तुकाराम महाराज का दर्शन मिला था । यहाँ उस भक्त की प्रतिमा रक्खी गयी है ।
देहु से हम पूना लौटे और दुसरे दिन वहाँ से बंबई आये ।

