गुजराती की यात्रा विविध कारणों से यादगार रही । उनमें से एक था, ज्ञानेश्वर महाराज के लीलास्थान आलंदी की यात्रा । यात्रा में मेरे साथ बंबई के पाँच और पूना के दो भक्तजन जुडे थे, इसलिये विशेष आनंद हुआ ।
सन १९४४ में उत्तरकाशी में मुझे पहली बार ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन हुए थे । इसका जीक्र मैंने पूर्व प्रकरणों में किया है । तब-से लेकर मेरा आलंदी जाने का मन था । अब बंबई आया तो आलंदी गये बिना कैसे रह सकता था ।
आलंदी ज्ञानेश्वर महाराजी की समाधि के कारण सुविख्यात है । यहाँ का मंदिर स्वच्छ एवं सुंदर है । मंदिर के पीछे नदी का प्रवाह है । आलंदी पूना से तकरीबन बीस मील की दूरी पर है, इसलिये काफि लोग यहाँ आते है ।
आलंदी आकर हम समाधि मंदिर गये । जैसे ही गर्भद्वार में गये, समाधिस्थान से पूजारी ने फूलों का हार लेकर मेरे गले में डाल दिया । मुझे लगा की पूजारी को प्रेरणा देकर ज्ञानेश्वर महाराज ने मेरा स्वागत किया है । इससे मुझे बहुत खुशी हुई ।
समाधिस्थान का दर्शन करने के बाद हमने मंदिर की चारों ओर प्रदक्षिणा की । मंदिर में जो कुछ देखनेलायक था वो देख लिया मगर मुझे किसी ओर स्थान की तलाश थी । वही स्थान जो सन १९४४ में मैंने समाधि अवस्था में देखा था । उसमें ज्ञानेश्वर महाराज कोई पेड के नीचे बैठे थे । मेरा मानना था की एसा कोई स्थान यहाँ जरूर होगा मगर अबतक एसा कुछ दिखाई नहीं पडा । इसलिये मैं थोडा निराश हो गया ।
मंदिर से बाहर निकलते वक्त द्वार पर एक अपरिचित व्यक्तिने आकर मुझे सीधा प्रश्न किया: 'क्या आपने सबकुछ देख लिया ?'
मैंने कहा: 'हाँ, वैसे तो सबकुछ देख लिया मगर जी नहीं भरा । लगता है की कुछ छूट गया है ।'
उसने कहा: 'आपने शायद ये नहीं देखा होगा । मेरे साथ चलो, मैं आपको दिखाता हूँ ।'
हम उसके पीछे-पीछे चले । मंदिर के पीछले हिस्से में कुछ सीडीयाँ थी । उसे चढने के बाद उसने कहा: 'क्या आपने ये जगह देखी ? नहीं न ? बहुत सारे लोग आपकी तरह आलंदी आते है पर इसे नहीं देखते । आप आराम से देखो । मुझे काम है, मैं चला ।'
उसे देखकर मेरे आश्चर्य और आनन्द की सीमा न रही । उत्तरकाशी में मैंने जो स्थान देखा था, यह वही स्थान था ! फर्क सिर्फ इतना था की मेरी अनुभूति में पैड के नीचे ज्ञानेश्वर महाराज बैठे थे, और यहाँ वो नहीं थे । मैं सोचने लगा की हमें ये जगह दिखानेवाला आदमी कौन हो सकता है ? क्या वो खुद ज्ञानेश्वर महाराज थे ? या फिर उनका कोई भक्त या पार्षद ? इसका उत्तर तो भगवान जाने मगर इस स्थान को देखकर मैं भावविभोर हो गया । मैंने उसी चौराहें पर पद्मासन लगाया और ज्ञानेश्वर महाराज को पुकारा । हमारे साथ जो आये थे वो भी बैठकर सुमिरन करने लगे । उन्होंने मेरी कुछ तसवीरें खींची मगर एक भी ठीक नहीं आयी । शायद ज्ञानेश्वर महाराज की यही इच्छा थी । हाँ, मेरे हृदय में इस स्थान की जो तसवीर बनी, वो अब भी वैसी है । उसे कोई नहीं मिटा पायेगा ।
जगह प्राचीन होने के बावजूद आकर्षक थी । अगर यहाँ पर ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन हो जाते हैं, तो सोने पे सुहागा होगा । मैंने बिनती करते हुए कहा, हे ज्ञानेश्वर महाराज ! आप मंदिर से उठकर मेरे पास आओ । आप तो देश और काल से पर हो । आपके दर्शन किये बिना मेरा यहाँ से खाली हाथ जाना ठीक नहीं है । कृपया मेरी पुकार सुनो, मुझे दर्शन दो ।
उनकी कृपा के बगैर कोन उन्हें देख सकता है ? और अगर देख भी ले तो कौन उन्हें पहेचान सकता है ? चित्रकूट के घाट पर संतो की भीड जमा हुई थी तब राजकुमार के वेश में राम और लक्ष्मण तुलसीदास के पास आये थे । मगर वो उन्हें कहाँ पहेचान पाये थे ? ईश्वर की लीला न्यारी है । तभी तो तुलसीदास ने गाया की -
सोहि जाने जेहु देहि जनाई । अर्थात् वो ही उन्हें जान सकता है जिसको वो अपनी मर्जी से बताना चाहे ।

