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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921

इस वर्ष माँ और सांईबाबा – दोनों ने मसूरी जाने की प्रेरणा की थी । ये भी सूचित किया था की हमे वहाँ तीन महिना रहना है । हमने मसूरी आकर पिक्चर पेलेस के सामनेवाली नवभारत होटल में कमरा लिया । नवभारत होटल थोडी उँचाई पर है, खास बडी नहीं है । उसकी पहली मंझिल पर कुल मिलाकर चार कमरे है । बारीश की ऋतु में यहाँ बहुत कम प्रवासी आते है इसलिये ज्यादातर कमरे खाली थे । यहाँ हमें होटल नहीं, किन्तु कोई कोठी में रहने का अहेसास होता था । होटल की गैलरी से दूर-दूर तक दहेरादून की घाटीयाँ, पहाड और सर्पीले रास्तें दिखाई देते थे । कमरे की खिडकी से मसूरी के चौराहे का दर्शन होता था । यहाँ लोगों की भीड देखकर किसी मेले का स्मरण होता था । इस तरह हमें भीड और एकांत दोनों का आनंद मिलता था । होटल के पास तिलक मेमोरियल लायब्रेरी थी । मसूरी में तिलकजी को अर्जीत किया गया पुस्तकालय पाकर मुझे हर्ष हुआ । वैसे तो मसूरी में बहुत सारी होटलें है, मगर इश्वर ने हमारे लिये यह स्थान निश्चित किया था । सहुलियत की नजर से देखा जाय तो यहाँ सबकुछ अच्छा था । तकरीबन सात साल ऋषिकेश रहने के बाद मसूरी आकर हमें अच्छा लगा ।

मसूरी ‘पहाडों की रानी’ के नाम से सुप्रसिद्ध है, लोग इसके बारे में काफि कुछ जानते है । दहेरादून से मसूरी आने में करीब देढ घण्टा लगता है । दहेरादून से राजपुर तक सीधा रास्ता है, फिर पहाडीयाँ शुरु होती है । यहाँ के सर्पाकार राहों पर जब मोटर चलती है तो आसपास का नजारा देखनेलायक होता है ।

मसूरी में तीन बस अड्डे है - लायब्रेरी या गांधी चौक, किंकरेट और पिक्चर पेलेस । हमें कहाँ उतरना चाहिये ये पता नहीं था, इसलिये हम गांधी चौक उतर गये । यहाँ से हमें नवभारत होटल तक काफि चलना पडा । बाद में पता चला की दहेरादून से गांधी चौक और पीक्चर पेलेस की अलग बस चलती है । किंकरेट बहुत कम लोग जाते है, खास करके स्थानिक रहीश तथा मजदूर इसका इस्तमाल करते है । कुछ साल पहले यहाँ सभी बस रुकती थी, मगर मुसाफरों को चढाई करने में दिक्कत होती थी । पिक्चर पेलेस का मार्ग तैयार होने पर इन तकलिफों का अंत हुआ । आज जब हम किंकरेट से मजदूरों को मालसामान लेकर चढाई करते दैखते है, तो हमें उनके प्रति अनुकंपा होती है । मसूरी केवल श्रीमंत लोगों के रहने और एश-ओ-आराम करने की जगह नहीं है । यहाँ हाथरीक्षा चलानेवाले, भिखारी, अपंग, गरीब तथा मध्यम वर्ग के लोग भी रहते है । एक तरफ बडी-बडी कोठीओं में धनी लोग आराम से रहते है तो दूसरी और बारीश तथा ठंड में लोग सिकुडते है । एक तरफ दिन में तीन-चार बार खानेवाले श्रीमंत लोग है तो दूसरी और एक टंक खाना नसीब न हो एसे गरीब लोग भी है । मसूरी की चमकदमक के पीछे गरीबों के अर्धनग्न तन, भूख और लाचारी की दुनिया भी है । अमीरी और गरीबी के एसे विरोधाभासी दृश्य भारत में सभी जगह पर दिखाई देते है । हमें सर्वोदय या समाजवादी समाजरचना की स्थापना करनी होगी । यह काम मुश्किल जरूर है मगर नामुमकिन नहीं है । हम प्रार्थना करते है की एसा बहुत जल्दी हो और देश तथा दुनिया के सभी लोगों को आवश्यक चिजवस्तु आसानी से मिले ।

मसूरी समुद्र सतह से करीब ६०५० फिट उपर है, कहीं कहीं उँचाई ७००० फिट से ज्यादा है । बारिश के दिनों में यहाँ मौसम सुहाना होता है । धूँध के कारण कुछ ही मिनटो में मंझर बदल जाता है, सबकुछ हमारी नजरों के सामने ओझल हो जाता है । फिर अँधेरे की जगह उजाला और धूँधलेपन की जगह सूरज की किरनें दिखाई पडती है । कभी जोरों से बारीश होती है, तो कभी बादल बूँद बरसाये बिना चले जाते है । कुदरत का यह खेल देखने में बहुत मजा आता है ।

अन्य नगरों की तुलना में मसूरी साफसुथरा है । यहाँ के रास्ते पक्के और चौडे है । इस पर टहलने का अपना अलग मजा है । मुख्य मार्ग से जब भातभात के लोग रंगबेरंगी वस्त्र परिधान करके निकलते है तो कोई मेला जैसा लगता है । दिन के मुकाबले यहाँ रात को ठंड ज्यादा होती है । बारीश हो जाने पर अत्याधिक ठंड लगती है, उनी वस्त्र पहनने पडते है । ठंड के कारण लोगों को दस्त या शर्दी की बिमारी हो जाती है । शुरु में माताजी को भी दस्त हो गये थे और उनकी तबियत नरम हो गयी थी । फिर वैद्यनाथ फार्मसी की क्लोरोडीन दवाई लेने से उनके दस्त बंध हुए थे । तब-से माताजी उसकी एक शीशी हमेशा अपने साथ रखती थी ।

आजकल दवाई और दाक्तर की फिस इतनी महेंगी हो गयी है की आम आदमी का ध्यान रोगमुक्ति के बजाय इलाज पर होनेवाले खर्च पर रहता है । अगर हम आयुर्वेद को लोकप्रिय करना चाहते है तो हमें आयुर्वेदिक दवाईयाँ कम दामों में उपलब्ध करवानी होगी । सत्ताधीशों को पदप्रतिष्ठा, आंतरिक मतभेद और वैमनस्य को छोडकर लोगों की भलाई के लिये प्रयास करने होंगे ।
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सुबह में दाँत की सफाई के लिये दातून की जरूरत पडती है । हालाकि अब ज्यादातर लोग दातून की जगह टूथपेस्ट और टूथब्रश का इस्तमाल करने लगे है । मसूरी में हम तेजमल के दातून का प्रयोग करते थे । बबूल से इसका स्वाद बहुत अलग होता है । इससे मुँह अच्छी तरह से साफ होता है, और अलग प्रकार की खुश्बू आती है । तेजमल के पैड पहाडों में निश्चित उँचाई पर पाये जाते है । हमने दशरथाचल जाते वक्त तेजमल के वृक्ष देखे थे ।

मसूरी में ज्यादातर देवदार, चीड और चिनार के पैड पाये जाते है । यहाँ फूल के बगीचे नहीं है । हाँ, कुछ मकानों के आँगन में फूल दिखाई देते है । शहर में एक म्युनिसिपल गार्डन है, मगर वो इतना आकर्षक नहीं है । यहाँ के दुकान और मकान आधुनिक शैली के है । मसूरी में अंडे, माँस और दारू का प्रयोग ज्यादा होता है । लोग मानते है की एसा करने से ठंड से राहत मिलती है मगर ये सही नहीं है । यहाँ एसे कई लोग है जो इनका प्रयोग नहीं करते । इसलिये निरर्थक दलील करने के बजाय लोगों को आपना जीवन संयमी, व्यसनरहित, सात्विक और अहिंसक करने की आवश्यकता है ।

प्रत्येक प्रदेश और प्रजा के अपने विशेष त्यौहार होते है । जब की राष्ट्रीय त्यौहार सभी जगह समान रूप से मनाये जाते है । मसूरी में पंद्रह अगस्त का दिन जोशोंखरोश के साथ मनाया जाता है । सुबह में स्कूली बच्चों का सरघस निकलता है और शाम को म्युनिसिपालिटी के होल में रंगारंग कार्यक्रम होता है । हम कुतूहल-से उसे देखने गये थे । तब विभिन्न स्कूलों के बीच गीतों की हरिफाई चल रही थी । लोग भारी मात्रा में उपस्थित थे मगर बहुत कोलाहल था । मसूरी जैसे अग्रगण्य नगर के नागरिकों का एसा बर्ताव शोभास्पद नहीं लगा । पंद्रह अगस्त के दिन हमारा बर्ताव हमारी देशव्यापी सभ्यता का प्रतिबिंब होता है । हमारा देश भले आजाद हो गया मगर विनय, विवेक, प्रामाणिकता, देशप्रेम और शिष्टाचार के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ सिखना बाकी है । उत्सव के दिन हम सरघस निकाले, चरखा पर थोडा कांत ले, मकानों पर रोशनी करें, प्रार्थना का कार्यक्रम करें, चर्चा करें, ये तो ठीक है, मगर इसके अलावा हमें सेवामय, शिस्तबद्ध और आदर्श व्यवहार करना होगा । तभी देश आगे बढेगा, दुनिया में इसका नाम होगा ।

जनमाष्टमी और नानक जयंती पर मसूरी में उत्सव का माहौल होता है । नगर के मुख्य मार्गों पर जूलूस निकाले जाते है । इसमें अंगकसरत और जादू के प्रयोग होते है, तलवार और छरा के दाव होते है । नगर की विभिन्न संस्था उसमें भाग लेती है ।

नवरात्री के दिनों में मसूरी में (Autumn Festival) ‘ओटम फेस्टीवल’ होता है । आसपास के पहाडी इलाकों से भारी मात्रा में लोग अपनी परंपरागत वेशभूषा में सज्ज होकर यहाँ आते है । उन दिनों में रामलीला का कार्यक्रम होता है । भारी ठंड के बावजूद लोग उसे देखने के लिये इकट्ठा होते है । श्राद्ध पक्ष का प्रारंभ होते ही मसूरी में ठंड की मात्रा बढ जाती है । शाम को छे बजे अंधेरा हो जाता है ।

ओटम फेस्टीवल का उदघाटन सन १९५८ में भारत के गृहमंत्री गोविंदवल्लभ पंत के हाथों हुआ था । उस वक्त हम वहाँ मौजूद थे । उनको देखकर लगा की वो शारिरीक रूप से कमजोर हो गये है । बोलते वक्त उनकी आवाज कांपती थी फिर भी वो देशसेवा के कार्य में लगे थे । एसे पीढ और अनुभवी नेताओं की निगरानी में हमें युवा नेताओं को तैयार करने चाहिये ।

हमने सुना की गांधीजी के अलावा श्री वल्लभभाई पटेल जब मसूरी आते थे तो बिरला हाउस में रहते थे, तो हम कुतूहल-से एक दिन उसे देखने गये । गांधी चौक से काफि चलने पर चार्लीवेली होटल आती है । वहाँ से कच्चे रास्ते पर चलने के बाद बिरला हाउस के दर्शन होते है । बिरला हाउस का मकान भव्य लगा मगर आसपास का माहौल उतना आकर्षक नहीं लगा ।

जब हम मसूरी थे तब मद्रास से लाभुबेन जगन्नाथपुरी, काशी आदि तीर्थस्थानों की यात्रा करके हमारे पास आये । वो उनके भाई के साथ करीब बाहर दिन हमारे साथ रहे । हर साल वो हमें मद्रास आने के लिये चिठ्ठी लिखकर आग्रह करते थे मगर इश्वर की इच्छा न होने से हम वहाँ जा नहीं पाये थे । इसबार दोनों ने व्यक्तिगत रूप से हमें मद्रास आने के लिये आग्रह किया । माँ की प्रेरणा और अनुमति मिलने पर हमने दिवाली के बाद मद्रास आने का वादा किया ।

मसूरी में लाल टिब्बा, गन हिल, केम्पटी फोल, भट्टा फोल, म्युनिसिपल गार्डन इत्यादि देखनेलायक जगह है । यहाँ आर्यसमाज तथा सनातन धर्म के मंदिर भी है । सनातन धर्मशाला की बगल में गुरुद्वारा है । इसके अलावा यहाँ बहुत सारे गिरजाघर है । हर इतवार को लोग बडी तादात में चर्च जाते है । पंजाबी, शीख तथा अन्य युवकों को चर्च में जाते हुए देखकर मुझे लगा की सनातन धर्म में एसा क्या नहीं है जो इनको गिरजाघर जाने की जरूरत पडी ! हालाकि जिस ढंग से वो चर्च में इकट्ठा होते थे, वो प्रसंशनीय था । आजकल हमारे धर्मस्थानों में कितने युवक आते है ? पढेलिखे और आर्थिक रूप से संपन्न लोग धर्म से विमुख हो रहे है । धर्म को जीवन का अंग माननेवाले, धर्मस्थानों तथा धर्मपुरुषों के प्रति आदरभाव रखनेवाले तथा जीवन को धर्ममय करने के लिये पुरुषार्थ करनेवाले लोगों की संख्या कम हो रही है । अगर धर्म हमारे जीवन से पलायन हो जायेगा तो आदमी आदमी नहीं रहेगा, पशु हो जायेगा ।

मसूरी की हेकमेन होटल के पास नियमित रूप से चित्रों का प्रदर्शन होता है । हमें लगा की ये साधारण चित्र होंगे मगर ध्यान से देखा तो पता चला की यहाँ गांधीजी, नहेरु, सरदार, टागोर इत्यादि देशनेताओं के तथा बुद्ध के गृहत्याग आदि प्रेरणादायी चित्र लगे थे । उसे देखकर लगा की ये कोई साधारण चित्रकार नहीं है मगर रंगो का जादूगर है । एसे कलाकार का योग्य सम्मान हो ये इच्छनीय है । इससे देश का हित होगा । हमारे देश में एसे कितने कलाकार है, ये किसको पता ? बहुत सारे कलाकारों की कला योग्य प्रोत्साहन न मिलने पर अर्धविकसित या अविकसित रह जाती है ।

हमारा तीन महिने का मसूरी निवास सभी प्रकार से सुविधाजनक और आनंददायी रहा । माँ और सांईबाबा ने जो स्थान हमारे लिये निश्चित किया था, वो हमें बहुत पसंद आया । अब माँ की प्रेरणा के मुताबिक हमें पाँचम के दिन मसूरी से निकलकर ऋषिकेश जाना था ।

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