ऋषिकेश में आगमन

हरिद्वार स्टेशन पर ज्यादा इंतजार नहीं करना पडा क्यूँकि मेरे स्टेशन पहूँचने के कुछ ही देर में ऋषिकेश की गाडी आ पहूँची । हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच एक घंटे का फासला है । ट्रेन वन में से गुजरती है तब आसपास का दृश्य बडा मनभावन लगता है । पहाड, जंगल और बहेते हुए पानी के अलावा और कुछ नजर नहीं आता । जिन्हें हिमालय के कुदरती सौंदर्य के दर्शन की ईच्छा है उन्हें यहाँ आकर अवश्य संतोष होगा ।

गाडी ऋषिकेश स्टेशन पर आ पहूँची । स्टेशन छोटा-सा था । ट्रेन का ये आखिरी मुकाम था, क्योंकि गाडी यहाँ से आगे नहीं जाती । चारों ओर बडे-बडे पहाड यात्रीओं के स्वागत लिए तैयार खडे थे । आसपास का दृश्य बडा मनभावन था । अंग्रेजी कवि वर्डज्वर्थ का दिल ज्यूँ मेधधनुष को देखकर ठहाका मारने लगता, वैसे ही यहाँ का नजारा सौंदर्यरसिक आदमी के दिल को लुभा लेता है ।

हरिद्वार और ऋषिकेश में कितना फर्क है ! मानो एक मथुरा और दुसरा वृंदावन, एक बेट और दूसरा द्वारिका । ऋषिकेश गाँव जैसा और हरिद्वार शहर जैसा । ऋषिमुनियों की प्राचीन भूमि – ऋषिकेश को मैने मन-ही-मन प्रणाम किया । कितने युगों से इस धरती ने तपस्वी, राजर्षि, योगी और महर्षिओं को आश्रय दिया होगा; कितने अनगिनत साधकों और आत्मिक उन्नति की कामनावाले मनुष्यों को उसने शांति का मार्ग दिखाया होगा; व्यास, वाल्मिकी, शुकदेव, दत्तात्रेय, भगीरथ से लेकर शंकराचार्य जैसे कई महापुरुषों की पावन पदरज से ये धरा पवित्र हुई होगी; कितने लोगों को इस भूमि ने अपने ओर आकर्षित किया होगा ? जैसे माँ की गोद में जिस तरह बच्चा दौडकर आता है, उसी तरह सदीयों से कितने देशी-विदेशी यात्रीओं ने यहाँ आकर शांति पायी होगी ? केवल हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में उसकी महिमा प्रसिद्ध है । गंगा और हिमालय के साथ भारत की संस्कृति और इतिहास जुडा है । एसी महिमावान भूमि पर पैर रखते ही महान ऋषिवरों की परंपरा को याद करते हुए मेरा हृदय भर आया । इस भूमि के दर्शन करने के लिए मैंने कितने सपनें देखे थे, दिल में क्या क्या सोच रखा था ? आज ईश्वर की परमकृपा से मेरा स्वप्न साकार हुआ । मेरा अंतर आनंद से नाच उठा । जीवन के मंगल महोत्सव में मैं शामिल हो गया था । समर्थ संतपुरुषों की परंपरा को आगे बढाने के लिए मैं उत्सुक था । मेरा हृदय महत्वकांक्षी था, भावनाओं से छलक रहा था । 

स्टेशन से आश्रम काफि दूरी पर था मगर मेरा अंतर उत्साह से भरा था इसलिए भूख, तरस और विश्राम की परवाह किये बिना मैं चलता रहा । रास्ते में कई साधुसंतो के आश्रम देखे, कुछ साधुपुरुष के दर्शन भी हुए । ऋषिकेश के प्रथम दर्शन से मन में छाप उठी की यह सचमुच साधुसंतो का गाँव है । गंगा के किनारे पर लगी पगदंडी से गुजरते हुए मैं आगे बढा और अंत में शिवानंद आश्रम आ पहूँचा ।

आश्रम का स्थान भीडभाड से दूर एकांत में था । गंगा का प्रवाह उसे छूकर निकलता था इसलिए आश्रम का सौंदर्य देखते ही बनता था । किसीको पहली नजर में प्यार हो जाये एसी मनभावन जगह थी । उन दिनों में आश्रम इतना फैला हुआ नहीं था, तकरीबन चार-पाँच मकान थे । आश्रम को देखकर मुझे प्रसन्नता हुई । मैं ओफिस में गया और अपना परिचय दिया । स्वामी शिवानंदजी के दर्शन के लिए मेरा मन उत्सुक था मगर मुझे कुछ देर तक इंतजार करना पडा । उनके दर्शन का वक्त पाँच बजे के बाद शुरू होता था । आश्रम के अन्य संतपुरुषों से वार्तालाप करने में मेरा वक्त बीत गया ।

 

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- Anonymous

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