हरिद्वार में

बडौदा से दिल्ली और वहाँ से हरिद्वार जाने के लिए मैंने ट्रेन ली । इतनी लंबी मुसाफरी करने का मेरे लिए यह प्रहला प्रसंग था मगर दिल में जोश था इसलिए मुझे कोई थकान महसूस नहीं हुई । लंबे अरसे से जिस क्षण का मुझे इंतजार था, जिस पल की सुनहरी कल्पना में मैंने दिनरात बिताये थे, मेरा वो स्वप्न सार्थक हो रहा था । जैसे जैसे ट्रेन हिमालय के करीब पहूँचने लगी, मेरा मन बेताब होने लगा । मेरे मन में हिमालय का मनभावन रेखाचित्र बना हुआ था । मैं सोचता था कि गंगा के तट पर लगी छोटी-बडी पर्णकुटिरो में साधु-महात्माओं के निवास होंगे । परमात्मा के चिंतन-मनन में उनका सारा वक्त गुजरता होगा । उनके मुख तेजस्वी और परम शांति से भरे होगें । हिमालय कितना भव्य और मंगलमय होगा । उसकी बर्फिली चोटियाँ मेरे आगमन की प्रतिक्षा में उन्नत खडी होगी । हिमालय के प्रथम दर्शन से मैं परम शांति का अनुभव करूँगा वगैरह । मैं अपने खयालों में गुम था और गाडी अपनी रफ्तार से आगे बढ रही थी ।

सपनों का दोर ज्यादा देर तक नहीं चला । जैसे ही हमारी ट्रेन सहारनपुर के पास एक छोटे से स्टेशन से छुटकर वन में निकल पडी की दो संन्यासी भागते हुए आए । उन्होंने जबरदस्ती से डिब्बे का दरवाजा खुलवाया और अंदर घुस आए । डिब्बा खचाखच भरा हुआ था, बहुत सारे लोग खडे-खडे मुसाफरी कर रहे थे । फिर भी, भीड में अपना मार्ग करते हुए दोनों साधु आगे बढे और मेरे सामने की खिडकीवाली जगह बैठने के लिए खाली करवाई । हैरानी तो इस बात की थी की जगह खाली करवाने के लिए उन्होंने सेवाधर्म का महिमा बताया । सांसारिक जीवन का त्याग करनेवाले साधुओं को साधारण लोगों से बलपूर्वक बैठने की जगह छिनते हुए देखकर मुझे अजीब लगा । उनके बदन हठ्ठे-कठ्ठे थे, शरीर हृष्ट-पुष्ट था, उमर अच्छी-खासी थी । मेरे सामने की खिडकी पर कब्जा जमाने के बाद उन्होंने ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’ की फिलोसोफी झाडनी शुरू की । उनके एसे बर्ताव से मुझे धक्का लगा, आश्चर्य और दुःख हुआ । हिमालय की पुण्यभूमि में प्रवेश के पूर्व ये दो अलमस्त साधुओं के ट्रेन-प्रवेश ने मेरे दिमाग में कई प्रश्न खडे किये । मैं सोचने लगा कि क्या हिमालय के पुण्यप्रदेश में एसे संन्यासी-महात्मा रहते होंगे ? संन्यासी या विरक्त महात्मा पुरुष तो शांति की मूर्ति होते है, दैवी संपत्ति से भरे, प्राणी मात्र में ईश्वर का दर्शन करनेवाले, सब से प्यारभरा व्यवहार करनेवाले, निःस्वार्थ सेवा में अपना जीवन व्यतीत करनेवाले होते है, उनके वचनों में प्यार, माधुर्य और सत्य टपकता है, वे ईश्वर के प्रतिनिधि होते है - मेरे कल्पनाचित्र को ये दो संन्यासीओं ने बदल गया । मुझे लगा कि सभी संन्यासी उच्च भूमिका पर स्थित हो यह आवश्यक नहीं ।

सोचते सोचते ट्रेन कब हरिद्वार के पास आ पहूँची उसका पता नहीं चला । वे दो संन्यासी-साधु भी हरिद्वार जा रहे थे । हवा शीतल होने लगी । लगता था कि गंगाजी के निर्मल और शीतल प्रवाह में स्नान करके वायु शीतल हो गया है । ठंडी हवा लगने से रोमांच का अनुभव हुआ । तापमान में बदलाव से पता चला कि मेदानी प्रदेश पीछे छूट गया है और हिमालय में प्रवेश हो चूका है ।

हरिद्वार हिमालय का प्रवेशद्वार है, हिमालय वहाँ से शुरू होता है । पहाडों को पीछे छोडकर गंगा का प्रवाह हरिद्वार से समतल भूमि पर प्रवाहित होता है और फैल जाता है । जिस किसीने पहाडों को चिरकर निकलनेवाली, जोश और जस्बे के साथ बहनेवाली गंगा का दर्शन किया है, उन्हें अवश्य लगेगा कि मैदानी ईलाकों में आते ही उसका प्रवाह, शायद लज्जावश, धीरगंभीर और शांत हो जाता है । शायद उसे अपने मायके (हिमालय) को छोडकर ससुराल (सागर) जाने का खयाल व्यथीत कर रहै है, शायद हिमालय के सिद्ध संतपुरुषों की स्मृति उसे विवश कर रही है, या शायद वो सोच रही है कि आगे बढना चाहिए या नही, और फिर अपने गंतव्यस्थान की याद आने पर बहने लगती है । हरिद्वार की गंगा को देखकर लगता है उसका मन पीछे हिमालय में छूट गया है और तन यहाँ खींच आया है ।

हरिद्वार अति पुरातन नगर है । उससे कुछ दूरी पर कनखल है जहाँ दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया था । हरिद्वार में सप्त सरोवर नामक स्थान है, जो अति सुंदर है । कहते है कि वहाँ सात ऋषि निवास करते थे । किसी एक ऋषि के आश्रम से निकलने से अन्य ऋषियों को बुरा लगे इसलिए गंगा की धारा सात प्रवाह में विभाजीत होकर वहाँ से बहने लगी । तब से वो जगह सप्त सरोवर के नाम से विख्यात हुई ।

गंगा का नीर निर्मल और पवित्र है तथा किसी तपस्वी के हृदय की तरह शुद्ध है । गंगाजी के दर्शन से मुझे अत्यंत हर्ष हुआ । घाट पर बडा टावर है, जिससे इसकी शोभा देखते ही बनती है । मैं वहाँ जाकर खडा रहा, गंगा के शांत और विशाल प्रवाह का अवलोकन किया । ऋषिमुनियों की स्मृतियों ने मुझे घेर लिया । महापुरुषों के चरणरज से धूली हुई धरा पर मुझे लाने के लिए मैंने ईश्वर का आभार माना । सूर्योदय का वक्त था । सूरज की सोनेरी किरणें गंगा के प्रवाह पर नर्तन करने लगी । वो दृश्य अलौकिक था । मुझे लगा कि स्नान कर लेना चाहिए । कटिवस्त्र पहनकर मैं गंगाजी में स्नान करने के लिए उतरा । मन भावविभोर हो गया । मुझे लगा कि मेरा जीवन धन्य हो गया । मेरा तन, मन, अंतर कृतार्थ हुआ । मानो मेरा नया जन्म हुआ, सब बंधन तूट गये । मैं मुक्ति का अनुभव करने लगा । मेरे अंतर में उत्साह की आँधी उमड पडी । मेरे रोमरोम में रस के फव्वारे छूटने लगे ।

आँखे बन्द करके मैंने सूर्यदेव का ध्यान किया । काफि देर तक घाट के किनारे बैठा रहा । लोगों की भीड बढने लगी थी । देश के कोने-कोने से आये हुए लोगों से घाट भर गया, मानो कोई मेला न लगा हो ! कुछ देर वहाँ रुकने के बाद मैं स्टेशन की ओर चल पडा । हरिद्वार की शोभा से मेरा मन लालायित हुआ, उसकी छबी मैरे मन में बस गई । फिर भी मुझे ओर आगे जाना था । मेरी यात्रा का गंतव्यस्थान ऋषिकेश था, नहीं की हरिद्वार और मुझे उसका अच्छी तरह से स्मरण था । मैं परमार्थ मार्ग का प्रवासी था, रुकना मेरे स्वभाव में नहीं था । अगर हरिद्वार इतना सुंदर है तो ऋषिकेश कितना भव्य होगा – यह खयाल मेरे मन में बार-बार आने लगा । किसी विशेष प्रयोजन के बगैर हरिद्वार में ज्यादा वक्त रुकना मुझे ठीक नहीं लगा । ऋषिकेश की ट्रेन पकडने के लिए मैं हरिद्वार स्टेशन पर जा पहूँचा ।

परमार्थ पंथ के प्रवासी को ये याद रखना चाहिए की उसका गंतव्य स्थान क्या है । यात्रा के दौरान उसे तरह-तरह के स्थानों से गुजरना होगा, मोहित करनेवाले लोगों से मिलना होगा, लुभानेवाले, प्रलोभनकारी और मार्गच्युत करनेवाले आकर्षणों से गुजरना होगा । उसे कहीं पर भी रुकना नहीं, चलते ही रहना होगा । हाँ, अगर विश्राम की जरूरत हो तो वो कहीं कुछ पल ठहर जाय, कोई स्नेही का स्नेह पा ले, आकर्षणों का थोडा अनुभव कर ले, ठीक है । मगर उसे किसी पदार्थ, स्थान या व्यक्ति में आसक्ति न करके अपने ध्येय का निरंतर स्मरण करना होगा । उसे ध्येय-प्राप्ति न होने तक कहीं पर रुकना नहीं, चलते रहेना होगा । जिसका मनोबल फौलादी नहीं, जिसकी बुद्धि चंचल तथा ध्येयनिष्ठा संदिग्ध है, वो बिच रास्ते में ही रुक जायेगा और ईश्वर को छोडकर साधारण चिजों में फँस जायेगा । वो आत्मोन्नति साधना में कतई सफल नहीं होगा और उसका प्रकाश-पथ का प्रवास अधूरा रह जायेगा ।

 

Today's Quote

There are no accidents, there is only some purpose that we haven't yet understood.
- Deepak Chopra

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