ऋषिकेश में भरत मंदिर का स्थान शांत, एकांत और सर्वप्रकार से सुखप्रद था । मेरा विचार था की दिवाली तक यहाँ रहूँ । ये हिमालय की भूमि का प्रभाव है की एक बार आने के बाद यहाँ-से जाने का मन नहीं होता । मगर प्रभु की प्रेरणा से मुझे नवरात्री के पहले ऋषिकेश छोडना पडा । ऋषिकेश की सुंदरता महुवा में कहाँ मिलेगी ? फिर भी इश्वरेच्छा को शिरोधार्य मानकर मैं महुवा गया ।
महुवा आकर मैंने केवल पानी लेकर अनशन-व्रत का आरंभ किया । इसके लिये माँ की प्रेरणा मिल चुकी थी । ज्यादा तकलिफ न हो इस हेतु से दिनभर मौन रक्खा । शाम को सात से नौ के बीच वार्तालाप और भजन कीर्तन का कार्यक्रम रक्खा ।
उपवास के दिनों में मुझे बुखार आया, और करीब दस दिन तक रहा । इससे शरीर कमजोर हो गया । तकरीबन २२-२३ दिन मौन और अशक्ति में चले गये । अब शरीर को ताकतवान करने की जरूरत थी । महुवा में कुल मिलाकर ढाई महिना रहें । इसके दौरान घटी कुछ घटनाओं के बारे में यहाँ बताने जा रहा हूँ ।
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महुवा के एक श्रीमंत पुरुष से मेरा परिचय हुआ । वो बातचीत में बडे माहिर थे । जब संतमहात्माओं की बात निकली तो उन्होंने कहा, संत-महात्मा अपनी मरजी से कुछ भी कर सकते है । उनकी शक्ति अपार होती है ।
मैंने कहा, हाँ, आपकी बात सही है । वो सबकुछ करने के लिये समर्थ होते है ।
उन्होंने कहा, मैं अपना अनुभव आपके साथ बाँटना चाहता हूँ । मैंने एक संन्यासी महात्मा की दिल लगाकर सेवा की । उसी दौरान मुझे इन्कम-टेक्स की भारी रकम भरनी थी, करीब देढ-दो लाख । मैं इससे बचने का उपाय ढूँढ रहा था । महात्माजी ने मुझे कहा : इसमें डरने की क्या बात है ? मैं हूँ ना । फिर उन्होंने मेरा टेक्स बचाने के लिये दो-तीन महिने अनुष्ठान किया । इसके फलस्वरूप मुझे टेक्स नहीं भरना पडा । महात्मा पुरुषों की शक्ति सच में, असाधारण होती है ।
आयकर छूपाने में मदद करनेवाली व्यक्ति को महात्मा या धर्मात्मा कौन कहेगा ? फिर भी मैं चूपचाप उनकी बातें सुनता रहा ।
फिर उन्होंने कहा, अगर भगवान मुझे अधिक संपत्ति दें, तो मैं लोगों की भलाई का काम करना चाहता हूँ । मेरा दिल सेवाभाव से भरा है, और हमेशा संतसेवा के लिये उत्सुक रहता है । मैं मानता हूँ की संत इश्वर के प्रतिनिधि होते है । मैं महुवा में संतमहात्माओं के लिये किसी स्थान का निर्माण करना चाहता हूँ । इससे गाँव को संत्सग का लाभ मिलेगा और मेरा जीवन धन्य हो जायेगा । मैंने गाँव में एक हाईस्कूल भी बनवायी है तथा और भी बहुत कुछ करने की मेरी तमन्ना है । मैं चाहता हूँ की यहाँ स्कूल बने, अस्पताल बनें । इसके लिये मुझे पैसों की आवश्यकता है । अगर आप जैसे संत आशीर्वाद दें तो मेरा काम बन जायेगा । लक्ष्मी को प्रभु की दासी कहा गया है, वो प्रभुभक्तों की सहायता करने हमेशा तैयार रहती है । आपके दर्शन करके मुझे आपकी महानता का अंदाजा हो गया है । आप कृपा करके मुझे आशीर्वाद दे ।
अगर इतना कहकर वह रुक जाते तो ठीक था मगर उन्होंने कहा : मुझे कोई जल्दी नहीं है । आप अपनी फुर्सत से समाधि में जाकर देखना की मेरे लिये क्या ठीक है । सोना-चांदी के व्यापार में मुझे कैसे लाभ हो सकता है, यह एक कागज पर लिख लेना और फिर बताना । इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है । इससे लोगों की भलाई ही होगी । मैं परमार्थ की भावना से प्रेरित होकर आपको बिनती कर रहा हूँ । आप जैसे संतमहात्माओं का जीवन परमार्थ के लिये ही होता है । सरिता का जल, पैड-पौधे, बारिश, ये सब दूसरों के लिये जीते है । खुद कष्ट सहन करते है, मगर औरों का भला करते है । पैड धूप में खडा रहता है मगर लोगों को शीतल छाया देता है । नदी कितने कष्ट सहकर समंदर में जाती है । समंदर का पानी गर्मी से भाँप में परिवर्तित होता है । इससे बादलों की सृष्टि होती है और बारिश होती है । बारिश से धरती धनधान्यवती होती है । महापुरषों का जीवन इसी तरह लोगों की भलाई में खर्च होता है । मेरी बात पर आप जरूर गौर फरमाइयेगा ।
मैंने उनको कुछ नहीं कहा ।
कुछ दिनों बाद वो हमें अपने बगीचे में ले गये और बोले : आप जैसे महात्मा की सेवा करने की मेरी बहुत इच्छा है मगर क्या करूँ ? मुझे बंबई जाना पडेगा । भविष्य में आपकी मुलाकात का अवसर मिलेगा तब बात करेंगे ।
फिर एक दिन वो अचानक मेरे निवासस्थान पर आये । नवरात्री के कारण मेरा मौनव्रत था । मैं अंदर के कमरे में आराम कर रहा था । माताजी बाहर के कमरे में किसीके साथ बातचीत कर रही थी । उन्होंने माताजी को पूछा: 'महात्माजी कहाँ है ?'
'वो आराम कर रहे है ।' माताजी ने जवाब दिया ।
'मैं आज बंबई जा रहा हूँ । अगर वो आराम कर रहे है तो कोई बात नहीं है । अगर आप उनको मेरा नाम बता दें तो वो खुद-बखुद मुझे मिलने आयेंगे ।' उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा ।
मैं अंदर के कमरे से सबकुछ सुन रहा था । जब उन्होंने माताजी को अति आग्रह किया तो मैंने उनको अंदर बुलाया । वो प्रसन्न होकर बोले : 'देखा न ? मैंने नहीं कहा था ? प्रेम की बात न्यारी होती है । महापुरुष साधारण व्यक्ति के प्रेम को फौरन पहचान लेते है ।'
फिर और कोई न सुने, इस तरह से बोले : 'मुझे आज्ञा दो । आज ही दो एसा मेरा दुराग्रह नहीं है । अगर आपका व्रत है, तो व्रत समाप्त होने के बाद देना । मगर समाधि में जाकर मेरे लिये जो उचित है, एक कागज में लिखकर मुझे बताओ । मैं बंबई से आपको खत लिखूँगा । आप तो जानते हो की इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है । ये तो परमार्थ का काम है ।'
मैंने लिखकर कहा : 'मैं एसा नहीं करता । मैं केवल प्रभु के नाम में विश्वास रखता हूँ । अगर उसके बारे में आपको कुछ पूछना है तो पूछीये । इसके अलावा बतानेवाले बहुत सारे साधु आपको मिल जायेंगे ।'
मेरे प्रत्युत्तर से उनको शांति नहीं मिली । जाते-जाते फिर आग्रह करते गये । बंबई जाकर उन्होंने मुझे खत लिखा मगर मैंने उसका उत्तर देना जरूरी नहीं समजा । एसे लोग संतमहात्माओं के पास निजी स्वार्थ लेकर जाते है । सच्चे संतपुरुष कभी एसा प्रयास नहीं करते । अगर उनके पास किसीको लक्ष्मी देने की सिद्धि है तो वे दीनहीन गरीब तथा किसी योग्य व्यक्ति की मदद करेंगे, नहीं की सट्टा करनेवाले किसी श्रीमंत की ।
उनके बारे में तपास करने पर पता चला की गाँव की हाइस्कूल में उन्होंने थोडा आर्थिक सहयोग दिया था मगर अन्य दाताओं का प्रमुख योगदान था ।

